श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ५] ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन २९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुमारौ ब्रह्मणस्तुल्यौ सर्वज्ञौ सर्वभाविनौ।<br>वक्ष्ये भार्याकुलं तेषां मुनीनामग्रजन्मनाम्॥ १४ | उत्पन्न किया था। अग्रजन्मा वे दोनों दिव्य पुत्र नैष्ठिक ब्रह्मचारी, ब्रह्मवादी, सर्वज्ञ, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले तथा ब्रह्माके ही समान थे॥ १३ १/२॥ |
| समासतो मुनिश्रेष्ठाः प्रजासम्भूतिमेव च।<br>शतरूपां तु वै राज्ञीं विराजमसृजत् प्रभुः॥ १५ | हे श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं उन अग्रजन्मा मुनियोंकी भार्याओंका कुल तथा प्रजाओंकी उत्पत्तिका संक्षेपमें वर्णन करूँगा॥ १४ १/२॥ |
| स्वायम्भुवात्तु वै राज्ञी शतरूपा त्वयोनिजा।<br>लेभे पुत्रद्वयं पुण्या तथा कन्याद्वयं च सा॥ १६ | भगवान् ब्रह्माने स्वायम्भुव मनु तथा रानी शतरूपाका सृजन किया। उस अयोनिया तथा पुण्यशालिनी रानी शतरूपाने स्वायम्भुव मनुसे दो पुत्र एवं दो कन्याएँ* उत्पन्न कीं॥ १५-१६॥ |
| उत्तानपादो ह्यवरो धीमान् ज्येष्ठः प्रियव्रतः।<br>ज्येष्ठा वरिष्ठा त्वाकूतिः प्रसूतिश्चानुजा स्मृता॥ १७ | उनमें बुद्धिसम्पन्न प्रियव्रत ज्येष्ठ तथा उत्तानपाद कनिष्ठ पुत्र थे। श्रेष्ठ गुणोंवाली आकूति ज्येष्ठ तथा प्रसूति छोटी कन्या थी॥ १७॥ |
| उपयेमे तदाकूतिं रुचिर्नाम प्रजापतिः।<br>प्रसूतिं भगवान् दक्षो लोकधात्रीं च योगिनीम्॥ १८ | रुचि नामक प्रजापतिने आकूतिको तथा दक्षप्रजापतिने जगद्धात्री योगमयी प्रसूतिको भार्याके रूपमें ग्रहण किया॥ १८॥ |
| दक्षिणासहितं यज्ञमाकूतिः सुषुवे तथा।<br>दक्षिणा जनयामास दिव्या द्वादशपुत्रिकाः॥ १९ | आकूतिने दक्षिणासहित यज्ञ नामक पुत्रको जन्म दिया और दक्षिणाने दिव्य बारह कन्याओंको उत्पन्न किया॥ १९॥ |
| प्रसूतिः सुषुवे दक्षाच्चतुर्विंशति कन्यकाः।<br>श्रद्धां लक्ष्मीं धृतिं पुष्टिं तुष्टिं मेधां क्रियां तथा॥ २०<br><br>बुद्धिं लज्जां वपुः शान्तिं सिद्धिं कीर्तिं महातपाः।<br>ख्यातिं शान्तिं च सम्भूतिं स्मृतिं प्रीतिं क्षमां तथा॥ २१<br><br>सन्नतिं चानसूयां च ऊर्जां स्वाहां सुरारणिम्।<br>स्वधां चैव महाभागां प्रददौ च यथाक्रमम्॥ २२ | प्रसूतिने दक्षप्रजापतिसे श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि, तुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि, कीर्ति, ख्याति, शान्ति, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, देवताओंके लिये अरणिरूपा स्वाहा तथा स्वधा—इन तपोमयी चौबीस कन्याओंको उत्पन्न किया तथा इन महाभाग्यवती कन्याओंको आगे बताये गये क्रमके अनुसार महात्माजनोंको समर्पित कर दिया॥ २०—२२॥ |
| श्रद्धाद्याश्चैव कीर्त्यन्तास्त्रयोदश सुदारिकाः।<br>धर्मं प्रजापतिं जग्मुः पतिं परमदुर्लभाः॥ २३<br><br>उपयेमे भृगुर्धीमान् ख्यातिं तां भार्गवारणिम्।<br>सम्भूतिञ्च मरीचिस्तु स्मृतिं चैवाङ्गिरा मुनिः॥ २४ | श्रद्धासे लेकर कीर्तिपर्यन्त तेरह परम दुर्लभ सुन्दर कन्याओंने प्रजापति धर्मको पतिरूपमें प्राप्त किया। बुद्धिसम्पन्न भृगुने ख्यातिको, भार्गव शुक्राचार्यने अरणि [शान्ति]-को, मरीचिने सम्भूतिको तथा मुनि अंगिराने स्मृतिको पत्नीरूपमें ग्रहण किया॥ २३-२४॥ |
| प्रीतिं पुलस्त्यः पुण्यात्मा क्षमां तां पुलहो मुनिः।<br>ऋतुश्च सन्नतिं धीमान् अत्रिस्ताञ्चानसूयकाम्॥ २५<br><br>ऊर्जां वसिष्ठो भगवान् वरिष्ठो वारिजेक्षणाम्।<br>विभावसुस्तथा स्वाहां स्वधां वै पितरस्तथा॥ २६ | पुण्यात्मा पुलस्त्यने प्रीतिको, मुनि पुलहने क्षमाको, बुद्धिसम्पन्न क्रतुने सन्नतिको, अत्रिने उस अनसूयाको, श्रेष्ठ वसिष्ठने कमलके समान नेत्रोंवाली ऊर्जाको, |
* यहाँ मनुकी दो पुत्रियाँ कही हैं, जबकि भागवत आदिमें 'तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे' मनुकी तीन पुत्रियाँ प्रसिद्ध हैं। लिङ्गपुराणका वर्णन ईशानकल्पका आख्यान है और भागवतका वर्णन श्वेतवाराहकल्पका है। पुराणपठित (पुराणोक्त) सभी आख्यान सत्य हैं, कल्पभेदसे ही भिन्नताकी प्रतीति है।