भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

| १२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| नैमिषेयास्तु शिष्याय कृष्णद्वैपायनस्य तु।<br>अथ तेषां पुराणस्य शुश्रूषा समपद्यत॥ ९<br>दृष्ट्वा तमतिविश्वस्तं विद्वांसं रोमहर्षणम्।<br>अपृच्छंश्च ततः सूतमृषिं सर्वे तपोधनाः॥ १०<br>पुराणसंहितां पुण्यां लिङ्गमाहात्म्यसंयुताम्। | शिष्य उन सूतजीकी सम्यक् प्रकारसे स्तुति तथा पूजा की॥ ७-८ १/२ ॥<br>तत्पश्चात् अपनी कथाओंसे रोमांचित कर देनेवाले सूतजीको अतिविश्वस्त विद्वान् जानकर उन मुनियोंकी उनसे पुराण सुननेकी इच्छा हो गयी॥ ९ १/२ ॥<br>तब सभी तपस्वी ऋषियोंने मुनिवर सूतजीसे लिङ्गमाहात्म्यसे युक्त पुण्यदायिनी पुराणसंहिताके विषयमें पूछा॥ १० १/२ ॥ | | नैमिषेया ऊचुः<br>त्वया सूत महाबुद्धे कृष्णद्वैपायनो मुनिः॥ ११<br>उपासितः पुराणार्थं लब्धा तस्माच्च संहिता। | **नैमिषारण्यवासी ऋषि बोले—**महान् बुद्धिवाले हे सूतजी! पुराणोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये आपने श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीकी उपासना की तथा उनसे पुराणसंहिता प्राप्त भी की है॥ ११ १/२ ॥ | | तस्माद्भवन्तं पृच्छामः सूत पौराणिकोत्तम॥ १२<br>पुराणसंहितां दिव्यां लिङ्गमाहात्म्यसंयुताम्। | अतएव पौराणिकोंमें उत्तम हे सूतजी! लिङ्ग-माहात्म्यसे युक्त दिव्य पुराणसंहिता (लिङ्गपुराण)-के विषयमें हम आपसे पूछ रहे हैं॥ १२ १/२ ॥ | | नारदोऽप्यस्य देवस्य रुद्रस्य परमात्मनः॥ १३<br>क्षेत्राण्यासाद्य चाभ्यर्च्य लिङ्गानि मुनिपुङ्गवः।<br>इह सन्निहितः श्रीमान् नारदो ब्रह्मणः सुतः॥ १४<br>भवभक्तो भवांश्चैव वयं वै नारदस्तथा।<br>अस्याग्रतो मुनेः पुण्यं पुराणं वक्तुमर्हसि॥ १५<br>सफलं साधितं सर्वं भवता विदितं भवेत्। | ब्रह्माके पुत्र श्रीमान् मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी परमेश्वर रुद्रदेवके पावन क्षेत्रोंमें जाकर वहाँ उनके लिङ्गोंकी पूजा-अर्चना सम्पन्न करके अब यहाँ विराजमान हैं॥ १३-१४॥<br>शिवभक्त, आप, हम मुनिगण तथा नारदजी यहाँ उपस्थित हैं। इन मुनिके आगे आप पवित्र लिङ्गपुराणकी कथा कहनेमें समर्थ हैं। आपने सब कुछ सफलतापूर्वक सिद्ध कर लिया है। आपको तो सब कुछ विदित होगा॥ १५ १/२ ॥ | | एवमुक्तः स हृष्टात्मा सूतः पौराणिकोत्तमः॥ १६<br>अभिवाद्याग्रतो धीमान्नारदं ब्रह्मणः सुतम्।<br>नैमिषेयांश्च पुण्यात्मा पुराणं व्याजहार सः॥ १७ | मुनियोंके इस प्रकार कहनेपर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीका मन प्रसन्नतासे प्रफुल्लित हो गया। सर्वप्रथम ब्रह्माजीके पुत्र देवर्षि नारद तथा नैमिषारण्यवासी मुनियोंका अभिवादन करके बुद्धिमान् तथा पुण्यात्मा सूतजीने लिङ्गपुराण कहना आरम्भ किया॥ १६-१७॥ | | सूत उवाच<br>नमस्कृत्य महादेवं ब्रह्माणञ्च जनार्दनम्।<br>मुनीश्वरं तथा व्यासं वक्तुं लिङ्गं स्मराम्यहम्॥ १८ | **सूतजी बोले—**शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा मुनीश्वर व्यासजीको नमस्कार करके लिङ्गपुराणकी कथा कहनेके लिये मैं इस पुराणमें प्रतिपादित विषयका स्मरण करता हूँ॥ १८॥ | | शब्दब्रह्मतनुं साक्षाच्छब्दब्रह्मप्रकाशकम्।<br>वर्णावयवमव्यक्तलक्षणं बहुधा स्थितम्॥ १९ | शब्दब्रह्म ही इसका शरीर है—यह साक्षात् |

२- लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन

अध्याय २ ]लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन१३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अकारोकारमकारं स्थूलं सूक्ष्मं परात्परम्।<br>ओङ्काररूपमृग्वक्त्रं सामजिह्वासमन्वितम्॥ २०<br>यजुर्वेदमहाग्रीवमथर्वहृदयं विभुम्।<br>प्रधानपुरुषातीतं प्रलयोत्पत्तिवर्जितम्॥ २१शब्दब्रह्म (स्वस्वरूप)-का प्रकाशक है। अकारादि-क्षकारान्त वर्ण ही इसके अवयव हैं, अनेक रूपोंमें स्थित होनेपर भी यह अव्यक्त है, परात्पर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म होनेपर यह अकार, उकार तथा मकारात्मक स्थूल शरीरवाला है, ऐसे स्वयं-प्रकाश्य शब्दब्रह्म ॐकारका ऋग्वेद मुख है, सामवेद इसकी जिह्वा है, यजुर्वेद इसकी महाग्रीवा है तथा अथर्ववेद इसका हृदय है, यह व्यापक है, यह प्रकृति तथा पुरुषसे अतीत एवं प्रलय तथा उत्पत्तिसे रहित है॥ १९–२१॥
तमसा कालरुद्राख्यं रजसा कनकाण्डजम्।<br>सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं निर्गुणत्वे महेश्वरम्॥ २२जो तमोगुणसे युक्त होनेपर कालरुद्र, रजोगुणसे युक्त होनेपर हिरण्यगर्भस्वरूप, सत्त्वगुणसे आविष्ट होनेपर सर्वव्यापी विष्णुरूप तथा गुणोंसे रहित होनेपर महेश्वरस्वरूपमें प्रकट होता है॥ २२॥
प्रधानावयवं व्याप्य सप्तधाधिष्ठितं क्रमात्।<br>पुनः षोडशधा चैव षड्विंशकमजोद्भवम्॥ २३<br>सर्गप्रतिष्ठासंहारलीलार्थं लिङ्गरूपिणम्।<br>प्रणम्य च यथान्यायं वक्ष्ये लिङ्गोद्भवं शुभम्॥ २४प्रकृत्याश्रित होकर जो महत्, अहंकार तथा पंच-तन्मात्रात्मक (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध)—सात रूपोंमें, तदनन्तर दस इन्द्रियों, पाँच महाभूतों तथा मन इत्यादि षोडश रूपोंमें, पुनः इन षोडश रूपों और अव्यक्त, ध्याता (जीव) एवं ध्येय (शिव) इत्यादिको लेकर छब्बीस रूपोंमें व्यक्त होते हैं, जो पितामह ब्रह्माके भी पिता हैं, उन सृष्टि-पालन तथा संहाररूप लीलाके लिये लिङ्गस्वरूप धारण करनेवाले महेश्वर शिवको प्रणाम करके शुभकारक लिङ्गोद्भवकी कथासे युक्त लिङ्गपुराणका मैं यथोचितरूपसे वर्णन करूँगा॥ २३-२४॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे लिङ्गोद्भवप्रतिज्ञावर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'लिङ्गोद्भवप्रतिज्ञावर्णन' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ॥ १॥


दूसरा अध्याय

लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन

सूक्त / श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>ईशानकल्पवृत्तान्तमधिकृत्य महात्मना।<br>ब्रह्मणा कल्पितं पूर्वं पुराणं लैङ्गमुत्तमम्॥ १**सूतजी बोले—**ईशानकल्पमें लिङ्गके प्रादुर्भाव आदिसे सम्बद्ध वृत्तान्तोंको आश्रित करके महात्मा ब्रह्माने सर्वप्रथम श्रेष्ठ लिङ्गपुराणकी उद्भावना की॥ १॥
ग्रन्थकोटिप्रमाणं तु शतकोटिप्रविस्तरे।<br>चतुर्लक्षेण सङ्क्षिप्ते व्यासैः सर्वान्तरेषु वै॥ २सौ करोड़ विस्तारवाले पुराणसमुच्चयमें एक करोड़ श्लोकोंवाला यह लिङ्गपुराण सभी मन्वन्तरोंमें विभिन्न व्यासोंके द्वारा चार लाख श्लोकोंमें संक्षिप्त किया गया॥ २॥
व्यस्तेऽष्टादशधा चैव ब्रह्मादौ द्वापरादिषु।<br>लिङ्गमेकादशं प्रोक्तं मया व्यासाच्छ्रुतञ्च तत्॥ ३वही बृहद् पुराणसंहिता प्रत्येक द्वापरयुगमें

सम्पूर्ण ग्रन्थ

१४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अस्यैकादशसाहस्रे ग्रन्थमानमिह द्विजाः।<br>तस्मात् सङ्क्षेपतो वक्ष्ये न श्रुतं विस्तरेण यत्॥ ४ब्रह्मपुराणादि अठारह पुराणोंके रूपमें व्यासजीद्वारा विभक्त होती है, उनमें ग्यारहवाँ लिङ्गपुराण कहा गया है, जिसका श्रवण मैंने व्यासजीसे किया है॥ ३॥<br>हे विप्रो! [चार लाख श्लोकोंमें संक्षेपके पश्चात्] इस ग्रन्थमें श्लोकोंकी संख्या मात्र ग्यारह हजार है। अतः मैं संक्षेपमें ही इसका वर्णन कर रहा हूँ; क्योंकि मैं इसे विस्तारसे नहीं सुन सका हूँ॥ ४॥
चतुर्लक्षेण सङ्क्षिप्ते कृष्णद्वैपायनेन तु।<br>अत्रैकादशसाहस्त्रैः कथितो लिङ्गसम्भवः॥ ५विभिन्न मन्वन्तरोंमें अनेक व्यासोंद्वारा चार लाख श्लोकोंमें संक्षिप्त किये गये इस लिङ्गपुराणमेंसे वैवस्वत मन्वन्तरमें श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने ग्यारह हजार श्लोकोंमें लिङ्गपुराणका वर्णन किया है॥ ५॥
सर्गः प्राधानिकः पश्चात्प्राकृतो वैकृतानि च।<br>अण्डस्यास्य च सम्भूतिरण्डस्यावरणाष्टकम्॥ ६इसमें सर्वप्रथम प्राधानिक तदनन्तर प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका वर्णन किया गया है। इस अण्डकी उत्पत्ति तथा अण्डके आठ आवरणोंका इसमें वर्णन है॥ ६॥
अण्डोद्भवत्वं शर्वस्य रजोगुणसमाश्रयात्।<br>विष्णुत्वं कालरुद्रत्वं शयनं चाप्सु तस्य च॥ ७सदाशिवके ही रजोगुणके समाश्रयणसे अण्डके मध्यसे ब्रह्मारूपमें, (सत्त्वके आश्रयसे) विष्णुरूपमें, (तमोगुणके आश्रयसे) कालरूद्ररूपमें प्रादुर्भावका तथा अन्तमें उन्हीं सदाशिवका ही प्रलयकालीन जलराशिमें (नारायणके रूपमें) शयनका वर्णन किया गया है॥ ७॥
प्रजापतीनां सर्गश्च पृथिव्युद्धरणं तथा।<br>ब्रह्मणश्च दिवारात्रमायुषो गणनं पुनः॥ ८इस पुराणके अन्तर्गत प्रजापतियोंकी सृष्टि, पृथ्वीके उद्धारकी कथा तथा ब्रह्माके दिन-रात और उनकी आयुकी गणनाका वर्णन किया गया है॥ ८॥
सवनं ब्रह्मणश्चैव युगकल्पश्च तस्य तु।<br>दिव्यञ्च मानुषं वर्षमार्षं वै ध्रौव्यमेव च॥ ९<br>पित्र्यं पितॄणां सम्भूतिर्धर्मश्चाश्रमिणां तथा।<br>अवृद्धिंर्जगतो भूयो देव्याः शक्त्युद्भवस्तथा॥ १०<br><br>(चित्र)इसमें ब्रह्माकी उत्पत्ति तथा उनके युग एवं कल्प वर्णित हैं। दिव्य वर्ष, मानुष वर्ष, आर्षवर्ष, ध्रौव्यवर्ष तथा पित्र्यवर्षका इसमें वर्णन है। पितरोंकी उत्पत्ति, आश्रमियोंके धर्म, सृष्टि-विस्तारकी प्रारम्भिक दशामें सृष्टिके त्वरित अभीष्ट विकासके अभाव तथा शक्तिस्वरूपा देवीके उद्भवका वर्णन इसमें किया गया है॥ ९-१०॥
स्त्रीपुम्भावो विरिञ्चस्य सर्गो मिथुनसम्भवः।<br>आख्याष्टकं हि रुद्रस्य कथितं रोदनान्तरे॥ ११मनु तथा शतरूपाकी उत्पत्screenरूपमें ब्रह्माके स्त्री-पुरुष भावका वर्णन, मैथुनी सृष्टिका वर्णन तथा रुद्रके रुदनके पश्चात् उनके आठ नामोंका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है॥ ११॥
ब्रह्मविष्णुविवादश्च पुनर्लिङ्गस्य सम्भवः।<br>शिलादस्य तपश्चैव वृत्रारेर्दर्शनं तथा॥ १२ब्रह्मा-विष्णुके विवाद तथा उसके बाद शिवलिङ्गके प्राकट्यका वर्णन इसमें विद्यमान है। शिलादकी तपस्या

