श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| | स्थाणुत्व हो गया। इसीलिये वे भगवान् रुद्र दयार्द्र होकर सभी प्राणियोंका कल्याण करते हैं॥२०-२१॥ | | शङ्करश्चाप्रयत्नेन तदात्मा योगविद्यया।<br>वैराग्यस्थं विरक्तस्य विमुक्तिर्यच्छमुच्यते॥ २२ | भगवान् शंकरकी आत्मा बिना प्रयत्नके ही कल्याण करनेवाली है। वे योगविद्याके द्वारा वैराग्यमें स्थित रहते हैं। विरक्त पुरुषकी मुक्तिको ही कल्याण कहा जाता है॥२२॥ | | अणोस्तु विषयत्यागः संसारभयतः क्रमात्।<br>वैराग्याज्जायते पुंसो विरागो दर्शनान्तरे॥ २३ | स्वल्प विषयोंका त्याग करके प्राणी सांसारिक भयसे मुक्त होकर क्रमसे वैराग्यको प्राप्त होता है और उस वैराग्यसे उस विरागी पुरुषको अन्तमें शिवजीका साक्षात् दर्शन प्राप्त होता है॥२३॥ | | विमुख्यो विगुणत्यागो विज्ञानस्याविचारतः।<br>तस्य चास्य च सन्धानं प्रसादात् परमेष्ठिनः॥ २४ | संसारनिवर्तक आत्मानात्मविवेकरूप विशिष्ट ज्ञानका विचार किये बिना जो क्षणिक विषयत्याग है, वह ज्ञानरहित होनेसे अस्थायी है, अतएव विमुख्य [अप्रशस्य] है। उस सत्, असत् वस्तु-विवेकरूप विचार तथा इस (सांसारिक) विषयोंके त्यागका एक साथ होना परमेष्ठी सदाशिवके कृपाप्रसादसे ही सम्भव है॥२४॥ | | धर्मो ज्ञानञ्च वैराग्यमैश्वर्यं शङ्करादिह।<br>स एव शङ्करः साक्षात् पिनाकी नीललोहितः॥ २५ | इस लोकमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य शिवजीकी कृपासे प्राप्त होते हैं। वे कल्याण करनेके कारण शंकर हैं, पिनाक नामक धनुष धारण करनेके कारण पिनाकी हैं तथा उनका कण्ठ नीला एवं देह लाल होनेके कारण नीललोहित हैं॥२५॥ | | ये शङ्कराश्रिताः सर्वे मुच्यन्ते ते न संशयः।<br>न गच्छन्त्येव नरकं पापिष्ठा अपि दारुणम्॥ २६<br><br>आश्रिताः शङ्करं तस्मात्प्राप्नुवन्ति च शाश्वतम्। | जो प्राणी शंकरजीका आश्रय ग्रहण करते हैं अर्थात् उनके शरणागत होते हैं, वे सभी मुक्ति प्राप्त करते हैं। भगवान् शंकरके आश्रित महान् पापी भी अत्यन्त भयावह नरकको नहीं प्राप्त होते हैं। वे शिवजीके शाश्वत पदको पा जाते हैं। इस विषयमें कोई भी संदेह नहीं है॥२६ १/२॥ | | ऋषय ऊचुः<br>मायान्ताश्चैव घोराद्या ह्यष्टाविंशतिरेव च॥ २७<br><br>कोटयो नरकाणान्तु पच्यन्ते तासु पापिनः।<br>अनाश्रिताः शिवं रुद्रं शङ्करं नीललोहितम्॥ २८ | **ऋषिगण बोले—**अहंकार (घोर)-से लेकर मायापर्यन्त विभिन्न प्रकारके कुल अट्ठाईस करोड़ नरक हैं; उनमें जाकर पापी प्राणी अपने द्वारा किये गये कर्मोंके फल भोगते हैं। ये वही प्राणी होते हैं, जो शिव, रुद्र, शंकर, नीललोहित, सभी प्राणियोंके आश्रय, | | आश्रयं सर्वभूतानामव्ययं जगतां पतिम्।<br>पुरुषं परमात्मानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम्॥ २९ | अव्यय, जगत्पति, विराट् पुरुष, परमात्मा, पुरुहूत, |