श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७ ] माहेश्वरयोगका प्रतिपादन···माहेश्वरयोगावतारोंका वर्णन ३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वैवस्वतश्च सावर्णिर्धर्मः सावर्णिणकः पुनः।<br>पिशङ्गश्चापिशङ्गाभः शबलो वर्णकस्तथा॥ २३<br>औकारान्ता अकाराद्या मनवः परिकीर्तिताः।<br>श्वेतः पाण्डुस्तथा रक्तस्ताम्रः पीतश्च कापिलः॥ २४<br>कृष्णः श्यामस्तथा धूम्रः सुधूम्रश्च द्विजोत्तमाः।<br>अपिशङ्गः पिशङ्गश्च त्रिवर्णः शबलस्तथा॥ २५<br>कालन्धुरस्तु कथिता वर्णतो मनवः शुभाः।<br>नामतॊ वर्णतश्चैव वर्णतः पुनरेव च॥ २६ | क्रमसे उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, धर्म, सावर्णिणक, पिशंग, अपिशंगाभ, शबल तथा वर्णक—ये अकारसे लेकर औकारपर्यन्त चौदह स्वरोंके रूपवाले चौदह मनु कहे गये हैं। हे उत्तम ब्राह्मणो ! श्वेत, पाण्डु, रक्त, ताम्र, पीत, कापिल, कृष्ण, श्याम, धूम्र, सुधूम्र, अपिशंग, पिशंग, त्रिवर्ण शबल तथा कालन्धुर—ये चौदह वर्ण (रंग) उन पवित्र मनुओके कहे गये हैं। इस प्रकार वे चौदह मनु स्वायम्भुव आदि नामोंसे, अकार आदि वर्णोंसे तथा श्वेत आदि वर्णों (रंगों)-से अभिहित किये गये हैं॥ २२—२६॥ |
| स्वरात्मानः समाख्याताश्चान्तरे॒शाः समासतः।<br>वैवस्वत ऋकारस्तु मनुः कृष्णः सुरेश्वरः॥ २७<br>सप्तमस्तस्य वक्ष्यामि युगावर्तेषु योगिनः।<br>समतीतेषु कल्पेषु तथा चानागतेषु वै॥ २८ | सभी मन्वन्तराधिपति संक्षेपमें स्वरात्मक कहे गये हैं। ये वर्तमान सुरेश्वर वैवस्वत मनु ऋकाररूप, कृष्णवर्ण तथा क्रममें सातवें हैं। बीते हुए तथा अनागत कल्पोंमें युगके आवर्तनोंपर आनेवाले योगिरूप उस वैवस्वत मनुके बारेमें मैं बताता हूँ॥ २७-२८॥ |
| वाराहः साम्प्रतं ज्ञेयः सप्तमान्तरतः क्रमात्।<br>योगावतांराश्च विभोः शिष्याणां सन्ततिस्तथा॥ २९ | वर्तमान कल्पको श्वेतवाराह कल्प जानना चाहिये। अब मैं इस कल्पके सातवें वैवस्वत मन्वन्तरमें महेश्वरके योगावतारों तथा शिष्यों-प्रशिष्योंका वर्णन करता हूँ॥ २९॥ |
| सम्प्रेक्ष्य सर्वकालेषु तथावर्तेषु योगिनाम्।<br>आद्ये श्वेतः कलौ रुद्रः सुतारो मदनस्तथा॥ ३०<br>सुहोत्रः कङ्कणश्चैव लोगाक्षिर्मुनिंसत्तमाः।<br>जैगीषव्यो महातेजा भगवान् दधिवाहनः॥ ३१<br>ऋषभश्च मुनिर्धीमानुग्रश्चात्रिः सुबालकः।<br>गौतमश्चाथ भगवान् सर्वदेवनमस्कृतः॥ ३२<br>वेदशीर्षश्च गोकर्णो गुहावासी शिखण्डभृत्।<br>जटामाल्यट्टहासश्च दारुको लाङ्गली तथा॥ ३३<br>महाकायमुनिः शूली दण्डी मुण्डीश्वरः स्वयम्।<br>सहिष्णुः सोमशर्मा च नकुलीशो जगद्गुरुः॥ ३४ | सभी कालोंमें तथा युगावर्तनोंमें योगावतारोंको भलीभाँति समझकर उन्हें बताता हूँ। आदि कलि अर्थात् स्वायम्भुव मनुके प्रथम कलिमें रुद्रका ‘श्वेत’ नामक अवतार हुआ; इसके बाद हे श्रेष्ठ मुनियो ! क्रमसे सुतार, मदन, सुहोत्र, कंकण, लोगाक्षि, जैगीषव्य, महातेजस्वी भगवान् दधिवाहन, ऋषभ, मुनि, मेधासम्पन्न उग्र, अत्रि, सुबालक, सभी देवोंके वन्दनीय भगवान् गौतम, वेदशीर्ष, गोकर्ण, गुहावासी, शिखण्डभृत्, जटामाली, अट्टहास, दारुक, लांगली, महाकायमुनि, शूली, दण्डधारी मुण्डीश्वर, सहिष्णु, सोमशर्मा तथा जगद्गुरु नकुलीश—ये अट्ठाईस योगाचार्य अवतरित हुए॥ ३०—३४॥ |
| वैवस्वतेऽन्तरे सम्यक् प्रोक्ता हि परमात्मनः।<br>योगाचार्यावतारा ये सर्वावर्तेषु सुव्रताः॥ ३५<br>व्यासाश्चैवं मुनिश्रेष्ठा द्वापरे द्वापरे त्विमे।<br>योगेश्वराणां चत्वारः शिष्याः प्रत्येकमव्ययाः॥ ३६ | हे सुव्रतो ! सभी युगावर्तोंमें महेश्वरके जो योगाचार्यावतार हुए हैं, वे वैवस्वत मन्वन्तरमें भी भलीभाँति कहे गये हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो ! इस प्रकार प्रत्येक द्वापरमें ये व्यास भी हुए हैं। उन योगेश्वरोंमें सभीके चार-चार शिष्य हुए, जो काम-क्रोधादि विकारोंसे रहित थे॥ ३५-३६॥ |
| श्वेतः श्वेतशिखण्डी च श्वेताश्वः श्वेतलोहितः।<br>दुन्दुभिः शतरूपश्च ऋचीकः केतुमांस्तथा॥ ३७ | श्वेत, श्वेतशिखण्डी, श्वेताश्व, श्वेतलोहित, दुन्दुभि, |