अध्याय २ ] लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन [ १५


प्रार्थनायोनिजस्याथ दुर्लभत्वं सुतस्य तु।<br>शिलादशक्रसंवादः पद्मयोनित्वमेव च॥ १३॥तथा उन्हें वृत्रारि (इन्द्र)-का दर्शन इस पुराणमें वर्णित है॥ १२॥<br><br>शिलाद तथा इन्द्रका संवाद, शिलादद्वारा अयोनिज पुत्रके लिये की गयी प्रार्थना, ऐसे पुत्रका दुर्लभत्व तथा कमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति इस पुराणमें वर्णित हैं॥ १३॥
भवस्य दर्शनञ्चैव तिष्येष्वाचार्यशिष्ययोः।<br>व्यासावताराश्च तथा कल्पमन्वन्तराणि च॥ १४॥<br><br>कल्पत्वं चैव कल्पानामाख्याभेदेष्वनुक्रमात्।<br>कल्पेषु कल्पे वाराहे वाराहत्वं हरेस्तथा॥ १५॥कलियुगोंमें आचार्य तथा शिष्यको शिवके दर्शन, व्यासोंके अवतार, कल्प, मन्वन्तर, कल्पका स्वरूप, भेदक्रमसे कल्पोंके आख्यान, कल्पोंमें वाराहकल्पमें विष्णुके वाराहावतारकी कथा आदिका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें है॥ १४-१५॥
मेघवाहनकल्पस्य वृत्तान्तं रुद्रगौरवम्।<br>पुनर्लिङ्गोद्भवश्चैव ऋषिमध्ये पिनाकिनः॥ १६॥<br><br>लिङ्गस्याराधनं स्नानविधानं शौचलक्षणम्।<br>वाराणस्याश्च माहात्म्यं क्षेत्रमाहात्म्यवर्णनम्॥ १७॥मेघवाहन कल्पका वृत्तान्त, रुद्रगरिमा, ऋषियोंके मध्य शिवलिङ्गका उद्भव, लिङ्गकी उपासना-स्नानविधि, शौचाचारका लक्षण, वाराणसीका माहात्म्य तथा क्षेत्रमाहात्म्य आदिका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें उपलब्ध है॥ १६-१७॥
भुवि रुद्रालयानां तु संख्या विष्णोर्गृहस्य च।<br>अन्तरिक्षे तथाण्डेऽस्मिन् देवायतनवर्णनम्॥ १८॥पृथ्वीपर शिवालयों तथा विष्णुके मन्दिरोंकी संख्याका वर्णन और अन्तरिक्ष तथा इस ब्रह्माण्डमें देवालयोंका वर्णन इसमें है॥ १८॥
दक्षस्य पतनं भूमौ पुनः स्वारोचिषेऽन्तरे।<br>दक्षशापश्च दक्षस्य शापमोक्षस्तथैव च॥ १९॥स्वारोचिष मन्वन्तरमें दक्षप्रजापतिका पृथ्वीपर पतन, दक्षको प्रदत्त शाप तथा उस शापसे दक्षकी मुक्ति इस लिङ्गपुराणमें वर्णित है॥ १९॥
कैलासवर्णनञ्चैव योगः पाशुपतस्तथा।<br>चतुर्युगप्रमाणञ्च युगधर्मः सुविस्तरः॥ २०॥कैलासका वर्णन, पाशुपतयोगका वर्णन, चारों युगोंके स्वरूप एवं प्रमाणका वर्णन तथा युगधर्मका वर्णन लिङ्गपुराणमें विस्तारके साथ उपलब्ध है॥ २०॥
सन्ध्यांशकप्रमाणञ्च सन्ध्यावृत्तं भवस्य च।<br>श्मशाननिलयश्चैव चन्द्ररेखासमुद्भवः॥ २१॥चारों युगोंके सन्ध्याकालमानका वर्णन, शिवजीके सन्ध्याताण्डवका वर्णन, शंकरजीके श्मशानवासका वर्णन तथा चन्द्रमाकी कलाओंकी उत्पत्तिका वर्णन इस पुराणमें किया गया है॥ २१॥
उद्वाहः शङ्करस्याथ पुत्रोत्पादनमेव च।<br>मैथुनातिप्रसङ्गेन विनाशो जगतां भयम्॥ २२॥<br><br>शापः सत्या कृतो देवान् पुरा विष्णूञ्च पालितम्।<br>शुक्रोत्सर्गस्तु रुद्रस्य गाङ्गेयोद्भव एव च॥ २३॥इस लिङ्गपुराणमें शंकरजीका विवाह, तत्पश्चात् पुत्ररूपमें श्रीगणेशजीकी उत्पत्ति, दीर्घकालीन कामोपभोग-प्रसंगसे जगत्के विनाशका भय, सतीके द्वारा प्रदत्त शाप, प्राचीनकालमें शिवजीद्वारा त्रिपुरवध करके देवताओं तथा विष्णुकी रक्षा, शिवजीका शुक्रोत्सर्ग तथा कार्तिकेयकी उत्पत्ति आदि वर्णित है॥ २२-२३॥
ग्रहणादिषु कालेषु स्नाप्य लिङ्गं फलं तथा।<br>क्षुब्दधीचविवादश्च दधीचोपेन्द्रयोस्तथा॥ २४॥ग्रहण आदि कालोंमें लिङ्गके अभिषेकका विधान तथा उसका फल, क्षुप तथा दधीच और दधीच तथा विष्णुका विवाद इस पुराणमें वर्णित है॥ २४॥
१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उत्पत्तिर्नन्दिनाम्ना तु देवदेवस्य शूलिनः।<br>पतिव्रतायाश्चाख्यानं पशुपाशविचारणा॥ २५<br><br>प्रवृत्तिलक्षणं ज्ञानं निवृत्त्यधिकृता तथा।<br>वसिष्ठतनयोत्पत्तिर्वासिष्ठानां महात्मनाम्॥ २६<br><br>मुनीनां वंशविस्तारो राज्ञां शक्तेर्विनाशनम्।<br>दौरात्म्यं कौशिकस्याथ सुरभेर्बन्धनं तथा॥ २७इस लिङ्गपुराणमें देवाधिदेव शूलधारी शिवजीका नन्दीश्वर नामसे प्रादुर्भाव, पतिव्रताका आख्यान, पशु (जीव) तथा पाश (बन्धन)-की मीमांसा, आसक्तिके स्वरूपका ज्ञान, निवृत्तिकी योग्यताप्राप्ति, वसिष्ठके पुत्रोंकी उत्पत्ति, महात्मा वसिष्ठपुत्रों तथा मुनियों और राजाओंका वंशविस्तार, वसिष्ठपुत्र शक्तिका विनाश, विश्वामित्रकी दुर्भावना तथा उनके द्वारा वसिष्ठकी सुरभिधेनुका बलात् अधिग्रहण आदि वर्णित किये गये हैं॥ २५-२७॥
सुतशोको वसिष्ठस्य अरुन्धत्याः प्रलापनम्।<br>स्नुषायाः प्रेषणञ्चैव गर्भस्थस्य वचस्तथा॥ २८<br><br>पराशरस्यावतारो व्यासस्य च शुकस्य च।<br>विनाशो राक्षसानाञ्च कृतो वै शक्तिसूनुना॥ २९<br><br>देवतापरमार्थं तु विज्ञानञ्च प्रसादतः।<br>पुराणकरणञ्चैव पुलस्त्यस्याज्ञया गुरोः॥ ३०वसिष्ठके पुत्रशोक, अरुन्धतीके विलाप, उनकी पुत्रवधूके प्रेषण, गर्भस्थित शिशुके वचनोद्गार, पराशर-व्यास तथा शुकदेवके अवतार, शक्तिपुत्र पराशरके द्वारा किये गये राक्षसध्वंस, देवताओंके गूढ़ रहस्यरूप विशिष्ट ज्ञान तथा गुरु पुलस्त्यके आज्ञानुसार उनके कृपाप्रसादसे [पराशरद्वारा विष्णु]-पुराणकी रचनासे सम्बन्धित विषयोंका वर्णन किया गया है॥ २८-३०॥
भुवनानां प्रमाणञ्च ग्रहाणां ज्योतिषां गतिः।<br>जीवच्छ्राद्धविधानञ्च श्राद्धार्हाः श्राद्धमेव च॥ ३१भुवनोंकी परिमिति, ग्रहों-नक्षत्रोंकी गति, जीवच्छ्राद्धकी विधि, श्राद्धके अधिकारी पात्रों तथा श्राद्धके विषयमें इस पुराणमें वर्णन है॥ ३१॥
नान्दीश्राद्धविधानञ्च तथाध्ययनलक्षणम्।<br>पञ्चयज्ञप्रभावश्च पञ्चयज्ञविधिस्तथा॥ ३२<br><br>रजस्वलानां वृत्तिश्च वृत्त्या पुत्रविशिष्टता।<br>मैथुनस्य विधिश्चैव प्रतिवर्णमनुक्रमात्॥ ३३<br><br>भोज्याभोज्यविधानञ्च सर्वेषामेव वर्णिनाम्।<br>प्रायश्चित्तमशेषस्य प्रत्येकञ्चैव विस्तरात्॥ ३४इस पुराणमें नान्दीश्राद्धके विधान, वेदाध्ययनका स्वरूप, ब्रह्मयज्ञ-पितृयज्ञ-दैवयज्ञ-भूतयज्ञ-नृयज्ञ-इन पाँच महायज्ञोंके प्रभाव तथा इन पाँच महायज्ञोंके करनेकी विधिका वर्णन किया गया है। रजस्वला स्त्रियोंके सदाचार, उस सदाचार-पालनसे विशिष्ट पुत्रकी प्राप्ति, प्रत्येक वर्णोंके अनुसार मैथुनके नियम, सभी वर्णोंके लिये अलग-अलग भोज्य तथा अभोज्यके विधिविधान और समस्त पापोंके प्रायश्चित्तके विषयमें पृथक्-पृथक् रूपसे विस्तारसे वर्णन किया गया है॥ ३२-३४॥
नरकाणां स्वरूपञ्च दण्डः कर्मानुरूपतः।<br>स्वर्गिनारकिणां पुंसां चिह्नं जन्मान्तरेषु च॥ ३५<br><br>नानाविधानि दानानि प्रेतराजपुरं तथा।<br>कल्पं पञ्चाक्षरस्याथ रुद्रमाहात्म्यमेव च॥ ३६नरकोंके स्वरूप, कर्मानुसार दण्डके विधान, स्वर्ग और नरक प्राप्त करनेवाले पुरुषोंमें दूसरे जन्मोंमें प्रकट होनेवाले चिह्न, अनेक प्रकारके दानों, यमपुरी, पंचाक्षर मन्त्रकी मीमांसा तथा रुद्रमाहात्म्यका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है॥ ३५-३६॥
वृत्रेन्द्रयोर्महायुद्धं विश्वरूपविमर्दनम्।<br>श्वेतस्य मृत्योः संवादः श्वेतार्थे कालनाशनम्॥ ३७इन्द्र-वृत्रासुरके महासंग्रामका वर्णन, विश्व-रूपके वधका निरूपण, श्वेतमुनि तथा कालका संवाद,

