श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| नैमिषेयास्तु शिष्याय कृष्णद्वैपायनस्य तु।<br>अथ तेषां पुराणस्य शुश्रूषा समपद्यत॥ ९<br>दृष्ट्वा तमतिविश्वस्तं विद्वांसं रोमहर्षणम्।<br>अपृच्छंश्च ततः सूतमृषिं सर्वे तपोधनाः॥ १०<br>पुराणसंहितां पुण्यां लिङ्गमाहात्म्यसंयुताम्। | शिष्य उन सूतजीकी सम्यक् प्रकारसे स्तुति तथा पूजा की॥ ७-८ १/२ ॥<br>तत्पश्चात् अपनी कथाओंसे रोमांचित कर देनेवाले सूतजीको अतिविश्वस्त विद्वान् जानकर उन मुनियोंकी उनसे पुराण सुननेकी इच्छा हो गयी॥ ९ १/२ ॥<br>तब सभी तपस्वी ऋषियोंने मुनिवर सूतजीसे लिङ्गमाहात्म्यसे युक्त पुण्यदायिनी पुराणसंहिताके विषयमें पूछा॥ १० १/२ ॥ | | नैमिषेया ऊचुः<br>त्वया सूत महाबुद्धे कृष्णद्वैपायनो मुनिः॥ ११<br>उपासितः पुराणार्थं लब्धा तस्माच्च संहिता। | **नैमिषारण्यवासी ऋषि बोले—**महान् बुद्धिवाले हे सूतजी! पुराणोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये आपने श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीकी उपासना की तथा उनसे पुराणसंहिता प्राप्त भी की है॥ ११ १/२ ॥ | | तस्माद्भवन्तं पृच्छामः सूत पौराणिकोत्तम॥ १२<br>पुराणसंहितां दिव्यां लिङ्गमाहात्म्यसंयुताम्। | अतएव पौराणिकोंमें उत्तम हे सूतजी! लिङ्ग-माहात्म्यसे युक्त दिव्य पुराणसंहिता (लिङ्गपुराण)-के विषयमें हम आपसे पूछ रहे हैं॥ १२ १/२ ॥ | | नारदोऽप्यस्य देवस्य रुद्रस्य परमात्मनः॥ १३<br>क्षेत्राण्यासाद्य चाभ्यर्च्य लिङ्गानि मुनिपुङ्गवः।<br>इह सन्निहितः श्रीमान् नारदो ब्रह्मणः सुतः॥ १४<br>भवभक्तो भवांश्चैव वयं वै नारदस्तथा।<br>अस्याग्रतो मुनेः पुण्यं पुराणं वक्तुमर्हसि॥ १५<br>सफलं साधितं सर्वं भवता विदितं भवेत्। | ब्रह्माके पुत्र श्रीमान् मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी परमेश्वर रुद्रदेवके पावन क्षेत्रोंमें जाकर वहाँ उनके लिङ्गोंकी पूजा-अर्चना सम्पन्न करके अब यहाँ विराजमान हैं॥ १३-१४॥<br>शिवभक्त, आप, हम मुनिगण तथा नारदजी यहाँ उपस्थित हैं। इन मुनिके आगे आप पवित्र लिङ्गपुराणकी कथा कहनेमें समर्थ हैं। आपने सब कुछ सफलतापूर्वक सिद्ध कर लिया है। आपको तो सब कुछ विदित होगा॥ १५ १/२ ॥ | | एवमुक्तः स हृष्टात्मा सूतः पौराणिकोत्तमः॥ १६<br>अभिवाद्याग्रतो धीमान्नारदं ब्रह्मणः सुतम्।<br>नैमिषेयांश्च पुण्यात्मा पुराणं व्याजहार सः॥ १७ | मुनियोंके इस प्रकार कहनेपर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीका मन प्रसन्नतासे प्रफुल्लित हो गया। सर्वप्रथम ब्रह्माजीके पुत्र देवर्षि नारद तथा नैमिषारण्यवासी मुनियोंका अभिवादन करके बुद्धिमान् तथा पुण्यात्मा सूतजीने लिङ्गपुराण कहना आरम्भ किया॥ १६-१७॥ | | सूत उवाच<br>नमस्कृत्य महादेवं ब्रह्माणञ्च जनार्दनम्।<br>मुनीश्वरं तथा व्यासं वक्तुं लिङ्गं स्मराम्यहम्॥ १८ | **सूतजी बोले—**शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा मुनीश्वर व्यासजीको नमस्कार करके लिङ्गपुराणकी कथा कहनेके लिये मैं इस पुराणमें प्रतिपादित विषयका स्मरण करता हूँ॥ १८॥ | | शब्दब्रह्मतनुं साक्षाच्छब्दब्रह्मप्रकाशकम्।<br>वर्णावयवमव्यक्तलक्षणं बहुधा स्थितम्॥ १९ | शब्दब्रह्म ही इसका शरीर है—यह साक्षात् |