श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ७ ] माहेश्वरयोगका प्रतिपादन···माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन [ ३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तमसा कालरुद्राख्यं रजसा कनकाण्डजम्।<br>सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं निर्गुणत्वे महेश्वरम्॥ ३० | पुरुष्टुत, तमोगुणकी प्रधानता होनेपर कालरुद्ररूप, रजो-गुणकी प्रधानता होनेपर ब्रह्मारूप, सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेपर सर्वव्यापी विष्णुरूप तथा गुणरहित होनेपर महेश्वर-रूप भगवान् महादेवजीका आश्रय ग्रहण नहीं किये होते हैं॥ २७–३०॥ |
| केन गच्छन्ति नरकं नराः केन महामते।<br>कर्मणाकर्मणा वापि श्रोतुं कौतूहलं हि नः॥ ३१ | हे महामते! अब हम लोगोंकी यह सुननेकी उत्कट अभिलाषा है कि किन-किन कर्मोंके करने अथवा न करनेसे मनुष्य नरकको प्राप्त होते हैं॥ ३१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शङ्करमाहात्म्यवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शंकरमाहात्म्यवर्णन' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय
माहेश्वरयोगका प्रतिपादन, अट्ठाईस व्यासों तथा चौदह मनुओंकी नामावली, विभिन्न युगोंमें हुए माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>रहस्यं वः प्रवक्ष्यामि भवस्यामिततेजसः।<br>प्रभावं शङ्करस्याद्यं सङ्क्षेपात् सर्वदर्शिनः॥ १ | सूतजी बोले—[हे मुनीश्वरो!] अब मैं संक्षेपमें अमित तेजवाले, सर्वतत्त्वदर्शी भगवान् शंकरके रहस्य तथा श्रेष्ठ प्रभावका वर्णन करूँगा॥ १॥ |
| योगिनः सर्वतत्त्वज्ञाः परं वैराग्यमास्थिताः।<br>प्राणायामादिभिश्चाष्टसाधनैः सहचारिणः॥ २<br><br>करुणादिगुणोपेताः कृत्वापि विविधानि ते।<br>कर्माणि नरकं स्वर्गं गच्छन्त्येव स्वकर्मणा॥ ३ | सभी तत्त्वोंको जाननेवाले, परम वैराग्यको प्राप्त, प्राणायाम आदि योगके आठ साधनोंसे युक्त तथा करुणा आदि गुणोंसे सम्पन्न बड़े-बड़े योगिजन नानाविध कर्म करके भी अपने कर्मानुसार नरक तथा स्वर्गमें जाते हैं॥ २-३॥ |
| प्रसादाज्जायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते।<br>योगेन जायते मुक्तिः प्रसादादखिलं ततः॥ ४ | भगवान् शंकरकी अनुकम्पासे ज्ञान उत्पन्न होता है, ज्ञानसे योगमें प्रवृत्ति होती है और योगसे मुक्तिकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार उन्हें शिवजीकी कृपासे सब कुछ सिद्ध होता है॥ ४॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>प्रसादाद् यदि विज्ञानं स्वरूपं वक्तुमर्हसि।<br>दिव्यं माहेश्वरञ्चैव योगं योगविदां वर॥ ५ | **ऋषिगण बोले—**हे योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! शिवजीकी कृपासे ही यदि विशिष्ट ज्ञान तथा योग होता है, तो उस ज्ञानस्वरूप दिव्य माहेश्वरयोगका आप वर्णन कीजिये॥ ५॥ |
| कथं करोति भगवान् चिन्तया रहितः शिवः।<br>प्रसादं योगमार्गेण कस्मिन् काले नृणां विभुः॥ ६ | विभुतासम्पन्न तथा चिन्तारहित भगवान् शिव योगमार्गके द्वारा किस प्रकार तथा किस कालमें प्राणियोंके ऊपर अनुग्रह करते हैं?॥ ६॥ |
| रोमहर्षण उवाच<br>देवानाञ्च ऋषीणाञ्च पितॄणां सन्निधौ पुरा।<br>शैलादिना तु कथितं शृण्वन्तु ब्रह्मसूनवे॥ ७ | **सूतजी बोले—**प्राचीनकालमें देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंकी सन्निधिमें शिलादपुत्र नन्दीके द्वारा ब्रह्मा-पुत्र सनत्कुमारसे जिस योगके विषयमें कहा गया था, उसे आपलोग सुनें॥ ७॥ |