अध्याय २ ] लिङ्गपुराणका परिचय तथा इसमें प्रतिपादित विषयोंका वर्णन १७


श्लोक (संस्कृत)अर्थ (हिन्दी)
श्वेतमुनिकी रक्षाके लिये शिवद्वारा कालके संहारका इसमें वर्णन है ॥ ३७ ॥
देवदारुवने शम्भोः प्रवेशः शङ्करस्य तु।<br>सुदर्शनस्य चाख्यानं क्रमसंन्यासलक्षणम्॥ ३८देवदारुवनमें कल्याणकारी भगवान् शम्भुके प्रवेश, सुदर्शनके आख्यान एवं क्रमसंन्यासके लक्षणका वर्णन इस पुराणमें किया गया है ॥ ३८ ॥
श्रद्धासाध्योऽथ रुद्रस्तु कथितं ब्रह्मणा तदा।<br>मधुना कैटभेनैव पुरा हतगतेर्विभोः॥ ३९<br><br>ब्रह्मणः परमं ज्ञानमादातुं मीनता हरेः।<br>सर्वावस्थासु विष्णोश्च जननं लीलयैव तु॥ ४०शिव-प्राप्ति श्रद्धाद्वारा ही साध्य है—इस सिद्धान्तका ब्रह्माद्वारा निरूपण, मधु-कैटभ-संसर्गसे नष्ट ज्ञानवाले ब्रह्माको परम ज्ञान प्रदान करनेके लिये शिवप्रादुर्भाव, भगवान् विष्णुका मत्स्यरूपमें अवतार तथा सभी अवस्थाओंमें लीलापूर्वक विष्णुकी उत्पत्तिका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें उपलब्ध है ॥ ३९-४० ॥
रुद्रप्रसादाद्विष्णोश्च जिष्णोश्चैव तु सम्भवः।<br>मन्थानधारणार्थाय हरेः कूर्मत्वमेव च॥ ४१भगवान् शंकरकी कृपासे श्रीकृष्ण तथा कामदेवके रूपमें प्रद्युम्नके प्रादुर्भाव एवं समुद्रमन्थनके समय मथानी-धारणके लिये भगवान् विष्णुके कूर्मावतारका वर्णन इस पुराणमें है ॥ ४१ ॥
सङ्कर्षणस्य चोत्पत्तिः कौशिक्याश्च पुनर्भवः।<br>यदूनाञ्चैव सम्भूतिर्यादवत्वं हरेः स्वयम्॥ ४२<br><br>भोजराजस्य दौरात्म्यं मातुलस्य हरेर्विभोः।<br>बालभावे हरेः क्रीडा पुत्रार्थं शङ्करार्चनम्॥ ४३संकर्षणकी उत्पत्ति, चण्डिकाके रूपमें कौशिकीके प्रादुर्भाव, यदुवंशियोंकी उत्पत्ति, स्वयं विष्णुके यदुकुलमें प्रादुर्भाव, श्रीकृष्णके मामा भोजराज (कंस)-के दुर्भाव, बालरूपमें श्रीकृष्णकी लीलाओं तथा पुत्रके लिये शंकरजीकी पूजाका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है ॥ ४२-४३ ॥
नारस्य च तथोत्पत्तिः कपाले वैष्णवाद्वरात्।<br>भूभारनिग्रहार्थे तु रुद्रस्याराधनं हरेः॥ ४४विष्णुरूप शिवसे कपालमें जलकी उत्पत्ति तथा पृथ्वीका भार उतारनेके लिये विष्णुद्वारा शंकरजीकी की गयी आराधनाका वर्णन इस पुराणमें है ॥ ४४ ॥
वैन्येन पृथुना भूमेः पुरा दोहप्रवर्तनम्।<br>देवासुरे पुरा लब्धो भृगुशापश्च विष्णुना॥ ४५<br><br>कृष्णत्वे द्वारकायां तु निलयो माधवस्य तु।<br>लब्धो हिताय शापस्तु दुर्वासस्याननाद्धरेः॥ ४६प्राचीनकालमें वेनपुत्र पृथुके द्वारा गोरूप पृथ्वीके दोहन तथा देवासुरसंग्राममें कृष्णके द्वारा प्राप्त किये गये भृगु-प्रदत्त शाप, द्वारकापुरीमें कृष्णरूपमें विष्णुके निवास, लोक-कल्याणके लिये विष्णुके द्वारा स्वीकार किये गये दुर्वासाप्रदत्त शापका वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है ॥ ४५-४६ ॥
वृष्ण्यन्धकविनाशाय शापः पिण्डारवासिनाम्।<br>एरकास्य तथोत्पत्तिस्तोमरस्योद्भवस्तथा॥ ४७<br><br>एरकालाभतोऽन्योन्यं विवादे वृष्णिविग्रहः।<br>लीलया चैव कृष्णेन स्वकुलस्य च संहतिः॥ ४८<br><br>एरकास्त्रबलेनैव गमनं स्वेच्छयैव तु।<br>ब्रह्मणश्चैव मोक्षस्य विज्ञानं तु सुविस्तरम्॥ ४९वृष्णि तथा अन्धक वंशोंके विनाशके लिये पिण्डारकक्षेत्रवासी यादवोंको दिये गये शाप, मूसल तथा एरकाकी उत्पत्ति, एरका घास ले-लेकर आपसमें एक-दूसरेपर प्रहार करनेसे वृष्णिवंशियोंके विनाश, अपनी ही लीलासे श्रीकृष्णके द्वारा अपने ही कुलके विनाश, उसी एरकारूपी अस्त्रके प्रभावसे श्रीकृष्णके इच्छापूर्वक अपने धामके लिये प्रयाण तथा कृष्णरूपी ब्रह्मकी प्रयाणलीलाके

३- अलिङ्ग एवं लिङ्गतत्त्वका स्वरूप, शिवतत्त्वकी व्यापकता, महदादि तत्त्वोंका विवेचन, जगत्की उत्पत्तिका क्रम तथा महेश्वर शिवकी महिमा

१८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
पुरान्धकाग्निदक्षाणां शक्रभेमृगरूपिणाम्।<br>मदनस्यादिदेवस्य ब्रह्मणश्चामरारिणाम्॥ ५०<br><br>हलाहलस्य दैत्यस्य कृतावज्ञा पिनाकिना।<br>जालन्धरवधश्चैव सुदर्शनसमुद्भवः॥ ५१रहस्यका विस्तृत वर्णन इस लिङ्गपुराणमें किया गया है॥ ४७-४९॥<br><br>इन्द्र बने हुए त्रिपुरासुर, गजरूपी अन्धकासुर, मृगरूपी यज्ञाग्नि, दक्ष, कामदेव, देवताओंके आदिदेव ब्रह्मा, हलाहल विष, दैत्य एवं अन्य असुरोंके शिवकृत दमनका वर्णन तथा जालन्धरवध एवं सुदर्शनकी उत्पत्तिका वर्णन भी इस पुराणमें प्राप्त है॥ ५०-५१॥
विष्णोर्वरआयुधावाप्तिस्तथा रुद्रस्य चेष्टितम्।<br>तथान्यानि च रुद्रस्य चरितानि सहस्त्रशः॥ ५२इस लिङ्गपुराणमें भगवान् विष्णुको श्रेष्ठ आयुधकी प्राप्ति, रुद्रके क्रिया-कलाप तथा उनके अन्य हजारों चरित्रोंका वर्णन किया गया है॥ ५२॥
हरेः पितामहस्याथ शक्रस्य च महात्मनः।<br>प्रभावानुभवश्चैव शिवलोकस्य वर्णनम्॥ ५३<br><br>भूमौ रुद्रस्य लोकञ्च पाताले हाटकेश्वरम्।<br>तपसां लक्षणञ्चैव द्विजानां वैभवं तथा॥ ५४विष्णु-ब्रह्मा तथा महात्मा इन्द्रके अनुभव एवं प्रभावका वर्णन तथा शिवलोकका भी वर्णन है। भूमिष्ठ रुद्रलोक, पातालस्थ हाटकेश्वर, तपोंके लक्षण एवं द्विजोंके वैभवका निरूपण भी इस पुराणमें किया गया है॥ ५३-५४॥
आधिक्यं सर्वमूर्तीनां लिङ्गमूर्तेर्विशेषतः।<br>लिङ्गेऽस्मिन्नानुपूर्व्येण विस्तरेणानुकीर्त्यते॥ ५५<br><br>एतज्ज्ञात्वा पुराणस्य सङ्क्षेपं कीर्तयेत्तु यः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोकं स गच्छति॥ ५६भगवान् शंकरके विग्रहोंकी व्यापकता तथा उनकी लिङ्गमूर्तिकी विशेषता इस पुराणमें वर्णित है। इस लिङ्गमहापुराणमें पूर्वोक्त विषयोंका प्रायः क्रमिक रूपसे वर्णन किया गया है। इसे जानकर जो मनुष्य लिङ्ग-पुराणकी इस संक्षिप्त अनुक्रमणिकाका कीर्तन (पाठ) करता है, वह सभी पापोंसे छूटकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है॥ ५५-५६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागेऽनुक्रमणिकावर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'अनुक्रमणिकावर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥


तीसरा अध्याय

अलिङ्ग एवं लिङ्गतत्त्वका स्वरूप, शिवतत्त्वकी व्यापकता, महदादि तत्त्वोंका विवेचन, जगत्की उत्पत्तिका क्रम तथा महेश्वर शिवकी महिमा

सूत उवाच<br>अलिङ्गो लिङ्गमूलं तु अव्यक्तं लिङ्गमुच्यते।<br>अलिङ्गः शिव इत्युक्तो लिङ्गं शैवमिति स्मृतम्॥ १<br><br>प्रधानं प्रकृतिश्चेति यदाहुर्लिङ्गमुत्तमम्।<br>गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शादिवर्जितम्॥ २<br><br>अगुणं ध्रुवमक्षय्यमलिङ्गं शिवलक्षणम्।<br>गन्धवर्णरसैर्युक्तं शब्दस्पर्शादिलक्षणम्॥ ३**सूतजी बोले—**वह निर्गुण ब्रह्म शिव (अलिङ्ग) ही लिङ्ग (प्रकृति)-का मूल कारण है तथा स्वयं लिङ्गरूप (प्रकृतिरूप) भी है। लिङ्ग (प्रकृति)-को भी शिवोद्भासित जाना गया है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदिसे रहित, अगुण, ध्रुव, अक्षय, अलिङ्ग (निर्गुण) तत्त्वको ही शिव कहा गया है तथा शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादिसे संयुक्त प्रधान प्रकृतिको ही उत्तम लिङ्ग कहा गया है॥ १-३॥

