भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ४ ] ब्रह्माजीकी आयुका परिमाण...विभिन्न लोकोंकी संरचना [ २३


| दिवा विकृतयः सर्वे विकारा विश्वदेवताः।<br>प्रजानां पतयः सर्वे तिष्ठन्त्यन्ये महर्षयः॥ ३<br><br>रात्रौ सर्वे प्रलीयन्ते निशान्ते सम्भवन्ति च।<br>अहस्तु तस्य वै कल्पो रात्रिस्तादृग्विधा स्मृता॥ ४ | दिनमें सभी प्रकारकी वैकारिक सृष्टि, समस्त देवता, सभी प्रजापतिगण तथा अन्य महर्षि लोग विद्यमान रहते हैं तथा रातमें ये सभी विलीन हो जाते हैं। रातकी समाप्तिपर वे सभी पुनः उत्पन्न हो जाते हैं। ब्रह्माका एक दिन ही एक कल्प कहा जाता है तथा उसी प्रकार उनकी रात भी एक कल्पके मानके तुल्य कही गयी है॥ ३-४॥ | | चतुर्युगसहस्रान्ते मनवस्तु चतुर्दश।<br>चत्वारि तु सहस्राणि वत्सराणां कृतं द्विजाः॥ ५<br><br>तावच्छती च वै सन्ध्या सन्ध्यांशश्च कृतस्य तु।<br>त्रिशती द्विशती सन्ध्या तथा चैकशती क्रमात्॥ ६ | एक हजार चतुर्युगीकी अवधिमें चौदह मनु उत्पन्न होते हैं। हे विप्रो! सत्ययुगका काल चार हजार दिव्य वर्षोंका है और उस सत्ययुगके चार सौ वर्षोंकी सन्ध्या तथा सन्ध्यांश होते हैं। उसी प्रकार क्रमसे त्रेतायुगकी सन्ध्या तीन सौ वर्षकी, द्वापरकी सन्ध्या दो सौ वर्षकी तथा कलियुगकी सन्ध्या एक सौ वर्षकी होती है॥ ५-६॥ | | अंशकः षट्शतं तस्मात् कृतसन्ध्यांशकं विना।<br>त्रिद्व्येकसाहस्रमितौ विना सन्ध्यांशके न तु॥ ७ | इस प्रकार सत्ययुगके सन्ध्यांशकको छोड़कर अन्य तीन युगोंके कुल सन्ध्यांशक छः सौ वर्षके होते हैं तथा इन त्रेता, द्वापर और कलिके सन्ध्या-सन्ध्यांशकको छोड़कर इनका नियत समय क्रमशः तीन हजार, दो हजार तथा एक हजार वर्षोंका होता है॥ ७॥ | | त्रेताद्वापरतिष्याणां कृतस्य कथयामि वः।<br>निमेषपञ्चदशका काष्ठा स्वस्थस्य सुव्रताः॥ ८<br><br>मर्त्यस्य चाक्ष्णोस्तस्याश्च ततस्त्रिंशतिका कला।<br>कला त्रिंशतिको विप्रा मुहूर्त इति कल्पितः॥ ९ | हे सुव्रत ऋषियो! अब मैं आप लोगोंको त्रेता, द्वापर, कलियुग तथा सत्ययुगके कालमान बताता हूँ। स्वस्थ मनुष्यके नेत्रके पन्द्रह निमेषके समयको एक काष्ठा कहते हैं और तीस काष्ठाकी एक कला होती है। हे विप्रो! तीस कलाको मिलाकर एक मुहूर्त कहा जाता है॥ ८-९॥ | | मुहूर्तपञ्चदशिका रजनी तादृशं त्वहः।<br>पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः॥ १०<br><br>कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी।<br>त्रिंशद्द्ये मानुषा मासाः पित्र्यो मासस्तु स स्मृतः॥ ११ | पन्द्रह मुहूर्तकी एक रात होती है तथा उसी प्रकार पन्द्रह मुहूर्तका एक दिन होता है। मनुष्योंका एक कृष्णपक्ष पितरोंके एक दिनके बराबर होता है तथा शुक्लपक्ष उनकी स्वप्नसम्बन्धी रातके समान होता है। मनुष्योंके तीस महीनेका समय पितरोंके एक मासके बराबर माना गया है॥ १०-११॥ | | शतानि त्रीणि मासानां षष्ट्या चाप्यधिकानि वै।<br>पित्र्यः सम्वत्सरो ह्येष मानुषेण विभाव्यते॥ १२ | मनुष्योंके तीन सौ साठ महीनोंका समय पितरोंका एक संवत्सर (वर्ष) माना जाता है॥ १२॥ | | मानुषेणैव मानेन वर्षाणां यच्छतं भवेत्।<br>पितॄणां त्रीणि वर्षाणि संख्यातानीह तानि वै॥ १३<br><br>दश वै द्व्यधिका मासाः पितृसंख्येह संस्मृता।<br>लौकिकेनैव मानेन अब्दो यो मानुषः स्मृतः॥ १४ | मानवीय मानसे सन्ध्या-सन्ध्यांशसहित जो १०० वर्ष होते हैं, यहाँ वे ही पितरोंके तीन वर्ष कहे गये हैं। जैसे लौकिक मानसे बारह मासका एक मानववर्ष होता है, |