भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ५ ] ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन ३१


| धातारञ्च विधातारं मेरोजामातरौ सुतौ।<br>प्रभूतिर्नाम या पत्नी मरीचेः सुषुवे सुतौ॥ ३९<br><br>पूर्णमासं तु मारीचं ततः कन्याचतुष्टयम्।<br>तुष्टिर्ज्येष्ठा च वै दृष्टिः कृषिश्चापचितिस्तथा॥ ४०<br><br>क्षमा च सुषुवे पुत्रान् पुत्रीं च पुलहाच्छुभाम्।<br>कर्दमं च वरीयांसं सहिष्णुं मुनिसत्तमाः॥ ४१<br><br>तथा कनकपीतां स पीवरीं पृथिवीसमाम्।<br>प्रीत्यां पुलस्त्यश्च तथा जनयामास वै सुतान्॥ ४२<br><br>दत्तोर्णं वेदबाहुञ्च पुत्रीं चान्यां दृषद्वतीम्।<br>पुत्राणां षष्टिसहस्रं सन्नतिः सुषुवे शुभा॥ ४३<br><br>क्रतोस्तु भार्या सर्वे ते बालखिल्या इति श्रुताः।<br>सिनीवालीं कुहूञ्चैव राकां चानुमतिं तथा॥ ४४<br><br>स्मृतिश्च सुषुवे पत्नी मुनेश्चाङ्गिरसस्तथा।<br>लब्ध्वानुभावमग्निञ्च कीर्तिमन्तञ्च सुव्रताः॥ ४५<br><br>अत्रेर्भार्यानसूया वै सुषुवे षट् प्रजास्तु याः।<br>तास्त्वेका कन्यका नाम्ना श्रुतिः सा सूनुपञ्चकम्॥ ४६<br><br>सत्यनेत्रो मुनिर्भव्यो मूर्तिरापः शनैश्चरः।<br>सोमश्च वै श्रुतिः षष्ठी पञ्चात्रेयास्तु सूनवः॥ ४७<br><br>ऊर्जा वसिष्ठाद्वै लेभे सुतांश्च सुतवत्सला।<br>ज्यायसी पुण्डरीकाक्षान् वासिष्ठान् वरलोचना॥ ४८<br><br>रजः सुहोत्रो बाहुश्च सवनश्चानघस्तथा।<br>सुतपाः शुक्र इत्येते मुनेर्वै सप्त सूनवः॥ ४९<br><br>यश्चाभिमानी भगवान् भवात्मा<br>पैतामहो वह्निरसुः प्रजानाम्।<br>स्वाहा च तस्मात् सुषुवे सुतानां<br>त्रयं त्रयाणां जगतां हिताय॥ ५० | हुए। भृगुकी पत्नी ख्यातिने ‘श्री’ (लक्ष्मी)-को जन्म दिया, जो भगवान् विष्णुकी परम प्रिया हुई तथा धाता एवं विधाता नामक दो पुत्र भी उत्पन्न हुए, जो मेरुपर्वतके जामाता बने। मरीचिकी प्रभूति नामक पत्नीने पूर्णमास तथा मारीच नामक दो पुत्रों तथा तुष्टि, दृष्टि, कृषि एवं अपचिति नामक चार पुत्रियोंको जन्म दिया; इनमें तुष्टि ज्येष्ठ थी॥ ३५-४०॥<br><br>हे श्रेष्ठ मुनियो! क्षमाने पुलहमुनिसे कर्दम, वरीयांस तथा सहिष्णु नामक तीन पुत्र तथा स्वर्णसदृश कान्तिवाली और पृथ्वीके समान क्षमाशील पीवरी नामकी एक पुत्रीको उत्पन्न किया था॥ ४१ ॥<br><br>पुलस्त्यऋषिने अपनी प्रीति नामक पत्नीसे दत्तोर्ण तथा वेदबाहु नामक पुत्रों तथा एक अन्य दृषद्वती नामक पुत्रीको उत्पन्न किया। क्रतुकी प्रिय पत्नी सन्नतिने साठ हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया; वे सभी बालखिल्य नामसे प्रसिद्ध हुए। हे सुव्रतो! अंगिरामुनिकी पत्नी स्मृतिसे सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति—इन चार कन्याओं तथा प्रिय स्वभाववाले कीर्तिमान् पुत्र अग्निकी उत्पत्ति हुई॥ ४२-४५॥<br><br>अत्रिकी भार्या अनसूयाने छः सन्ततियोंको जन्म दिया था। उनमें श्रुति नामधारिणी एक कन्या थी। सत्यनेत्र, मुनिर्भव्य, मूर्तिराप, शनैश्चर एवं सोम—ये पाँच पुत्र हुए, जो आत्रेय कहलाये। सभी सन्तानोंमें श्रुति छठी थी॥ ४६-४७॥<br><br>सुन्दर नेत्रोंवाली तथा पुत्रोंके प्रति स्नेहभाव रखनेवाली महिमामयी वसिष्ठपत्नी ऊर्जाने कमलके समान नेत्रवाले सात पुत्र उत्पन्न किये। रज, सुहोत्र, बाहु, सवन, अनघ, सुतपा और शुक्र—ये सात पुत्र मुनि वसिष्ठसे हुए॥ ४८-४९॥<br><br>परम अभिमानी, रुद्ररूप, ब्रह्माके पुत्र तथा प्रजाओंके प्राणस्वरूप जो भगवान् अग्नि हैं, उनसे स्वाहाने तीनों लोकोंके कल्याणार्थ तीन पुत्र उत्पन्न किये॥ ५०॥ |


॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे प्रजासृष्टिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'प्रजासृष्टिवर्णन' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