अध्याय ३ ] अलिङ्ग एवं लिङ्गतत्त्वका स्वरूप...महेश्वर शिवकी महिमा १९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जगद्योनिं महाभूतं स्थूलं सूक्ष्मं द्विजोत्तमाः।<br>विग्रहो जगतां लिङ्गमलिङ्गादभवत् स्वयम्॥ ४हे श्रेष्ठ विप्रो! वह जगत्‌का उत्पत्तिस्थान है, पंचभूतात्मक अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, आकाश, वायुसे युक्त है, स्थूल है, सूक्ष्म है, जगत्‌का विग्रह है तथा यह लिङ्गतत्त्व निर्गुण परमात्मा शिवसे स्वयं उत्पन्न हुआ है॥ ४॥
सप्तधा चाष्टधा चैव तथैकादशधा पुनः।<br>लिङ्गान्यलिङ्गस्य तथा मायया विततानि तु॥ ५उस अलिङ्ग अर्थात् निर्गुण परमात्माकी मायासे सात, आठ तथा फिर ग्यारह इस तरह कुल छब्बीस रूपवाले लिङ्गतत्त्व इस ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं॥ ५॥
तेभ्यः प्रधानदेवानां त्रयमासीच्छिवात्मकम्।<br>एकस्मात् त्रिष्वभूद्विश्वमेकेन परिरक्षितम्॥ ६<br><br>एकेनैव हृतं विश्वं व्याप्तं त्वेवं शिवेन तु।<br>अलिङ्गञ्चैव लिङ्गञ्च लिङ्गालिङ्गानि मूर्तयः॥ ७<br><br>यथावत् कथिताश्चैव तस्माद् ब्रह्म स्वयं जगत्।<br>अलिङ्गी भगवान् बीजी स एव परमेश्वरः॥ ८उन्हीं माया-वितत लिङ्गोंसे उद्भूत तीनों प्रधान देव शिवात्मक हैं। उन तीनोंमें एक ब्रह्मासे यह जगत् उत्पन्न हुआ, एक विष्णुसे जगत्‌की रक्षा होती है तथा एक रुद्रसे जगत्‌का संहार होता है। इस प्रकार शिवतत्त्वसे यह विश्व व्याप्त है। वह परमात्मा निर्गुण भी है तथा सगुण भी है। लिङ्ग अर्थात् व्यक्त तथा अलिङ्ग अर्थात् अव्यक्तरूपमें कही गयी सभी मूर्तियाँ शिवात्मक ही हैं; इसलिये यह ब्रह्माण्ड साक्षात् ब्रह्मरूप है। वही अलिङ्गी अर्थात् अव्यक्त तथा बीजी भगवत्तत्त्व परमेश्वर है॥ ६-८॥
बीजं योनिश्च निर्बीजं निर्बीजो बीजमुच्यते।<br>बीजयोनिप्रधानानामात्माख्या वर्तते त्विह॥ ९वह परमात्मा बीज (ब्रह्मा) भी है, योनि (विष्णु) भी है तथा निर्बीज (शिव) भी है और बीजरहित वह शिव जगत्‌का बीज अर्थात् मूल कारण कहा जाता है। बीजरूप ब्रह्मा, योनिरूप विष्णु तथा प्रधानरूप शिवकी इस जगत्‌में अपनी-अपनी विश्व, प्राज्ञ तथा तैजस अवस्थाकी संज्ञा भी है॥ ९॥
परमात्मा मुनिर्ब्रह्मा नित्यबुद्धस्वभावतः।<br>विशुद्धोऽयं तथा रुद्रः पुराणे शिव उच्यते॥ १०यह विशुद्ध मुनिरूप परब्रह्म परमात्मा रुद्र नित्यबुद्धस्वभावके कारण पुराणोंमें ‘शिव’ कहे गये हैं॥ १०॥
शिवेन दृष्टा प्रकृतिः शैवी समभवद् द्विजाः।<br>सर्गादौ सा गुणैर्युक्ता पुरा व्यक्ता स्वभावतः॥ ११हे विप्रो! शिवकी दृष्टिमात्रसे प्रकृति ‘शैवी’ हो गयी तथा सृष्टिके समय अव्यक्त स्वभाववाली वह प्रकृति गुणोंसे युक्त हो गयी॥ ११॥
अव्यक्तादिविशेषान्तं विश्वं तस्याः समुच्छितम्।<br>विश्वधात्री त्वजाख्या च शैवी सा प्रकृतिः स्मृता॥ १२अव्यक्त तथा महत्तत्त्वादिसे लेकर स्थूल पंचमहाभूतपर्यन्त सम्पूर्ण जगत् उसी प्रकृतिके अधीन है। अतः विश्वको धारण करनेवाली शैवीशक्ति प्रकृति ही अजा नामसे कही गयी है॥ १२॥
तामजां लोहितां शुक्लां कृष्णामेकां बहुप्रजाम्।<br>जनित्रीमनुशेते स्म जुषमाणः स्वरूपिणीम्॥ १३रक्तवर्णा अर्थात् रजोगुणवाली, शुक्लवर्णा अर्थात् सत्त्वगुणवाली तथा कृष्णवर्णा अर्थात् तमोगुणवाली एवं
२०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बहुविध प्रजाओंकी उत्पत्ति करनेवाली अजास्वरूपिणी उस प्रकृतिकी प्रेमपूर्वक सेवा करता हुआ यह बद्ध जीव उसका अनुसरण करता है॥ १३॥
तामेवाजामजोऽन्यस्तु भुक्तभोगां जहाति च।<br>अजा जनित्री जगतां साजेन समधिष्ठिता॥ १४दूसरे प्रकारका अनासक्त जीव प्रकृतिके भोगोंको भोगकर और उसकी असारता तथा क्षणभंगुरताको समझकर उस मायाका परित्याग कर देता है। परमेश्वरके द्वारा अधिष्ठित वह अजा अनन्त ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिकर्त्री है॥ १४॥
प्रादुर्बभूव स महान् पुरुषाधिष्ठितस्य च।<br>अजाज्ञया प्रधानस्य सर्गकाले गुणैस्त्रिभिः॥ १५सृष्टिके समयमें तीन गुणोंसे युक्त अजरूप पुरुषकी आज्ञासे उसमें अधिष्ठित मायासे वह महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ॥ १५॥
सिसृक्षया चोद्यमानः प्रविश्याव्यक्तमव्ययम्।<br>व्यक्तसृष्टिं विकुरुते चात्मनाधिष्ठितो महान्॥ १६सृष्टि करनेकी इच्छासे युक्त होकर उस अधिष्ठित महत्तत्त्वने स्वतः अव्यय तथा अव्यक्त पुरुषमें प्रविष्ट होकर व्यक्त सृष्टिमें विक्षोभ उत्पन्न किया॥ १६॥
महत्तस्तु तथा वृत्तिः सङ्कल्पाध्यवसायिका।<br>महत्तस्त्रिगुणस्तस्मादहङ्कारो रजोऽधिकः॥ १७<br><br>तेनैव चावृतः सम्यगहङ्कारस्तमोऽधिकः।<br>महतो भूततन्मात्रं सर्गकृद्वै बभूव च॥ १८उस महत्तत्त्वसे संकल्प-अध्यवसायवृत्तिरूप सात्त्विक अहंकार उत्पन्न हुआ तथा उसी महत्तत्त्वसे त्रिगुणात्मकरूप रजोगुणकी अधिकतावाला राजस अहंकार उत्पन्न हुआ और उस रजोगुणसे सम्यक् प्रकारसे आवृत तमोगुणकी अधिकतावाला तामस अहंकार भी उसी महत्तत्त्वसे उत्पन्न हुआ है तथा उसी अहंकारसे सृष्टिको व्याप्त करनेवाली शब्द, स्पर्श आदि तन्मात्राएँ भी उत्पन्न हुई हैं॥ १७-१८॥
अहङ्काराच्छब्दमात्रं तस्मादाकाशमव्ययम्।<br>सशब्दमावृणोत्पश्चादाकाशं शब्दकारणम्॥ १९<br><br>तन्मात्राद्भूतसर्गश्च द्विजास्त्वेवं प्रकीर्तितः।<br>स्पर्शमात्रं तथाकाशात्तस्माद्वायुर्महान् मुने॥ २०<br><br>तस्माच्च रूपमात्रं तु ततोऽग्निश्च रसस्ततः।<br>रसादापः शुभास्ताभ्यो गन्धमात्रं धरा ततः॥ २१महत्तत्त्वजन्य उस तामस अहंकारसे शब्द तन्मात्रावाले अव्यय आकाशकी उत्पत्ति हुई और बादमें शब्दके कारणरूप उस अहंकारने शब्दयुक्त आकाशको व्याप्त कर लिया। हे विप्रो! इसी प्रकार तन्मात्रात्मक भूतसर्गके विषयमें कहा गया है। हे मुने! उस आकाशसे स्पर्श-तन्मात्रावाला महान् वायु उत्पन्न हुआ। पुनः उस वायुसे रूपतन्मात्रावाले अग्निकी उत्पत्ति हुई तथा अग्निसे रसतन्मात्रावाले जलका प्रादुर्भाव हुआ। फिर रसतन्मात्रावाले उस जलसे गन्धतन्मात्रावाली कल्याणमयी पृथिवीकी उत्पत्ति हुई॥ १९-२१॥
आवृणोद्धि तथाकाशं स्पर्शमात्रं द्विजोत्तमाः।<br>आवृणोद्रूपमात्रं तु वायुर्वाति क्रियात्मकः॥ २२हे श्रेष्ठ विप्रो! आकाश स्पर्शतन्मात्रावाले वायुको आवृत किये रहता है तथा रूपतन्मात्रावाले अग्निको आच्छादित करके यह क्रियाशील वायु बहता रहता है॥ २२॥

अध्याय ३ ] अलिङ्ग एवं लिङ्गतत्त्वका स्वरूप···महेश्वर शिवकी महिमा २१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आवूर्णोद्रसमात्रं वै देवः साक्षाद्विभावसुः।<br>आवृण्वाना गन्धमात्रमापः सर्वरसात्मिकाः॥ २३साक्षात् अग्निदेव रसतन्मात्रवाले जलको आच्छादित किये रहते हैं तथा सभी रसोंसे युक्त जलतत्त्व गन्धतन्मात्रावाली पृथ्वीको आच्छादित किये रहता है॥ २३॥
क्ष्मा सा पञ्चगुणा तस्मादेकोना रससम्भवाः।<br>त्रिगुणो भगवान् वह्निर्द्विगुणः स्पर्शसम्भवः॥ २४<br><br>अवकाशस्ततो देव एकमात्रस्तु निष्कलः।<br>तन्मात्राद्भूतसर्गश्च विज्ञेयश्च परस्परम्॥ २५इस प्रकार पृथ्वी पाँच (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध) गुणोंसे, गन्धरहित शेष चार गुणोंसे जल, भगवान् अग्नि तीन गुणोंसे तथा स्पर्शसमन्वित वायु दो गुणोंसे युक्त हुए और अन्य अवयवोंसे रहित आकाशदेव मात्र एक गुणवाले हुए। इस प्रकार तन्मात्राओंके पारस्परिक संयोगवाला भूतसर्ग कहा गया है॥ २४-२५॥
वैकारिकः सात्त्विको वै युगपत्सम्प्रवर्तते।<br>सर्गस्तथाप्यहङ्कारादेवमत्र प्रकीर्तितः॥ २६राजस, तामस तथा सात्त्विक सर्ग साथ-साथ प्रवृत्त होते हैं, किंतु यहाँपर तामस अहंकारसे ही सर्गका होना बताया गया है॥ २६॥
पञ्च बुद्धीन्द्रियाण्यस्य पञ्च कर्मेन्द्रियाणि तु।<br>शब्दादीनामवाप्त्यर्थं मनश्चैवोभयात्मकम्॥ २७शब्द-स्पर्श आदिको ग्रहण करनेके लिये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा उभयात्मक मन इस जीवके लिये बनाये गये हैं॥ २७॥
महदादिविशेषान्ता ह्याण्डमुत्पादयन्ति च।<br>जलबुद्बुदवत्तस्मादवतीर्णः पितामहः॥ २८<br><br>स एव भगवान् रुद्रो विष्णुर्विश्वगतः प्रभुः।<br>तस्मिन्नण्डे त्विमे लोका अन्तर्विश्वमिदं जगत्॥ २९महत्तत्त्वादिसे लेकर पंचमहाभूतपर्यन्त सभी तत्त्व अण्डकी उत्पत्ति करते हैं। वह परमात्मा ही पितामह ब्रह्मा, शंकर तथा विश्वव्यापी प्रभु विष्णुके रूपमें उस अण्डसे जलके बुलबुलेकी भाँति अवतीर्ण हुआ। ये सभी लोक तथा उनके भीतरका यह सम्पूर्ण जगत् उस अण्डमें सन्निविष्ट था॥ २८-२९॥
अण्डं दशगुणेनैव वारिणा प्रावृतं बहिः।<br>आपो दशगुणेनैव तद्वाह्ये तेजसा वृताः॥ ३०वह अण्ड अपनेसे दस गुने जलसे बाहरसे व्याप्त था और जल बाहरसे अपनेसे दस गुने तेजसे आवृत था॥ ३०॥
तेजो दशगुणेनैव बाह्यतो वायुना वृतम्।<br>वायुर्दशगुणेनैव बाह्यतो नभसा वृतः॥ ३१तेज अपनेसे दस गुने वायुसे बाहरसे आवृत था और वायु अपनेसे दस गुने आकाशसे बाहरसे आवृत था॥ ३१॥
आकाशेनावृतो वायुरहङ्कारेण शब्दजः।<br>महता शब्दहेतुर्वै प्रधानेनावृतः स्वयम्॥ ३२शब्दजन्य वायुको आवृत किये हुए वह आकाश तामस अहंकारसे आवृत है। शब्द-हेतु आकाशको आवृत करनेवाला वह तामस अहंकार महत्तत्त्वसे घिरा हुआ है और वह महत्तत्त्व स्वयं अव्यक्त प्रधानसे आवृत है॥ ३२॥
सप्ताण्डावरणान्याहुस्तस्यात्मा कमलासनः।<br>कोटिकोटियुतान्यत्र चाण्डानि कथितानि तु॥ ३३उस अण्ड (ब्रह्माण्ड)-के ये सात प्राकृत आवरण कहे गये हैं। कमलासन ब्रह्माजी उसकी आत्मा हैं। इस सृष्टिमें करोड़ों-करोड़ों अण्डों (ब्रह्माण्डों)-की स्थितिके विषयमें कहा गया है॥ ३३॥

४- ब्रह्माजीकी आयुका परिमाण, कालका स्वरूप, कल्प, मन्वन्तर एवं युगादिका मान तथा ब्रह्माजीद्वारा विभिन्न लोकोंकी संरचना

