श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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३२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
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छठा अध्याय
अग्नि तथा पितरोंके वंशका वर्णन, ब्रह्माजीसे रुद्रोंका प्रादुर्भाव, परमेष्ठी सदाशिवकी महिमा
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| पवमानः पावकश्च शुचिरग्निश्च ते स्मृताः।<br>निर्मथ्यः पवमानस्तु वैद्युतः पावकः स्मृतः॥ १ | अग्निके वे तीन पुत्र पवमान, पावक तथा शुचि नामसे विख्यात हुए। अरणी आदिमें घर्षणसे पवमान, विद्युत्से पावक तथा सूर्य-प्रभासे शुचिका आविर्भाव हुआ। ये तीनों स्वाहाके पुत्र हैं। अब यहाँ पुत्रों तथा पौत्रोंको मिलाकर इनकी संख्या संक्षेपमें बतायी जाती है॥ १-२॥ |
| शुचिः सौरस्तु विज्ञेयः स्वाहा पुत्रास्त्रयस्तु ते।<br>पुत्रैः पौत्रैस्त्विहैतेषां संख्या सङ्क्षेपतः स्मृता॥ २ | |
| विसृज्य सप्तकं चादौ चत्वारिंशन्नवैव च।<br>इत्येते वह्नयः प्रोक्ताः प्रणीयन्तेऽध्वरेषु च॥ ३ | आदिमें सप्तकका त्याग करके कुल उनचास अग्नियाँ कही गयी हैं। ये यज्ञोंमें आराधित की जाती हैं॥ ३॥ |
| सर्वे तपस्विनस्त्वेते सर्वे व्रतभृतः स्मृताः।<br>प्रजानां पतयः सर्वे सर्वे रुद्रात्मकाः स्मृताः॥ ४ | ये सभी तपस्वी, व्रतधारी, प्रजाओंके पति तथा रुद्रस्वरूप कहे गये हैं॥ ४॥ |
| अयज्वानश्च यज्वानः पितरः प्रीतिमानसाः।<br>अग्निष्वात्ताश्च यज्वानः शेषा बर्हिषदः स्मृताः॥ ५ | अयज्वा तथा यज्वा—ये दो प्रकारके प्रसन्न मनवाले पितर हैं। उनमें यज्वा (यज्ञ करनेवाले) पितरोंको अग्निष्वात्त तथा अयज्वा पितरोंको बर्हिषद कहा जाता है॥ ५॥ |
| मेनां तु मानसीं तेषां जनयामास वै स्वधा।<br>अग्निष्वात्तात्मजा मेना मानसी लोकविश्रुता॥ ६ | स्वधाने उन अग्निष्वात्त पितरोंसे मेना नामक मानसी कन्या उत्पन्न की। अग्निष्वात्त पितरोंकी वह मानसी पुत्री मेना लोकमें अतीव प्रसिद्ध हुई॥ ६॥ |
| असूत मेना मैनाकं क्रौञ्चं तस्यानुजामुमाम्।<br>गङ्गां हैमवतीं जज्ञे भवाङ्गाश्लेषपावनीम्॥ ७ | मेनाने मैनाक, क्रौञ्च, उसकी अनुजा उमा तथा शिवजीके अंग-श्लेषके कारण (मस्तकपर विराजमान रहनेके कारण) जगत्को पवित्र करनेका गुण रखनेवाली हैमवती गंगाको उत्पन्न किया॥ ७॥ |
| धरणीं जनयामास मानसीं यज्ञयाजिनीम्।<br>स्वधा सा मेरुराजस्य पत्नी पद्मममानना॥ ८ | कमलके समान मुखवाली मेरुराजपत्नी स्वधाने यज्ञानुष्ठानमें प्रवृत्त रहनेवाली धरणी नामक मानसी पुत्रीको जन्म दिया। यहाँ अमृतपान करनेवाले पितरों तथा ऋषियोंके कुलका विस्तार दिया जा रहा है; आप लोग उसे विस्तारपूर्वक सुनिये॥ ८-९॥ |
| पितरोऽमृतपाः प्रोक्तास्तेषां चैवेह विस्तरः।<br>ऋषीणाञ्च कुलं सर्वं शृणुध्वं तत्सुविस्तरम्॥ ९ | |
| वदामि पृथगध्यायसंस्थितं वस्तुदूर्ध्वतः।<br>दाक्षायणी सती याता पार्श्वं रुद्रस्य पार्वती॥ १० | अब मैं आप सबसे पूर्वनिरूपित विषयका पुनः पृथक् अध्यायमें वर्णन करता हूँ। दक्षकन्या सतीका विवाह रुद्रके साथ हुआ और वे उनके साथ चली गयीं। फिर इन्हीं सतीने दक्षके यज्ञका विध्वंस करके अपना देहत्याग कर दिया। इसके बाद पार्वतीरूपमें पुनः शिवजीको पतिके रूपमें प्राप्त किया॥ १०<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| पश्चाद्दक्षं विनिन्द्यैषा पतिं लेभे भवं तथा।<br>तां ध्यात्वा ह्यसृजद्रुद्राननेकान्नीललोहितः॥ ११ |