श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ४ ] ब्रह्माजीकी आयुका परिमाण…विभिन्न लोकोंकी संरचना २५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नियुतान्येव षट्त्रिंशन्निर्शानि तु तानि वै।<br>चत्वारिंशत्तथा त्रीणि नियुतानीह संख्यया॥ ३१<br>विंशतिश्च सहस्त्राणि सन्ध्यांशश्च चतुर्युगः।<br>एवं चतुर्युगाख्यानां साधिका ह्येकसप्ततिः॥ ३२<br>कृतत्रेतादियुक्तानां मनोरन्तरमुच्यते।<br>मन्वन्तरस्य संख्या च वर्षग्रेण प्रकीर्तिता॥ ३३ | प्रकार सन्ध्या तथा सन्ध्यांशको छोड़कर चारों युगोंका काल छत्तीस लाख वर्ष कहा गया है। चारों युगोंके सन्ध्यांशका काल तीन लाख साठ हजार वर्ष होता है॥ २६-३११/२॥<br><br>इकहत्तर कृत-त्रेतादि चतुर्युगोंके कालसे कुछ अधिक कालको एक मन्वन्तर कहा जाता है और आगे दिये गये वर्षोंसे मन्वन्तरकी संख्या कही गयी है॥ ३२-३३॥ |
| त्रिंशत्कोट्यस्तु वर्षाणां मानुषेण द्विजोत्तमाः।<br>सप्तषष्टिस्तथान्यानि नियुतान्यधिकानि तु॥ ३४<br>विंशतिश्च सहस्राणि कालोऽयमधिकं विना।<br>मन्वन्तरस्य संख्यैषा लैङ्गेऽस्मिन् कीर्तिता द्विजाः॥ ३५ | हे उत्तम ब्राह्मणो! मनुष्यवर्षसे तीस करोड़ सरसठ लाख बीस हजार वर्षोंका काल सभी मनुओंका होता है; हे द्विजो! ऐसा इस लिङ्गपुराणमें बताया गया है॥ ३४-३५॥ |
| चतुर्युगस्य च तथा वर्षसंख्या प्रकीर्तिता।<br>चतुर्युगसहस्त्रं वै कल्पश्चैको द्विजोत्तमाः॥ ३६ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! चतुर्युगकी भी वर्षसंख्या कही गयी है। एक हजार चतुर्युगोंका काल एक कल्प कहा गया है॥ ३६॥ |
| निशान्ते सृजते लोकान् नश्यन्ते निशि जन्तवः।<br>तत्र वैमानिकानां तु अष्टाविंशतिकोटयः॥ ३७<br>मन्वन्तरेषु वै संख्या सान्तरेषु यथातथा।<br>त्रीणि कोटिशतान्यासन् कोट्यो द्विनवतिस्तथा॥ ३८<br>कल्पेऽतीते तु वै विप्राः सहस्राणां तु सप्ततिः।<br>पुनस्तथाष्टसाहस्त्रं सर्वत्रैव समासतः॥ ३९ | ब्रह्माजी दिनके आरम्भमें जगत्की रचना करते हैं तथा रात्रिमें प्राणियोंका संहार होता है। उनमें देवताओंकी संख्या अट्ठाईस करोड़ है। यह संख्या मन्वन्तरोंमें तीन सौ बानबे करोड़ होती है। हे ब्राह्मणो! कल्प व्यतीत होनेपर यह संख्या अठहत्तर हजार होती है॥ ३७-३९॥ |
| कल्पावसानिकांस्त्यक्त्वा प्रलये समुपस्थिते।<br>महर्लोकात्प्रयान्त्येते जनलोकं जनास्ततः॥ ४० | प्रलयकाल उपस्थित होनेपर कल्पके अन्तमें विद्यमान देवताओंको छोड़कर महर्लोकमें निवास करनेवाले लोग जनलोकमें चले जाते हैं॥ ४०॥ |
| कोटीनां द्वे सहस्त्रे तु अष्टौ कोटिशतानि तु।<br>द्विषष्टिश्च तथा कोट्यो नियुतानि च सप्ततिः॥ ४१<br>कल्पार्धसंख्या दिव्या वै कल्पमेवन्तु कल्पयेत्।<br>कल्पानां वै सहस्त्रन्तु वर्षमेकमजस्य तु॥ ४२ | आधे दिव्य (देव) कल्पकी वर्षसंख्या दो हजार आठ सौ बासठ करोड़ सत्तर लाख है; इसीसे कल्पकी संख्या ज्ञात होती है। हजार कल्पोंका काल ही ब्रह्माजीका एक वर्ष है॥ ४१-४२॥ |
| वर्षाणामष्टसाहस्रं ब्राह्मं वै ब्रह्मणो युगम्।<br>सवनं युगसाहस्रं सर्वदेवोद्भवस्य तु॥ ४३ | ब्रह्माके आठ हजार वर्षोंका काल (आठ हजार ब्राह्म वर्ष) ब्रह्माका एक युग होता है। सभी देवोंके उत्पत्तिकर्ता ब्रह्माका एक हजार युग विष्णुके एक दिनके बराबर होता है॥ ४३॥ |
| सवनानां सहस्रं तु त्रिविधं त्रिगुणं तथा।<br>ब्रह्मणस्तु तथा प्रोक्तः कालः कालात्मनः प्रभोः॥ ४४ | विष्णुके नौ हजार दिनोंका समय कालात्मा प्रभु ब्रह्मस्वरूप रुद्रके एक दिनका समय कहा गया है॥ ४४॥ |