२२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग


| तत्र तत्र चतुर्वक्त्रा ब्रह्माणो हरयो भवाः।<br>सृष्टाः प्रधानेन तदा लब्ध्वा शम्भोस्तु सन्निधिम् ॥ ३४<br><br>लयश्चैव तथान्योऽन्यमाद्यन्तमिति कीर्तितम्।<br>सर्गस्य प्रतिसर्गस्य स्थितेः कर्ता महेश्वरः ॥ ३५ | प्रधान (प्रकृति) ही सदाशिवके आश्रयको प्राप्त करके इन करोड़ों ब्रह्माण्डोंमें सर्वत्र चतुर्मुख ब्रह्मा, विष्णु और शिवका सृजन करती है। अन्तमें शम्भुका सहयोग प्राप्तकर वहीं प्रधान लय भी करती है। इस प्रकार परस्पर सम्बद्ध आदि (सृष्टि) तथा अन्त (प्रलय)-के विषयमें कहा गया है। इस सृष्टिकी रचना, पालन तथा संहार करनेवाले वे ही एकमात्र महेश्वर हैं ॥ ३४-३५ ॥ | | सर्गे च रजसा युक्तः सत्त्वस्थः प्रतिपालने।<br>प्रतिसर्गे तमोद्रिक्तः स एव त्रिविधः क्रमात् ॥ ३६ | वे ही महेश्वर क्रमपूर्वक तीन रूपोंमें होकर सृष्टि करते समय रजोगुणसे युक्त रहते हैं, पालनकी स्थितिमें सत्त्वगुणमें स्थित रहते हैं तथा प्रलयकालमें तमोगुणसे आविष्ट रहते हैं ॥ ३६ ॥ | | आदिकर्ता च भूतानां संहर्ता परिपालकः।<br>तस्मान्महेश्वरो देवो ब्रह्मणोऽधिपतिः शिवः ॥ ३७<br><br>सदाशिवो भवो विष्णुर्ब्रह्मा सर्वात्मको यतः।<br>एतदण्डे तथा लोका इमे कर्ता पितामहः ॥ ३८ | वे ही भगवान् शिव प्राणियोंके सृष्टिकर्ता, पालक तथा संहर्ता हैं। अतएव वे महेश्वर ब्रह्माके अधिपतिरूपमें प्रतिष्ठित हैं, जिस कारणसे भगवान् सदाशिव भव, विष्णु, ब्रह्मा आदि रूपोंमें स्थित हैं तथा सर्वात्मक हैं, इसी कारण वे ही ब्रह्माण्डवर्ती इन लोकोंके रूपमें तथा इनके कर्ता पितामहके रूपमें कहे गये हैं ॥ ३७-३८ ॥ | | प्राकृतः कथितस्त्वेष पुरुषाधिष्ठितो मया।<br>सर्गश्चाबुद्धिपूर्वस्तु द्विजाः प्राथमिकः शुभः ॥ ३९ | हे द्विजो! पुरुषाधिष्ठित यह प्राथमिक ईश्वरकृत अबुद्धिपूर्वक उत्पन्न तथा कल्याणकारी प्राकृत सर्ग मैंने तुम्हें सुनाया है ॥ ३९ ॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे प्राकृतप्राथमिकसर्गकथनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'प्राकृतप्राथमिकसर्गकथन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥


चौथा अध्याय

ब्रह्माजीकी आयुका परिमाण, कालका स्वरूप, कल्प, मन्वन्तर एवं युगादिका मान तथा ब्रह्माजीद्वारा विभिन्न लोकोंकी संरचना

| सूत उवाच<br>अथ प्राथमिकस्येह यः कालस्तदहः स्मृतम्।<br>सर्गस्य तादृशी रात्रिः प्राकृतस्य समासतः ॥ १ | सूतजी बोले—ब्रह्माकी प्राकृत सृष्टिका जो समय है, वही उनका दिन है तथा उतने ही परिमाणकी उनकी रात्रि है ॥ १ ॥ | | दिवा सृष्टिं विकुरुते रजन्यां प्रलयं विभुः।<br>औपचारिकमस्यैतदहोरात्रं न विद्यते ॥ २ | वे ब्रह्मा दिनमें सृष्टि करते हैं तथा रातमें प्रलय करते हैं। ब्रह्माका अहोरात्र उत्पत्ति-प्रलयरूपात्मक है, मनुष्योंके दिन-रातके समान सूर्योदयास्तवाला नहीं है ॥ २ ॥ |

अध्याय ४ ] ब्रह्माजीकी आयुका परिमाण...विभिन्न लोकोंकी संरचना [ २३


| दिवा विकृतयः सर्वे विकारा विश्वदेवताः।<br>प्रजानां पतयः सर्वे तिष्ठन्त्यन्ये महर्षयः॥ ३<br><br>रात्रौ सर्वे प्रलीयन्ते निशान्ते सम्भवन्ति च।<br>अहस्तु तस्य वै कल्पो रात्रिस्तादृग्विधा स्मृता॥ ४ | दिनमें सभी प्रकारकी वैकारिक सृष्टि, समस्त देवता, सभी प्रजापतिगण तथा अन्य महर्षि लोग विद्यमान रहते हैं तथा रातमें ये सभी विलीन हो जाते हैं। रातकी समाप्तिपर वे सभी पुनः उत्पन्न हो जाते हैं। ब्रह्माका एक दिन ही एक कल्प कहा जाता है तथा उसी प्रकार उनकी रात भी एक कल्पके मानके तुल्य कही गयी है॥ ३-४॥ | | चतुर्युगसहस्रान्ते मनवस्तु चतुर्दश।<br>चत्वारि तु सहस्राणि वत्सराणां कृतं द्विजाः॥ ५<br><br>तावच्छती च वै सन्ध्या सन्ध्यांशश्च कृतस्य तु।<br>त्रिशती द्विशती सन्ध्या तथा चैकशती क्रमात्॥ ६ | एक हजार चतुर्युगीकी अवधिमें चौदह मनु उत्पन्न होते हैं। हे विप्रो! सत्ययुगका काल चार हजार दिव्य वर्षोंका है और उस सत्ययुगके चार सौ वर्षोंकी सन्ध्या तथा सन्ध्यांश होते हैं। उसी प्रकार क्रमसे त्रेतायुगकी सन्ध्या तीन सौ वर्षकी, द्वापरकी सन्ध्या दो सौ वर्षकी तथा कलियुगकी सन्ध्या एक सौ वर्षकी होती है॥ ५-६॥ | | अंशकः षट्शतं तस्मात् कृतसन्ध्यांशकं विना।<br>त्रिद्व्येकसाहस्रमितौ विना सन्ध्यांशके न तु॥ ७ | इस प्रकार सत्ययुगके सन्ध्यांशकको छोड़कर अन्य तीन युगोंके कुल सन्ध्यांशक छः सौ वर्षके होते हैं तथा इन त्रेता, द्वापर और कलिके सन्ध्या-सन्ध्यांशकको छोड़कर इनका नियत समय क्रमशः तीन हजार, दो हजार तथा एक हजार वर्षोंका होता है॥ ७॥ | | त्रेताद्वापरतिष्याणां कृतस्य कथयामि वः।<br>निमेषपञ्चदशका काष्ठा स्वस्थस्य सुव्रताः॥ ८<br><br>मर्त्यस्य चाक्ष्णोस्तस्याश्च ततस्त्रिंशतिका कला।<br>कला त्रिंशतिको विप्रा मुहूर्त इति कल्पितः॥ ९ | हे सुव्रत ऋषियो! अब मैं आप लोगोंको त्रेता, द्वापर, कलियुग तथा सत्ययुगके कालमान बताता हूँ। स्वस्थ मनुष्यके नेत्रके पन्द्रह निमेषके समयको एक काष्ठा कहते हैं और तीस काष्ठाकी एक कला होती है। हे विप्रो! तीस कलाको मिलाकर एक मुहूर्त कहा जाता है॥ ८-९॥ | | मुहूर्तपञ्चदशिका रजनी तादृशं त्वहः।<br>पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः॥ १०<br><br>कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी।<br>त्रिंशद्द्ये मानुषा मासाः पित्र्यो मासस्तु स स्मृतः॥ ११ | पन्द्रह मुहूर्तकी एक रात होती है तथा उसी प्रकार पन्द्रह मुहूर्तका एक दिन होता है। मनुष्योंका एक कृष्णपक्ष पितरोंके एक दिनके बराबर होता है तथा शुक्लपक्ष उनकी स्वप्नसम्बन्धी रातके समान होता है। मनुष्योंके तीस महीनेका समय पितरोंके एक मासके बराबर माना गया है॥ १०-११॥ | | शतानि त्रीणि मासानां षष्ट्या चाप्यधिकानि वै।<br>पित्र्यः सम्वत्सरो ह्येष मानुषेण विभाव्यते॥ १२ | मनुष्योंके तीन सौ साठ महीनोंका समय पितरोंका एक संवत्सर (वर्ष) माना जाता है॥ १२॥ | | मानुषेणैव मानेन वर्षाणां यच्छतं भवेत्।<br>पितॄणां त्रीणि वर्षाणि संख्यातानीह तानि वै॥ १३<br><br>दश वै द्व्यधिका मासाः पितृसंख्येह संस्मृता।<br>लौकिकेनैव मानेन अब्दो यो मानुषः स्मृतः॥ १४ | मानवीय मानसे सन्ध्या-सन्ध्यांशसहित जो १०० वर्ष होते हैं, यहाँ वे ही पितरोंके तीन वर्ष कहे गये हैं। जैसे लौकिक मानसे बारह मासका एक मानववर्ष होता है, |

२४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतद्दिव्यमहोरात्रमिति लैङ्गेऽत्र पठ्यते।<br>दिव्ये रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः॥ १५उसी प्रकार पितृमानसे बारह मासका एक पितृवर्ष होता है। लिङ्गपुराणमें इस प्रकार दिव्य अहोरात्र तथा दिव्य वर्षका विभागपूर्वक वर्णन किया गया है॥ १३—१५॥
अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद्दक्षिणायनम्।<br>एते रात्र्यहनी दिव्ये प्रसंख्याते विशेषतः॥ १६सूर्यका उत्तरकी ओर संक्रमण [उत्तरायण—सूर्यका मकरराशिसे मिथुनराशितक] ही देवताओंका दिवस तथा सूर्यका दक्षिणकी ओर संक्रमण [दक्षिणायन—कर्कराशिसे धनुराशितक] ही देवोंकी रात्रि होती है। विशेषतया ये दिव्य अहोरात्र कहे गये हैं॥ १६॥
त्रिंशद्यानि तु वर्षाणि दिव्यो मासस्तु स स्मृतः।<br>मानुषं तु शतं विप्रा दिव्यमासास्त्रयस्तु ते॥ १७मनुष्योंके तीस वर्षोंका काल देवताओंके एक महीनेके समयके बराबर होता है। हे विप्रो! मनुष्योंका एक सौ वर्ष देवताओंके तीन माह तथा दस दिनके बराबर माना गया है॥ १७<sup></sup>/<sub></sub>
दश चैव तथाहानि दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः।<br>त्रीणि वर्षशतान्येव षष्टिवर्षाणि यानि तु॥ १८मनुष्योंके तीन सौ साठ वर्षोंका कालमान देवताओंके एक वर्षके समयके तुल्य कहा गया है॥ १८<sup></sup>/<sub></sub>
दिव्यः सम्वत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्तितः।<br>त्रीणि वर्षसहस्त्राणि मानुषाणि प्रमाणतः॥ १९मनुष्योंके कालप्रमाणके अनुसार उनके तीन हजार तीस वर्ष सप्तर्षियोंके एक वर्षके बराबर माने गये हैं॥ १९<sup></sup>/<sub></sub>
त्रिंशदन्यानि वर्षाणि मतः सप्तर्षिवत्सरः।<br>नव यानि सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु॥ २०मनुष्योंके नौ हजार नब्बे वर्षोंको मिलाकर वह एक ध्रौव्य वर्ष (ध्रुव वर्ष) होता है॥ २०<sup></sup>/<sub></sub>
अन्यानि नवतीश्चैव ध्रौवः संवत्सरस्तु सः।<br>षट्त्रिंशत्तु सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु॥ २१मनुष्योंका जो छत्तीस हजार वर्षोंका समय है, वही देवताओंका सौ वर्ष कहा जाता है॥ २१<sup></sup>/<sub></sub>
वर्षाणां तच्छतं ज्ञेयं दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः।<br>त्रीण्येव नियुतान्याहुर्वर्षाणां मानुषाणि तु॥ २२<br>षष्टिश्चैव सहस्राणि संख्यातानि तु संख्यया।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु प्राहुः संख्याविदो जनाः॥ २३कालगणनाके विद्वान् मनुष्योंके तीन लाख साठ हजार वर्षोंके समयको देवताओंके एक हजार वर्षोंके बराबर कहते हैं॥ २२-२३॥
दिव्येनैव प्रमाणेन युगसंख्याप्रकल्पनम्।<br>पूर्वं कृतयुगं नाम ततस्त्रेता विधीयते॥ २४<br>द्वापरश्च कलिश्चैव युगान्येतानि सुव्रताः।<br>अथ संवत्सरा दृष्टा मानुषेण प्रमाणतः॥ २५देवताओंके ही कालप्रमाणसे युगोंकी संख्या कल्पित की गयी है। हे सुव्रत ऋषियो! सर्वप्रथम सत्ययुग, इसके बाद त्रेता, फिर द्वापर और अन्तमें कलियुग—ये चार युग कहे गये हैं। अब मानुषीवर्ष-प्रमाणसे इनका काल बताया जाता है॥ २४-२५॥
कृतस्याद्यस्य विप्रेन्द्रा दिव्यमानेन कीर्तितम्।<br>सहस्राणां शतान्यासंचतुर्दश च संख्यया॥ २६<br>चत्वारिंशत्सहस्राणि तथान्यानि कृतं युगम्।<br>तथा दशसहस्राणां वर्षाणां शतसंख्यया॥ २७<br>अशीतिश्च सहस्राणि कालस्त्रेतायुगस्य च।<br>सप्तैव नियुतान्याहुर्वर्षाणां मानुषाणि तु॥ २८<br>विंशतिश्च सहस्राणि कालस्तु द्वापरस्य च।<br>तथा शतसहस्राणि वर्षाणां त्रीणि संख्यया॥ २९<br>षष्टिश्चैव सहस्राणि कालः कलियुगस्य तु।<br>एवं चतुर्युगः काल ऋते सन्ध्यांशकात्स्मृतः॥ ३०हे विप्रवरो! प्रथम कृतयुगका कालमान देवताओंके प्रमाणसे बताया जा चुका है। वह कृतयुग मानुषी वर्षसे चौदह लाख चालीस हजार वर्षोंका है तथा त्रेतायुगका कालमान दस लाख अस्सी हजार वर्षोंका, द्वापरयुगका कालमान सात लाख बीस हजार वर्षोंका तथा कलियुगका समय तीन लाख साठ हजार वर्षोंका कहा गया है। इस

