भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

अध्याय ६ ] अग्नि तथा पितरोंके वंशका वर्णन...परमेष्ठी सदाशिवकी महिमा ३३


आत्मनस्तु समान् सर्वान् सर्वलोकनमस्कृतान्।<br>याचितो मुनिशार्दूला ब्रह्मणा प्रहसन् क्षणात् ॥ १२<br><br>तैस्तु संच्छादितं सर्वं चतुर्दशविधं जगत्।<br>तान्दृष्ट्वा विविधान् रुद्रान्निर्मलानीललोहितान् ॥ १३हे मुनिशार्दूलो! उन (पार्वती)-का ध्यान करके ब्रह्माजीकी प्रार्थनापर नीललोहित महादेवजीने क्षण-भरमें लीलापूर्वक अपने ही तुल्य तथा समस्त लोकोंके वन्दनीय अनेक रुद्र उत्पन्न कर दिये। उन रुद्रोंने सभी चौदह भुवनोंको पूर्णरूपेण व्याप्त कर लिया॥ ११-१२ १/२॥
जरामरणनिर्मुक्तान् प्राह रुद्रान् पितामहः।<br>नमोऽस्तु वो महादेवास्त्रिनेत्रा नीललोहिताः ॥ १४<br><br>सर्वज्ञाः सर्वगा दीर्घा ह्रस्वा वामनकाः शुभाः।<br>हिरण्यकेशा दृष्टिघ्ना नित्या बुद्धाश्च निर्मलाः ॥ १५<br><br>निर्द्वन्द्वा वीतरागाश्च विश्वात्मानो भवात्मजाः।<br>एवं स्तुत्वा तदा रुद्रान् रुद्रं चाह भवं शिवम्।<br>प्रदक्षिणीकृत्य तदा भगवान् कनकाण्डजः ॥ १६जरा-मरणसे मुक्त तथा निर्मल आत्मावाले उन विविध नीललोहित रुद्रोंको देखकर पितामह ब्रह्माजीने उनसे कहा॥ १३ १/२॥<br>हे त्रिनेत्रधारी नीललोहित महादेबो! आप सभीको नमस्कार है। आप सभी सर्वज्ञ हैं, सर्वव्यापी हैं, दीर्घ-ह्रस्व-वामन (बौना)-रूप धारण करनेवाले हैं, शुभ हैं, हिरण्यकेश हैं, दृष्टिघ्न हैं, नित्य हैं, चेतनायुक्त हैं, निर्मल आत्मावाले हैं, द्वन्द्वरहित हैं, वीतराग हैं, विश्वकी आत्मा हैं तथा शिवजीके आत्मज हैं। इस प्रकार उन रुद्रोंकी अनेकविध स्तुति करके कनकाण्डज (हिरण्यगर्भ) भगवान् ब्रह्माने शिवजीकी प्रदक्षिणाकर उन भवरूप शिवसे कहा॥ १४-१६॥
नमोऽस्तु ते महादेव प्रजा नार्हसि शङ्कर।<br>मृत्युहीना विभोः स्रष्टुं मृत्युयुक्ताः सृज प्रभो ॥ १७हे महादेव! आपको नमस्कार है। हे प्रभो! हे शंकर! आपने तो अमर प्रजाओंको उत्पन्न कर दिया; ऐसी मृत्युहीन प्रजाकी सृष्टि उचित नहीं है। अतएव हे विभो! अब आप मरणधर्मा प्रजाओंका सृजन करनेकी कृपा करें॥ १७॥
ततस्तमाह भगवान् नहि मे तादृशी स्थितिः।<br>स त्वं सृज यथाकामं मृत्युयुक्ताः प्रजाः प्रभो ॥ १८तब भगवान् शंकरने ब्रह्मासे कहा—हे प्रभो! उस प्रकारकी (मरणधर्मा) सृष्टि करनेकी मेरी स्थिति नहीं है। अतएव आप ही मृत्युसे युक्त रहनेवाली प्रजाका अपने इच्छानुसार सृजन कीजिये॥ १८॥
लब्ध्वा ससर्ज सकलं शङ्कराच्चतुराननः।<br>जरामरणसंयुक्तं जगदेतच्चराचरम् ॥ १९भगवान् शंकरकी ऐसी आज्ञा प्राप्तकर चतुरानन ब्रह्माने जरा-मरणसे युक्त इस सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत्की रचना की॥ १९॥
शङ्करोऽपि तदा रुद्रैर्निवृत्तात्मा ह्यधिष्ठितः।<br>स्थाणुत्वं तस्य वै विप्राः शङ्करस्य महात्मनः ॥ २०भगवान् शंकर भी उस समय रुद्रों (रुद्रात्मक सृष्टिके सृजन)-से निवृत्त आत्मावाले होकर अधिष्ठित हो गये। हे विप्रो! निष्कल आत्मावाले तथा अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले उन महात्मा शंकरका
निष्कलस्यात्मनः शम्भोः स्वेच्छाधृतशरीरिणः।<br>शं रुद्रः सर्वभूतानां करोति घृणया यतः ॥ २१