भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 26
२४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतद्दिव्यमहोरात्रमिति लैङ्गेऽत्र पठ्यते।<br>दिव्ये रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः॥ १५उसी प्रकार पितृमानसे बारह मासका एक पितृवर्ष होता है। लिङ्गपुराणमें इस प्रकार दिव्य अहोरात्र तथा दिव्य वर्षका विभागपूर्वक वर्णन किया गया है॥ १३—१५॥
अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद्दक्षिणायनम्।<br>एते रात्र्यहनी दिव्ये प्रसंख्याते विशेषतः॥ १६सूर्यका उत्तरकी ओर संक्रमण [उत्तरायण—सूर्यका मकरराशिसे मिथुनराशितक] ही देवताओंका दिवस तथा सूर्यका दक्षिणकी ओर संक्रमण [दक्षिणायन—कर्कराशिसे धनुराशितक] ही देवोंकी रात्रि होती है। विशेषतया ये दिव्य अहोरात्र कहे गये हैं॥ १६॥
त्रिंशद्यानि तु वर्षाणि दिव्यो मासस्तु स स्मृतः।<br>मानुषं तु शतं विप्रा दिव्यमासास्त्रयस्तु ते॥ १७मनुष्योंके तीस वर्षोंका काल देवताओंके एक महीनेके समयके बराबर होता है। हे विप्रो! मनुष्योंका एक सौ वर्ष देवताओंके तीन माह तथा दस दिनके बराबर माना गया है॥ १७<sup></sup>/<sub></sub>
दश चैव तथाहानि दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः।<br>त्रीणि वर्षशतान्येव षष्टिवर्षाणि यानि तु॥ १८मनुष्योंके तीन सौ साठ वर्षोंका कालमान देवताओंके एक वर्षके समयके तुल्य कहा गया है॥ १८<sup></sup>/<sub></sub>
दिव्यः सम्वत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्तितः।<br>त्रीणि वर्षसहस्त्राणि मानुषाणि प्रमाणतः॥ १९मनुष्योंके कालप्रमाणके अनुसार उनके तीन हजार तीस वर्ष सप्तर्षियोंके एक वर्षके बराबर माने गये हैं॥ १९<sup></sup>/<sub></sub>
त्रिंशदन्यानि वर्षाणि मतः सप्तर्षिवत्सरः।<br>नव यानि सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु॥ २०मनुष्योंके नौ हजार नब्बे वर्षोंको मिलाकर वह एक ध्रौव्य वर्ष (ध्रुव वर्ष) होता है॥ २०<sup></sup>/<sub></sub>
अन्यानि नवतीश्चैव ध्रौवः संवत्सरस्तु सः।<br>षट्त्रिंशत्तु सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु॥ २१मनुष्योंका जो छत्तीस हजार वर्षोंका समय है, वही देवताओंका सौ वर्ष कहा जाता है॥ २१<sup></sup>/<sub></sub>
वर्षाणां तच्छतं ज्ञेयं दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः।<br>त्रीण्येव नियुतान्याहुर्वर्षाणां मानुषाणि तु॥ २२<br>षष्टिश्चैव सहस्राणि संख्यातानि तु संख्यया।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु प्राहुः संख्याविदो जनाः॥ २३कालगणनाके विद्वान् मनुष्योंके तीन लाख साठ हजार वर्षोंके समयको देवताओंके एक हजार वर्षोंके बराबर कहते हैं॥ २२-२३॥
दिव्येनैव प्रमाणेन युगसंख्याप्रकल्पनम्।<br>पूर्वं कृतयुगं नाम ततस्त्रेता विधीयते॥ २४<br>द्वापरश्च कलिश्चैव युगान्येतानि सुव्रताः।<br>अथ संवत्सरा दृष्टा मानुषेण प्रमाणतः॥ २५देवताओंके ही कालप्रमाणसे युगोंकी संख्या कल्पित की गयी है। हे सुव्रत ऋषियो! सर्वप्रथम सत्ययुग, इसके बाद त्रेता, फिर द्वापर और अन्तमें कलियुग—ये चार युग कहे गये हैं। अब मानुषीवर्ष-प्रमाणसे इनका काल बताया जाता है॥ २४-२५॥
कृतस्याद्यस्य विप्रेन्द्रा दिव्यमानेन कीर्तितम्।<br>सहस्राणां शतान्यासंचतुर्दश च संख्यया॥ २६<br>चत्वारिंशत्सहस्राणि तथान्यानि कृतं युगम्।<br>तथा दशसहस्राणां वर्षाणां शतसंख्यया॥ २७<br>अशीतिश्च सहस्राणि कालस्त्रेतायुगस्य च।<br>सप्तैव नियुतान्याहुर्वर्षाणां मानुषाणि तु॥ २८<br>विंशतिश्च सहस्राणि कालस्तु द्वापरस्य च।<br>तथा शतसहस्राणि वर्षाणां त्रीणि संख्यया॥ २९<br>षष्टिश्चैव सहस्राणि कालः कलियुगस्य तु।<br>एवं चतुर्युगः काल ऋते सन्ध्यांशकात्स्मृतः॥ ३०हे विप्रवरो! प्रथम कृतयुगका कालमान देवताओंके प्रमाणसे बताया जा चुका है। वह कृतयुग मानुषी वर्षसे चौदह लाख चालीस हजार वर्षोंका है तथा त्रेतायुगका कालमान दस लाख अस्सी हजार वर्षोंका, द्वापरयुगका कालमान सात लाख बीस हजार वर्षोंका तथा कलियुगका समय तीन लाख साठ हजार वर्षोंका कहा गया है। इस
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