अध्याय ४ ] ब्रह्माजीकी आयुका परिमाण…विभिन्न लोकोंकी संरचना २५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नियुतान्येव षट्त्रिंशन्निर्शानि तु तानि वै।<br>चत्वारिंशत्तथा त्रीणि नियुतानीह संख्यया॥ ३१<br>विंशतिश्च सहस्त्राणि सन्ध्यांशश्च चतुर्युगः।<br>एवं चतुर्युगाख्यानां साधिका ह्येकसप्ततिः॥ ३२<br>कृतत्रेतादियुक्तानां मनोरन्तरमुच्यते।<br>मन्वन्तरस्य संख्या च वर्षग्रेण प्रकीर्तिता॥ ३३प्रकार सन्ध्या तथा सन्ध्यांशको छोड़कर चारों युगोंका काल छत्तीस लाख वर्ष कहा गया है। चारों युगोंके सन्ध्यांशका काल तीन लाख साठ हजार वर्ष होता है॥ २६-३११/२॥<br><br>इकहत्तर कृत-त्रेतादि चतुर्युगोंके कालसे कुछ अधिक कालको एक मन्वन्तर कहा जाता है और आगे दिये गये वर्षोंसे मन्वन्तरकी संख्या कही गयी है॥ ३२-३३॥
त्रिंशत्कोट्यस्तु वर्षाणां मानुषेण द्विजोत्तमाः।<br>सप्तषष्टिस्तथान्यानि नियुतान्यधिकानि तु॥ ३४<br>विंशतिश्च सहस्राणि कालोऽयमधिकं विना।<br>मन्वन्तरस्य संख्यैषा लैङ्गेऽस्मिन् कीर्तिता द्विजाः॥ ३५हे उत्तम ब्राह्मणो! मनुष्यवर्षसे तीस करोड़ सरसठ लाख बीस हजार वर्षोंका काल सभी मनुओंका होता है; हे द्विजो! ऐसा इस लिङ्गपुराणमें बताया गया है॥ ३४-३५॥
चतुर्युगस्य च तथा वर्षसंख्या प्रकीर्तिता।<br>चतुर्युगसहस्त्रं वै कल्पश्चैको द्विजोत्तमाः॥ ३६हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! चतुर्युगकी भी वर्षसंख्या कही गयी है। एक हजार चतुर्युगोंका काल एक कल्प कहा गया है॥ ३६॥
निशान्ते सृजते लोकान् नश्यन्ते निशि जन्तवः।<br>तत्र वैमानिकानां तु अष्टाविंशतिकोटयः॥ ३७<br>मन्वन्तरेषु वै संख्या सान्तरेषु यथातथा।<br>त्रीणि कोटिशतान्यासन् कोट्यो द्विनवतिस्तथा॥ ३८<br>कल्पेऽतीते तु वै विप्राः सहस्राणां तु सप्ततिः।<br>पुनस्तथाष्टसाहस्त्रं सर्वत्रैव समासतः॥ ३९ब्रह्माजी दिनके आरम्भमें जगत्की रचना करते हैं तथा रात्रिमें प्राणियोंका संहार होता है। उनमें देवताओंकी संख्या अट्ठाईस करोड़ है। यह संख्या मन्वन्तरोंमें तीन सौ बानबे करोड़ होती है। हे ब्राह्मणो! कल्प व्यतीत होनेपर यह संख्या अठहत्तर हजार होती है॥ ३७-३९॥
कल्पावसानिकांस्त्यक्त्वा प्रलये समुपस्थिते।<br>महर्लोकात्प्रयान्त्येते जनलोकं जनास्ततः॥ ४०प्रलयकाल उपस्थित होनेपर कल्पके अन्तमें विद्यमान देवताओंको छोड़कर महर्लोकमें निवास करनेवाले लोग जनलोकमें चले जाते हैं॥ ४०॥
कोटीनां द्वे सहस्त्रे तु अष्टौ कोटिशतानि तु।<br>द्विषष्टिश्च तथा कोट्यो नियुतानि च सप्ततिः॥ ४१<br>कल्पार्धसंख्या दिव्या वै कल्पमेवन्तु कल्पयेत्।<br>कल्पानां वै सहस्त्रन्तु वर्षमेकमजस्य तु॥ ४२आधे दिव्य (देव) कल्पकी वर्षसंख्या दो हजार आठ सौ बासठ करोड़ सत्तर लाख है; इसीसे कल्पकी संख्या ज्ञात होती है। हजार कल्पोंका काल ही ब्रह्माजीका एक वर्ष है॥ ४१-४२॥
वर्षाणामष्टसाहस्रं ब्राह्मं वै ब्रह्मणो युगम्।<br>सवनं युगसाहस्रं सर्वदेवोद्भवस्य तु॥ ४३ब्रह्माके आठ हजार वर्षोंका काल (आठ हजार ब्राह्म वर्ष) ब्रह्माका एक युग होता है। सभी देवोंके उत्पत्तिकर्ता ब्रह्माका एक हजार युग विष्णुके एक दिनके बराबर होता है॥ ४३॥
सवनानां सहस्रं तु त्रिविधं त्रिगुणं तथा।<br>ब्रह्मणस्तु तथा प्रोक्तः कालः कालात्मनः प्रभोः॥ ४४विष्णुके नौ हजार दिनोंका समय कालात्मा प्रभु ब्रह्मस्वरूप रुद्रके एक दिनका समय कहा गया है॥ ४४॥
२६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| भवोद्भवस्तपश्चैव भव्यो रम्भः क्रतुः पुनः।<br>ऋतुर्वह्निर्हव्यवाहः सावित्रः शुद्ध एव च॥ ४५<br>उशिकः कुशिकश्चैव गान्धारो मुनिसत्तमाः।<br>ऋषभश्च तथा षड्जो मजालीयश्च मध्यमः॥ ४६<br>वैराजो वै निषादश्च मुख्यो वै मेघवाहनः।<br>पञ्चमश्चित्रकश्चैव आकूतिर्ज्ञान एव च॥ ४७<br>मनः सुदर्शो बृहंश्च तथा वै श्वेतलोहितः।<br>रक्तश्च पीतवासाश्च असितः सर्वरूपकः॥ ४८ | हे मुनिश्रेष्ठो! भवोद्भव, तप, भव्य, रम्भ, क्रतु, ऋतु, वह्नि, हव्यवाह, सावित्र, शुद्ध, उशिक, कुशिक, गान्धार, ऋषभ, षड्ज, मजालीय, मध्यम, वैराज, निषाद, मुख्य, मेघवाहन, पंचम, चित्रक, आकूति, ज्ञान, मन, सुदर्श, बृंह, श्वेतलोहित, रक्त, पीतवासा, असित एवं सर्वरूपक—ये तैंतीस संख्यावाले कल्प उस अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके होते हैं॥ ४५-४८१/२ ॥ | | एवं कल्पास्तु संख्याता ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।<br>कोटिकोटिसहस्राणि कल्पानां मुनिसत्तमाः॥ ४९ | हे मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार ब्रह्माके दिन-रातमें हजारों करोड़ कल्प बीत गये तथा शेष अभी व्यतीत होंगे॥ ४९१/२ ॥ | | गतानि तावच्छेषाणि अहर्निश्यानि वै पुनः।<br>परान्ते वै विकारणि विकारं यान्ति विश्वतः॥ ५० | महाप्रलयके समय सम्पूर्ण सृष्टिका लय हो जाता है और पश्चात् शिवकी आज्ञासे प्रलयका भी प्रलय हो जाता है॥ ५०१/२ ॥ | | विकारस्य शिवस्याज्ञावशेनैव तु संहृतिः।<br>संहृते तु विकारे च प्रधाने चात्मनि स्थिते॥ ५१ | इस प्रकार सबका प्रलय हो जानेपर तथा प्रकृतिके परमात्मामें स्थित हो जानेपर केवल प्रधान (प्रकृति) तथा पुरुष—ये दो ही रह जाते हैं॥ ५११/२ ॥ | | साधर्म्येणावतिष्ठेते प्रधानपुरुषावुभौ।<br>गुणानाञ्चैव वैषम्ये विप्राः सृष्टिरिति स्मृता॥ ५२ | हे विप्रो! इस प्रकार गुणोंकी ही विषमतासे सृष्टि तथा गुणोंके ही साम्यसे प्रलय होते हैं और उन दोनोंका हेतु वे ही महेश्वर हैं॥ ५२१/२ ॥ | | साम्ये लयो गुणानान्तु तयोर्हेतुर्महेश्वरः।<br>लीलया देवदेवेन सर्गास्त्वीदृग्विधाः कृताः॥ ५३ | उन देवाधिदेवने अपनी लीलासे इस प्रकारकी असंख्य सृष्टि की है। वे सर्ग प्रधानसे अन्वधिष्ठित होते हैं॥ ५३१/२ ॥ | | असंख्याताश्च सङ्क्षेपात् प्रधानादन्वधिष्ठितात्।<br>असंख्याताश्च कल्पाख्या ह्यसंख्याताः पितामहाः॥ ५४ | इस प्रकार असंख्य कल्प, अनगिनत पितामह (ब्रह्मा) तथा असंख्य विष्णु उत्पन्न होते हैं; किंतु वे महेश्वर मात्र एक हैं॥ ५४१/२ ॥ | | हरयश्चाप्यसंख्यातास्त्वेक एव महेश्वरः।<br>प्रधानादिप्रवृत्तानि लीलया प्राकृतानि तु॥ ५५<br>गुणात्मिका च तद्वृत्तिस्तस्य देवस्य वै त्रिधा।<br>अप्राकृतस्य तस्यादिर्मध्यान्तं नास्ति चात्मनः॥ ५६ | प्रकृति अपनी लीलासे प्राकृत सर्गकी रचना करती है और उस परमात्माकी वृत्ति तीन प्रकारके गुणों (सत्-रज-तम)-वाली है। उस अप्राकृतका अपना न कोई आदि है, न मध्य है और न अन्त ही है॥ ५५-५६॥ | | पितामहस्याथ परः परार्धद्वयसम्मितः।<br>दिवा सृष्टं तु यत्सर्वं निशि नश्यति चास्य तत्॥ ५७ | ब्रह्माकी आयु [पर] दो परार्ध है। उस ब्रह्माके द्वारा दिनमें जो भी सृजित होता है, वह सब कुछ रातमें नष्ट हो जाता है॥ ५७॥ | | भूर्भुवः स्वर्महस्तत्र नश्यते चोर्ध्वतो न च।<br>रात्रौ चैकार्णवे ब्रह्मा नष्टे स्थावरजङ्गमे॥ ५८ | भूः, भुवः, स्वः, महः—ये लोक नष्ट हो जाते हैं; किंतु इनसे ऊपरके लोकोंका नाश नहीं होता है। समस्त चर-अचरके अनन्त समुद्रमें विनष्ट हो जानेपर रात्रिमें |

५- ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि, नौ प्रकारकी सृष्टि (नवविध सर्ग)-की संरचना, मरीचि आदि ऋषियोंकी उत्पत्ति, मनु-शतरूपाका प्रादुर्भाव तथा दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन

अध्याय ५ ] ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि···दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन २७


