भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| व्यासावताराणि तथा द्वापरान्ते च सुव्रताः।<br>योगाचार्यावताराणि तथा तिष्ये तु शूलिनः॥ ८<br>तत्र तत्र विभोः शिष्याश्चत्वारः शमभाजनाः।<br>प्रशिष्या बहवस्तेषां प्रसीदत्येवमीश्वरः॥ ९<br>एवं क्रमागतं ज्ञानं मुखादेव नृणां विभोः।<br>वैश्यान्तं ब्राह्मणाद्यं हि घृणया चानुरूपतः॥ १० | हे सुव्रत ऋषियो! द्वापरके अन्तमें व्यासके अवतार, योगाचार्योंके अवतार तथा कलियुगमें शिवजीके अवतार, प्रभुके पवित्र अन्तःकरणवाले चार शिष्य और बहुतसे प्रशिष्य हुए—वे सब महेश्वरकी कृपासे ही योगमें प्रवृत्त हुए॥ ८-९॥<br>इस प्रकार वह ज्ञान क्रमशः शिष्य-परम्पराके माध्यमसे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्योंको भगवान् शिवकी कृपासे उनके मुखसे प्राप्त हुआ॥ १०॥ | | ऋषय ऊचुः<br>द्वापरे द्वापरे व्यासाः के वै कुत्रान्तरेषु वै।<br>कल्पेषु कस्मिन् कल्पे नो वक्तुमर्हसि चात्र तान्॥ ११ | **ऋषिगण बोले—**प्रत्येक द्वापरमें, किन-किन कल्पोंमें तथा किन मन्वन्तरोंमें कौन-कौन व्यास हुए हैं? आप उनके विषयमें हमलोगोंको बताइये॥ ११॥ | | सूत उवाच<br>शृण्वन्तु कल्पे वाराहे द्विजा वैवस्वतान्तरे।<br>व्यासांश्च साम्प्रतं रुद्रांस्तथा सर्वान्तरेषु वै॥ १२<br>वेदानाञ्च पुराणानां तथा ज्ञानप्रदर्शकान्।<br>यथाक्रमं प्रवक्ष्यामि सर्वावर्तेषु साम्प्रतम्॥ १३ | **सूतजी बोले—**हे द्विजो! वर्तमान वाराह कल्प तथा वैवस्वत मन्वन्तरमें एवं अन्य मन्वन्तरोंमें भी जो व्यास तथा रुद्र हुए हैं, उन सभी ज्ञानप्रदर्शक महात्माओंके विषयमें वेदों तथा पुराणोंके अनुसार मैं यथाक्रम कहता हूँ; आपलोग सुनिये॥ १२-१३॥ | | ऋतुः सत्यो भार्गवश्च अङ्गिराः सविता द्विजाः।<br>मृत्युः शतक्रतुर्धीमान् वसिष्ठो मुनिपुङ्गवः॥ १४<br>सारस्वतस्त्रिधामा च त्रिवृतो मुनिपुङ्गवः।<br>शततेजाः स्वयं धर्मो नारायण इति श्रुतः॥ १५<br>तरक्षुश्चारुणिर्धीमांस्तथा देवः कृतञ्जयः।<br>ऋतञ्जयो भरद्वाजो गौतमः कविसत्तमः॥ १६<br>वाचःश्रवाः मुनिः साक्षात्तथा शुष्मायणिः शुचिः।<br>तृणबिन्दुर्मुनी रुक्षः शक्तिः शाक्तेय उत्तरः॥ १७<br>जातूकण्योँ हरिः साक्षात् कृष्णद्वैपायनो मुनिः।<br>व्यासास्त्वेते च शृण्वन्तु कलौ योगेश्वरान् क्रमात्॥ १८<br>असंख्याता हि कल्पेषु विभोः सर्वान्तरेषु च।<br>कलौ रुद्रावताराणां व्यासानां किल गौरवात्॥ १९<br>वैवस्वतान्तरे कल्पे वाराहे ये च तान् पुनः।<br>अवतारान् प्रवक्ष्यामि तथा सर्वान्तरेषु वै॥ २० | हे द्विजो! ऋतु, सत्य, भार्गव, अंगिरा, सविता, मृत्यु, बुद्धिसम्पन्न शतक्रतु, मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधामा, मुनिवर त्रिवृत, शततेजा, साक्षात् धर्मस्वरूप नारायण, तरक्षु, बुद्धियुक्त अरुणि, देव, कृतंजय, ऋतंजय, भरद्वाज, कविश्रेष्ठ गौतम, साक्षात् मुनिस्वरूप वाचःश्रवा, परम पावन शुष्मायणि, मुनि तृणबिन्दु, रुक्ष, शक्ति, शक्तिपुत्र पराशर, जातूकर्ण्य तथा साक्षात् विष्णुस्वरूप मुनि कृष्णद्वैपायन—ये अट्ठाईस व्यास हुए। इसी प्रकार कलियुगमें क्रमसे जो योगेश्वर हुए, कल्पोंमें तथा सभी मन्वन्तरोंमें महेश्वरके जो असंख्य अवतार हुए, कलिमें विशेष महिमाके कारण रुद्रों तथा व्यासोंके जो अवतार हुए एवं श्वेतवाराह कल्पके वैवस्वत मन्वन्तरमें तथा अन्य मन्वन्तरोंमें जो अवतार हुए—उन सभीके विषयमें मैं आप लोगोंको बताऊँगा; आप सब सुनें॥ १४-२०॥ | | ऋषय ऊचुः<br>मन्वन्तराणि वाराहे वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्।<br>तथैव चोर्ध्वकल्पेषु सिद्धान् वैवस्वतान्तरे॥ २१ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] सर्वप्रथम आप वाराह कल्प तथा अन्य कल्पोंके मन्वन्तरोंका वर्णन कीजिये। तत्पश्चात् वैवस्वत मन्वन्तरमें हो चुके सिद्धोंके विषयमें बताइये॥ २१॥ | | रोमहर्षण उवाच<br>मनुः स्वायम्भुवस्त्वाद्यास्ततः स्वारोचिषो द्विजाः।<br>उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा॥ २२ | **सूतजी बोले—**हे द्विजो! आदिमनु स्वायम्भुव मनु हैं, उनके बाद स्वारोचिष मनु हुए। इसी प्रकार |