श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| | भगवान् अग्निने स्वाहादेवीको तथा पितरोंने स्वधादेवीको पत्नीरूपमें स्वीकार किया॥ २५-२६॥ | | पुत्रीकृता सती या सा मानसी शिवसम्भवा।<br>दक्षेण जगतां धात्री रुद्रमेवास्थिता पतिम्॥ २७ | दक्षप्रजापतिकी शिवसम्भवा (शिवांगसम्भूता) मानसी पुत्री सती, जो सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली हैं, ने भगवान् रुद्रको पतिरूपमें प्राप्त किया॥ २७॥ | | अर्धनारीश्वरं दृष्ट्वा सर्गादौ कनकाण्डजः।<br>विभजस्वेति चाहादौ यदा जाता तदाभवत्॥ २८ | सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माजीने शिवजीको अर्धनारीश्वर देखकर कहा कि आप स्त्री-पुरुषका विभाग कीजिये, तब शिवजीकी देहसे सतीजी अलग हो गयीं॥ २८॥ | | तस्याश्चैवांशजाः सर्वाः स्त्रियस्त्रिभुवने तथा।<br>एकादशविधा रुद्रास्तस्य चांशोद्भवस्तथा॥ २९<br>स्त्रीलिङ्गमखिलं सा वै पुंलिङ्गं नीललोहितः। | उन्हीं सतीके अंशसे तीनों लोकमें सभी स्त्रियोंकी उत्पत्ति हुई है तथा ग्यारह प्रकारके रुद्र भी उन शिवके अंशसे उत्पन्न हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण स्त्रीजातिके रूपमें वे सतीजी तथा पुरुषजातिके रूपमें नीललोहित शिवजी अधिष्ठित हैं॥ २९ १/२ ॥ | | तं दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा दक्षमालोक्य सुव्रताम्॥ ३०<br>भजस्व धात्रीं जगतां ममापि च तवापि च।<br>पुन्नाम्नो नरकात्त्राति इति पुत्री त्विहोक्तितः॥ ३१ | भगवान् ब्रह्माने सुव्रता सतीको देखकर पुनः दक्षप्रजापतिकी ओर देखकर उनसे कहा कि ये सती हमारी, आपकी तथा सम्पूर्ण जगत्की धात्री हैं, अतएव इनकी सेवा करो। पुन्नामक नरकसे पुत्री ही रक्षा करती है, यहाँपर ऐसी ही उक्ति है॥ ३०-३१॥ | | प्रशस्ता तव कान्तेयं स्यात्पुत्री विश्वमातृका।<br>तस्मात्पुत्री सती नाम्ना तवैषा च भविष्यति॥ ३२ | यह परम सुन्दरी एवं प्रशस्त तथा विश्वकी जननी आपकी ही पुत्री है। अतएव अबसे यह सती नामसे तुम्हारी पुत्री होगी॥ ३२॥ | | एवमुक्तस्तदा दक्षो नियोगाद् ब्रह्मणो मुनिः।<br>लब्ध्वा पुत्रीं ददौ साक्षात् सतीं रुद्राय सादरम्॥ ३३ | तत्पश्चात् ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर दक्षप्रजापतिने उनके आदेशसे पुत्रीरूपमें प्राप्त उन साक्षात् सतीको आदरपूर्वक भगवान् रुद्रको सौंप दिया॥ ३३॥ | | धर्मस्य पत्न्यः श्रद्धाद्याः कीर्तिताः वै त्रयोदश।<br>तासु धर्मप्रजां वक्ष्ये यथाक्रममनुत्तमम्॥ ३४ | प्रजापति धर्मकी श्रद्धा आदि जिन तेरह पत्नियोंका वर्णन किया जा चुका है, उनसे तथा धर्मसे उत्पन्न उत्तम सन्तानोंके विषयमें अब मैं यथाक्रम कह रहा हूँ॥ ३४॥ | | कामो दर्पोऽथ नियमः सन्तोषो लोभ एव च।<br>श्रुतस्तु दण्डः समयो बोधश्चैव महाद्युतिः॥ ३५<br>अप्रमादश्च विनयो व्यवसायो द्विजोत्तमाः।<br>क्षेमं सुखं यशश्चैव धर्मपुत्राश्च तासु वै॥ ३६<br>धर्मस्य वै क्रियायां तु दण्डः समय एव च।<br>अप्रमादस्तथा बोधो बुद्धेर्धर्मस्य तौ सुतौ॥ ३७<br>तस्मात् पञ्चदशैवैते तासु धर्मात्मजास्त्विह। | हे उत्तम ब्राह्मणो! काम, दर्प, नियम, सन्तोष, लोभ, श्रुत, दण्ड, समय, महान् द्युतिसम्पन्न बोध, अप्रमाद, विनय, व्यवसाय, क्षेम, सुख और यश—इन पुत्रोंको उन तेरह पत्नियोंने प्रजापति धर्मसे उत्पन्न किया था। धर्मके दो पुत्र दण्ड तथा समय उनकी क्रिया नामक पत्नीसे उत्पन्न हुए और अप्रमाद तथा बोध नामक ये दो पुत्र धर्मकी बुद्धि नामक पत्नीसे उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन तेरह पत्नियोंसे धर्मके ये पन्द्रह पुत्र उत्पन्न | | भृगुपत्नी च सुषुवे ख्यातिर्विष्णोः प्रियां श्रियम्॥ ३८ | |