सुषुष्वापाम्भसि यस्तस्मान्नारायण इति स्मृतः।<br>शर्वर्यन्ते प्रबुद्धो वै दृष्ट्वा शून्यं चराचरम्॥ ५९ब्रह्माजी उसी जलराशिमें शयन करते हैं; इसीलिये उन्हें नारायण कहा जाता है॥ ५८ १/२॥<br>प्रलयकालीन रातके बीतनेपर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी उठे और चराचर जगत्‌को शून्य देखकर उन्होंने सृष्टि करनेका विचार किया॥ ५९ १/२॥
स्रष्टुं तदा मतिञ्चक्रे ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।<br>उदकैराप्लुतां क्ष्मां तां समादाय सनातनः॥ ६०<br><br>पूर्ववत् स्थापयामास वाराहं रूपमास्थितः।<br>नदीनदसमुद्रांश्च पूर्ववच्चाकरोत्प्रभुः॥ ६१उन सनातन ब्रह्माने वाराहका रूप धारण करके जलमें डूबी हुई पृथ्वीको निकालकर उसे पुनः पूर्वकी भाँति स्थापित कर दिया और उसपर नदी, नद तथा समुद्रोंको उन प्रभुने पूर्वकी भाँति पुनः कर दिया॥ ६०-६१॥
कृत्वा धरां प्रयत्नेन निम्नोन्नतिविवर्जिताम्।<br>धरायां सोऽचिनोत् सर्वान् गिरीन् दग्धान् पुराग्निना॥ ६२ब्रह्माजीने प्रयत्नपूर्वक पृथ्वीतलपर दबे हुए तथा उठे भागोंको ठीक करके उन्हें समतल किया और उन्होंने पूर्वकालमें अग्निसे दग्ध सभी पर्वतोंको धरापर पुनः पूर्ववत् बना दिया॥ ६२॥
भूराद्यांश्चतुरो लोकान् कल्पयामास पूर्ववत्।<br>स्रष्टुञ्च भगवान् चक्रे तदा स्रष्टा पुनर्मतिम्॥ ६३इस प्रकार भगवान् ब्रह्माने जब भूः आदि चारों लोकोंकी पूर्वकी भाँति रचना कर ली, तब उन सृष्टिकर्ताने पुनः सृष्टि करनेका विचार किया॥ ६३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सृष्टिप्रारम्भवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘सृष्टिप्रारम्भवर्णन’ नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥


पाँचवाँ अध्याय

ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि, नौ प्रकारकी सृष्टि (नवविध सर्ग)-की संरचना, मरीचि आदि ऋषियोंकी उत्पत्ति, मनु-शतरूपाका प्रादुर्भाव तथा दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—हे ब्राह्मणो! जब ब्रह्माजीने
यदा स्रष्टुं मतिं चक्रे मोहश्चासीन्महात्मनः।<br>द्विजाश्चाबुद्धिपूर्वं तु ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ १अबुद्धिपूर्वक अर्थात् सम्यक् विचार किये बिना सृष्टिरचनाका विचार किया, तब उन अव्यक्तजन्मा महात्मा ब्रह्माको मोहने व्याप्त कर लिया॥ १॥
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रश्चान्धसंज्ञितः।<br>अविद्या पञ्चधा ह्येषा प्रादुर्भूता स्वयम्भुवः॥ २उन स्वयम्भूसे प्रथम तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) तथा अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) नामवाली—ये पाँच प्रकारकी [पंचपर्वा] अविद्याएँ उत्पन्न हो गयीं॥ २॥
अविद्यया मुनेर्ग्रस्तः सर्गो मुख्य इति स्मृतः।<br>असाधक इति स्मृत्वा सर्गो मुख्यः प्रजापतिः॥ ३ब्रह्माजीका वह मुख्य [प्रथम] सर्ग (सृष्टि) अविद्यासे ग्रस्त कहा गया है, तब उन्होंने इस प्रथम
२८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अभ्यमन्यत सोऽन्यं वै नगा मुख्योद्भवाः स्मृताः।<br>त्रिधा कण्ठो मुनेस्तस्य ध्यायतो वै ह्यवर्तत ॥ ४सर्गको सृष्टि-विस्तारका असाधक मानकर वृक्षादिरूप (वृक्ष, गुल्म, लता, वीरुध्, तृणरूप—पाँच प्रकारका सर्ग) मुख्यसर्गका सृजन किया, तदनन्तर ध्यानपूर्वक मनन करते हुए उन ब्रह्माजीका कण्ठ (चिन्तन) त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रज तथा तमोगुणसे युक्त) हो गया॥ ३-४॥
प्रथमं तस्य वै जज्ञे तिर्यक्स्रोतो महात्मनः।<br>ऊर्ध्वस्रोतः परस्तस्य सात्त्विकः स इति स्मृतः॥ ५पहले उन महात्मा ब्रह्माने तिर्यक्स्रोत पशु आदि उत्पन्न किये, तत्पश्चात् उन्होंने ऊर्ध्वस्रोतकी रचना की, जो सात्त्विकरूप कहा गया। इसके अनन्तर अर्वाक्स्रोत (मनुष्य आदि), पुनः सत्त्व, तमप्रधान अनुग्रह-सर्ग, तदुपरान्त भूतादिकोंका सर्ग रचा गया॥ ५१/२ ॥
अर्वाक्स्रोतोऽनुग्रहश्च तथा भूतादिकः पुनः।<br>ब्रह्मणो महतस्त्वाद्यो द्वितीयो भौतिकस्तथा॥ ६<br><br>सर्गस्तृतीयश्चैन्द्रियस्तूरीयो मुख्य उच्यते।<br>तिर्यग्योन्यः पञ्चमस्तु षष्ठो दैविक उच्यते॥ ७ब्रह्माजीद्वारा रचित पहला सर्ग महत्तत्वादिका है, दूसरा भौतिक सर्ग है, जो भूततन्मात्राओंका है, तीसरा ऐन्द्रियसर्ग है [ये बुद्धिपूर्वक उत्पन्न हुए तीन सर्ग प्राकृत सर्ग हैं] और चौथा मुख्य सर्ग वृक्ष आदिका कहा जाता है। तिर्यक् योनिवाले पशु-पक्षियोंवाला सर्ग पाँचवाँ सर्ग है तथा छठा देवताओंकी सृष्टिवाला [ऊर्ध्वस्रोताओंका] देवसर्ग कहा जाता है॥ ६-७॥
सप्तमो मानुषो विप्रा अष्टमोऽनुग्रहः स्मृतः।<br>नवमश्चैव कौमारः प्राकृता वैकृतास्त्विमे॥ ८सातवाँ [अर्वाक्स्रोताओंका] सर्ग मनुष्योंका, आठवाँ अनुग्रहसर्ग है, [ये पाँच वैकृतसर्ग हैं] नौवाँ कौमार सर्ग कहा जाता है। हे विप्रो! प्राकृत तथा वैकृत ये ही नौ सर्ग हैं; जिनमें प्रारम्भके तीन सर्ग प्राकृत हैं तथा पाँच सर्ग वैकृत हैं तथा नौवाँ कौमारसर्ग प्राकृत तथा वैकृत दोनों है॥ ८॥
पुरस्तादसृजद्देवः सनन्दं सनकं तथा।<br>सनातनं मुनिश्रेष्ठा नैष्कर्म्येण गताः परम्॥ ९तदुपरान्त भगवान् ब्रह्माने सनक, सनन्दन तथा सनातन [एवं सनत्कुमार] मुनि उत्पन्न किये। ये श्रेष्ठ मुनिगण निष्काम कर्मयोगसे परमपदको प्राप्त हुए॥ ९॥
मरीचिभृग्वङ्गिरसः पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठञ्च सोऽसृजद्योगविद्यया॥ १०<br><br>नवौते ब्रह्मणः पुत्रा ब्रह्मज्ञा ब्राह्मणोत्तमाः।<br>ब्रह्मवादिन एवैते ब्रह्मणः सदृशाः स्मृताः॥ ११<br><br>सङ्कल्पश्चैव धर्मश्च ह्यधर्मो धर्मसन्निधिः।<br>द्वादशैव प्रजास्त्वेता ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ १२तत्पश्चात् उन्होंने अपनी योगविद्यासे मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ—इन ऋषियोंको उत्पन्न किया। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ब्रह्माजीके ये नौ [मानस] पुत्र ब्रह्मको जाननेवाले थे। ये ब्रह्मवादी ऋषि ब्रह्माके ही तुल्य कहे गये हैं। संकल्प, धर्म तथा अधर्म भी उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी ये बारह सन्तानें कहलायीं॥ १०-१२॥
ऋभुं सनत्कुमारञ्च ससर्जादौ सनातनः।<br>तावूर्ध्वरेतसौ दिव्यौ चाग्रजौ ब्रह्मवादिनौ॥ १३उन सनातन ब्रह्माने आदिमें ऋभु तथा सनत्कुमारको

अध्याय ५] ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन २९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कुमारौ ब्रह्मणस्तुल्यौ सर्वज्ञौ सर्वभाविनौ।<br>वक्ष्ये भार्याकुलं तेषां मुनीनामग्रजन्मनाम्॥ १४उत्पन्न किया था। अग्रजन्मा वे दोनों दिव्य पुत्र नैष्ठिक ब्रह्मचारी, ब्रह्मवादी, सर्वज्ञ, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले तथा ब्रह्माके ही समान थे॥ १३ १/२॥
समासतो मुनिश्रेष्ठाः प्रजासम्भूतिमेव च।<br>शतरूपां तु वै राज्ञीं विराजमसृजत् प्रभुः॥ १५हे श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं उन अग्रजन्मा मुनियोंकी भार्याओंका कुल तथा प्रजाओंकी उत्पत्तिका संक्षेपमें वर्णन करूँगा॥ १४ १/२॥
स्वायम्भुवात्तु वै राज्ञी शतरूपा त्वयोनिजा।<br>लेभे पुत्रद्वयं पुण्या तथा कन्याद्वयं च सा॥ १६भगवान् ब्रह्माने स्वायम्भुव मनु तथा रानी शतरूपाका सृजन किया। उस अयोनिया तथा पुण्यशालिनी रानी शतरूपाने स्वायम्भुव मनुसे दो पुत्र एवं दो कन्याएँ* उत्पन्न कीं॥ १५-१६॥
उत्तानपादो ह्यवरो धीमान् ज्येष्ठः प्रियव्रतः।<br>ज्येष्ठा वरिष्ठा त्वाकूतिः प्रसूतिश्चानुजा स्मृता॥ १७उनमें बुद्धिसम्पन्न प्रियव्रत ज्येष्ठ तथा उत्तानपाद कनिष्ठ पुत्र थे। श्रेष्ठ गुणोंवाली आकूति ज्येष्ठ तथा प्रसूति छोटी कन्या थी॥ १७॥
उपयेमे तदाकूतिं रुचिर्नाम प्रजापतिः।<br>प्रसूतिं भगवान् दक्षो लोकधात्रीं च योगिनीम्॥ १८रुचि नामक प्रजापतिने आकूतिको तथा दक्षप्रजापतिने जगद्धात्री योगमयी प्रसूतिको भार्याके रूपमें ग्रहण किया॥ १८॥
दक्षिणासहितं यज्ञमाकूतिः सुषुवे तथा।<br>दक्षिणा जनयामास दिव्या द्वादशपुत्रिकाः॥ १९आकूतिने दक्षिणासहित यज्ञ नामक पुत्रको जन्म दिया और दक्षिणाने दिव्य बारह कन्याओंको उत्पन्न किया॥ १९॥
प्रसूतिः सुषुवे दक्षाच्चतुर्विंशति कन्यकाः।<br>श्रद्धां लक्ष्मीं धृतिं पुष्टिं तुष्टिं मेधां क्रियां तथा॥ २०<br><br>बुद्धिं लज्जां वपुः शान्तिं सिद्धिं कीर्तिं महातपाः।<br>ख्यातिं शान्तिं च सम्भूतिं स्मृतिं प्रीतिं क्षमां तथा॥ २१<br><br>सन्नतिं चानसूयां च ऊर्जां स्वाहां सुरारणिम्।<br>स्वधां चैव महाभागां प्रददौ च यथाक्रमम्॥ २२प्रसूतिने दक्षप्रजापतिसे श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि, तुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि, कीर्ति, ख्याति, शान्ति, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, देवताओंके लिये अरणिरूपा स्वाहा तथा स्वधा—इन तपोमयी चौबीस कन्याओंको उत्पन्न किया तथा इन महाभाग्यवती कन्याओंको आगे बताये गये क्रमके अनुसार महात्माजनोंको समर्पित कर दिया॥ २०—२२॥
श्रद्धाद्याश्चैव कीर्त्यन्तास्त्रयोदश सुदारिकाः।<br>धर्मं प्रजापतिं जग्मुः पतिं परमदुर्लभाः॥ २३<br><br>उपयेमे भृगुर्धीमान् ख्यातिं तां भार्गवारणिम्।<br>सम्भूतिञ्च मरीचिस्तु स्मृतिं चैवाङ्गिरा मुनिः॥ २४श्रद्धासे लेकर कीर्तिपर्यन्त तेरह परम दुर्लभ सुन्दर कन्याओंने प्रजापति धर्मको पतिरूपमें प्राप्त किया। बुद्धिसम्पन्न भृगुने ख्यातिको, भार्गव शुक्राचार्यने अरणि [शान्ति]-को, मरीचिने सम्भूतिको तथा मुनि अंगिराने स्मृतिको पत्नीरूपमें ग्रहण किया॥ २३-२४॥
प्रीतिं पुलस्त्यः पुण्यात्मा क्षमां तां पुलहो मुनिः।<br>ऋतुश्च सन्नतिं धीमान् अत्रिस्ताञ्चानसूयकाम्॥ २५<br><br>ऊर्जां वसिष्ठो भगवान् वरिष्ठो वारिजेक्षणाम्।<br>विभावसुस्तथा स्वाहां स्वधां वै पितरस्तथा॥ २६पुण्यात्मा पुलस्त्यने प्रीतिको, मुनि पुलहने क्षमाको, बुद्धिसम्पन्न क्रतुने सन्नतिको, अत्रिने उस अनसूयाको, श्रेष्ठ वसिष्ठने कमलके समान नेत्रोंवाली ऊर्जाको,

* यहाँ मनुकी दो पुत्रियाँ कही हैं, जबकि भागवत आदिमें 'तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे' मनुकी तीन पुत्रियाँ प्रसिद्ध हैं। लिङ्गपुराणका वर्णन ईशानकल्पका आख्यान है और भागवतका वर्णन श्वेतवाराहकल्पका है। पुराणपठित (पुराणोक्त) सभी आख्यान सत्य हैं, कल्पभेदसे ही भिन्नताकी प्रतीति है।

३०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| | भगवान् अग्निने स्वाहादेवीको तथा पितरोंने स्वधादेवीको पत्नीरूपमें स्वीकार किया॥ २५-२६॥ | | पुत्रीकृता सती या सा मानसी शिवसम्भवा।<br>दक्षेण जगतां धात्री रुद्रमेवास्थिता पतिम्॥ २७ | दक्षप्रजापतिकी शिवसम्भवा (शिवांगसम्भूता) मानसी पुत्री सती, जो सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करनेवाली हैं, ने भगवान् रुद्रको पतिरूपमें प्राप्त किया॥ २७॥ | | अर्धनारीश्वरं दृष्ट्वा सर्गादौ कनकाण्डजः।<br>विभजस्वेति चाहादौ यदा जाता तदाभवत्॥ २८ | सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माजीने शिवजीको अर्धनारीश्वर देखकर कहा कि आप स्त्री-पुरुषका विभाग कीजिये, तब शिवजीकी देहसे सतीजी अलग हो गयीं॥ २८॥ | | तस्याश्चैवांशजाः सर्वाः स्त्रियस्त्रिभुवने तथा।<br>एकादशविधा रुद्रास्तस्य चांशोद्भवस्तथा॥ २९<br>स्त्रीलिङ्गमखिलं सा वै पुंलिङ्गं नीललोहितः। | उन्हीं सतीके अंशसे तीनों लोकमें सभी स्त्रियोंकी उत्पत्ति हुई है तथा ग्यारह प्रकारके रुद्र भी उन शिवके अंशसे उत्पन्न हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण स्त्रीजातिके रूपमें वे सतीजी तथा पुरुषजातिके रूपमें नीललोहित शिवजी अधिष्ठित हैं॥ २९ १/२ ॥ | | तं दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा दक्षमालोक्य सुव्रताम्॥ ३०<br>भजस्व धात्रीं जगतां ममापि च तवापि च।<br>पुन्नाम्नो नरकात्त्राति इति पुत्री त्विहोक्तितः॥ ३१ | भगवान् ब्रह्माने सुव्रता सतीको देखकर पुनः दक्षप्रजापतिकी ओर देखकर उनसे कहा कि ये सती हमारी, आपकी तथा सम्पूर्ण जगत्‌की धात्री हैं, अतएव इनकी सेवा करो। पुन्नामक नरकसे पुत्री ही रक्षा करती है, यहाँपर ऐसी ही उक्ति है॥ ३०-३१॥ | | प्रशस्ता तव कान्तेयं स्यात्पुत्री विश्वमातृका।<br>तस्मात्पुत्री सती नाम्ना तवैषा च भविष्यति॥ ३२ | यह परम सुन्दरी एवं प्रशस्त तथा विश्वकी जननी आपकी ही पुत्री है। अतएव अबसे यह सती नामसे तुम्हारी पुत्री होगी॥ ३२॥ | | एवमुक्तस्तदा दक्षो नियोगाद् ब्रह्मणो मुनिः।<br>लब्ध्वा पुत्रीं ददौ साक्षात् सतीं रुद्राय सादरम्॥ ३३ | तत्पश्चात् ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर दक्षप्रजापतिने उनके आदेशसे पुत्रीरूपमें प्राप्त उन साक्षात् सतीको आदरपूर्वक भगवान् रुद्रको सौंप दिया॥ ३३॥ | | धर्मस्य पत्न्यः श्रद्धाद्याः कीर्तिताः वै त्रयोदश।<br>तासु धर्मप्रजां वक्ष्ये यथाक्रममनुत्तमम्॥ ३४ | प्रजापति धर्मकी श्रद्धा आदि जिन तेरह पत्नियोंका वर्णन किया जा चुका है, उनसे तथा धर्मसे उत्पन्न उत्तम सन्तानोंके विषयमें अब मैं यथाक्रम कह रहा हूँ॥ ३४॥ | | कामो दर्पोऽथ नियमः सन्तोषो लोभ एव च।<br>श्रुतस्तु दण्डः समयो बोधश्चैव महाद्युतिः॥ ३५<br>अप्रमादश्च विनयो व्यवसायो द्विजोत्तमाः।<br>क्षेमं सुखं यशश्चैव धर्मपुत्राश्च तासु वै॥ ३६<br>धर्मस्य वै क्रियायां तु दण्डः समय एव च।<br>अप्रमादस्तथा बोधो बुद्धेर्धर्मस्य तौ सुतौ॥ ३७<br>तस्मात् पञ्चदशैवैते तासु धर्मात्मजास्त्विह। | हे उत्तम ब्राह्मणो! काम, दर्प, नियम, सन्तोष, लोभ, श्रुत, दण्ड, समय, महान् द्युतिसम्पन्न बोध, अप्रमाद, विनय, व्यवसाय, क्षेम, सुख और यश—इन पुत्रोंको उन तेरह पत्नियोंने प्रजापति धर्मसे उत्पन्न किया था। धर्मके दो पुत्र दण्ड तथा समय उनकी क्रिया नामक पत्नीसे उत्पन्न हुए और अप्रमाद तथा बोध नामक ये दो पुत्र धर्मकी बुद्धि नामक पत्नीसे उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन तेरह पत्नियोंसे धर्मके ये पन्द्रह पुत्र उत्पन्न | | भृगुपत्नी च सुषुवे ख्यातिर्विष्णोः प्रियां श्रियम्॥ ३८ | |

अध्याय ५ ] ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन ३१


| धातारञ्च विधातारं मेरोजामातरौ सुतौ।<br>प्रभूतिर्नाम या पत्नी मरीचेः सुषुवे सुतौ॥ ३९<br><br>पूर्णमासं तु मारीचं ततः कन्याचतुष्टयम्।<br>तुष्टिर्ज्येष्ठा च वै दृष्टिः कृषिश्चापचितिस्तथा॥ ४०<br><br>क्षमा च सुषुवे पुत्रान् पुत्रीं च पुलहाच्छुभाम्।<br>कर्दमं च वरीयांसं सहिष्णुं मुनिसत्तमाः॥ ४१<br><br>तथा कनकपीतां स पीवरीं पृथिवीसमाम्।<br>प्रीत्यां पुलस्त्यश्च तथा जनयामास वै सुतान्॥ ४२<br><br>दत्तोर्णं वेदबाहुञ्च पुत्रीं चान्यां दृषद्वतीम्।<br>पुत्राणां षष्टिसहस्रं सन्नतिः सुषुवे शुभा॥ ४३<br><br>क्रतोस्तु भार्या सर्वे ते बालखिल्या इति श्रुताः।<br>सिनीवालीं कुहूञ्चैव राकां चानुमतिं तथा॥ ४४<br><br>स्मृतिश्च सुषुवे पत्नी मुनेश्चाङ्गिरसस्तथा।<br>लब्ध्वानुभावमग्निञ्च कीर्तिमन्तञ्च सुव्रताः॥ ४५<br><br>अत्रेर्भार्यानसूया वै सुषुवे षट् प्रजास्तु याः।<br>तास्त्वेका कन्यका नाम्ना श्रुतिः सा सूनुपञ्चकम्॥ ४६<br><br>सत्यनेत्रो मुनिर्भव्यो मूर्तिरापः शनैश्चरः।<br>सोमश्च वै श्रुतिः षष्ठी पञ्चात्रेयास्तु सूनवः॥ ४७<br><br>ऊर्जा वसिष्ठाद्वै लेभे सुतांश्च सुतवत्सला।<br>ज्यायसी पुण्डरीकाक्षान् वासिष्ठान् वरलोचना॥ ४८<br><br>रजः सुहोत्रो बाहुश्च सवनश्चानघस्तथा।<br>सुतपाः शुक्र इत्येते मुनेर्वै सप्त सूनवः॥ ४९<br><br>यश्चाभिमानी भगवान् भवात्मा<br>पैतामहो वह्निरसुः प्रजानाम्।<br>स्वाहा च तस्मात् सुषुवे सुतानां<br>त्रयं त्रयाणां जगतां हिताय॥ ५० | हुए। भृगुकी पत्नी ख्यातिने ‘श्री’ (लक्ष्मी)-को जन्म दिया, जो भगवान् विष्णुकी परम प्रिया हुई तथा धाता एवं विधाता नामक दो पुत्र भी उत्पन्न हुए, जो मेरुपर्वतके जामाता बने। मरीचिकी प्रभूति नामक पत्नीने पूर्णमास तथा मारीच नामक दो पुत्रों तथा तुष्टि, दृष्टि, कृषि एवं अपचिति नामक चार पुत्रियोंको जन्म दिया; इनमें तुष्टि ज्येष्ठ थी॥ ३५-४०॥<br><br>हे श्रेष्ठ मुनियो! क्षमाने पुलहमुनिसे कर्दम, वरीयांस तथा सहिष्णु नामक तीन पुत्र तथा स्वर्णसदृश कान्तिवाली और पृथ्वीके समान क्षमाशील पीवरी नामकी एक पुत्रीको उत्पन्न किया था॥ ४१ ॥<br><br>पुलस्त्यऋषिने अपनी प्रीति नामक पत्नीसे दत्तोर्ण तथा वेदबाहु नामक पुत्रों तथा एक अन्य दृषद्वती नामक पुत्रीको उत्पन्न किया। क्रतुकी प्रिय पत्नी सन्नतिने साठ हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया; वे सभी बालखिल्य नामसे प्रसिद्ध हुए। हे सुव्रतो! अंगिरामुनिकी पत्नी स्मृतिसे सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति—इन चार कन्याओं तथा प्रिय स्वभाववाले कीर्तिमान् पुत्र अग्निकी उत्पत्ति हुई॥ ४२-४५॥<br><br>अत्रिकी भार्या अनसूयाने छः सन्ततियोंको जन्म दिया था। उनमें श्रुति नामधारिणी एक कन्या थी। सत्यनेत्र, मुनिर्भव्य, मूर्तिराप, शनैश्चर एवं सोम—ये पाँच पुत्र हुए, जो आत्रेय कहलाये। सभी सन्तानोंमें श्रुति छठी थी॥ ४६-४७॥<br><br>सुन्दर नेत्रोंवाली तथा पुत्रोंके प्रति स्नेहभाव रखनेवाली महिमामयी वसिष्ठपत्नी ऊर्जाने कमलके समान नेत्रवाले सात पुत्र उत्पन्न किये। रज, सुहोत्र, बाहु, सवन, अनघ, सुतपा और शुक्र—ये सात पुत्र मुनि वसिष्ठसे हुए॥ ४८-४९॥<br><br>परम अभिमानी, रुद्ररूप, ब्रह्माके पुत्र तथा प्रजाओंके प्राणस्वरूप जो भगवान् अग्नि हैं, उनसे स्वाहाने तीनों लोकोंके कल्याणार्थ तीन पुत्र उत्पन्न किये॥ ५०॥ |


॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे प्रजासृष्टिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'प्रजासृष्टिवर्णन' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