श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| २८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अभ्यमन्यत सोऽन्यं वै नगा मुख्योद्भवाः स्मृताः।<br>त्रिधा कण्ठो मुनेस्तस्य ध्यायतो वै ह्यवर्तत ॥ ४ | सर्गको सृष्टि-विस्तारका असाधक मानकर वृक्षादिरूप (वृक्ष, गुल्म, लता, वीरुध्, तृणरूप—पाँच प्रकारका सर्ग) मुख्यसर्गका सृजन किया, तदनन्तर ध्यानपूर्वक मनन करते हुए उन ब्रह्माजीका कण्ठ (चिन्तन) त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रज तथा तमोगुणसे युक्त) हो गया॥ ३-४॥ |
| प्रथमं तस्य वै जज्ञे तिर्यक्स्रोतो महात्मनः।<br>ऊर्ध्वस्रोतः परस्तस्य सात्त्विकः स इति स्मृतः॥ ५ | पहले उन महात्मा ब्रह्माने तिर्यक्स्रोत पशु आदि उत्पन्न किये, तत्पश्चात् उन्होंने ऊर्ध्वस्रोतकी रचना की, जो सात्त्विकरूप कहा गया। इसके अनन्तर अर्वाक्स्रोत (मनुष्य आदि), पुनः सत्त्व, तमप्रधान अनुग्रह-सर्ग, तदुपरान्त भूतादिकोंका सर्ग रचा गया॥ ५१/२ ॥ |
| अर्वाक्स्रोतोऽनुग्रहश्च तथा भूतादिकः पुनः।<br>ब्रह्मणो महतस्त्वाद्यो द्वितीयो भौतिकस्तथा॥ ६<br><br>सर्गस्तृतीयश्चैन्द्रियस्तूरीयो मुख्य उच्यते।<br>तिर्यग्योन्यः पञ्चमस्तु षष्ठो दैविक उच्यते॥ ७ | ब्रह्माजीद्वारा रचित पहला सर्ग महत्तत्वादिका है, दूसरा भौतिक सर्ग है, जो भूततन्मात्राओंका है, तीसरा ऐन्द्रियसर्ग है [ये बुद्धिपूर्वक उत्पन्न हुए तीन सर्ग प्राकृत सर्ग हैं] और चौथा मुख्य सर्ग वृक्ष आदिका कहा जाता है। तिर्यक् योनिवाले पशु-पक्षियोंवाला सर्ग पाँचवाँ सर्ग है तथा छठा देवताओंकी सृष्टिवाला [ऊर्ध्वस्रोताओंका] देवसर्ग कहा जाता है॥ ६-७॥ |
| सप्तमो मानुषो विप्रा अष्टमोऽनुग्रहः स्मृतः।<br>नवमश्चैव कौमारः प्राकृता वैकृतास्त्विमे॥ ८ | सातवाँ [अर्वाक्स्रोताओंका] सर्ग मनुष्योंका, आठवाँ अनुग्रहसर्ग है, [ये पाँच वैकृतसर्ग हैं] नौवाँ कौमार सर्ग कहा जाता है। हे विप्रो! प्राकृत तथा वैकृत ये ही नौ सर्ग हैं; जिनमें प्रारम्भके तीन सर्ग प्राकृत हैं तथा पाँच सर्ग वैकृत हैं तथा नौवाँ कौमारसर्ग प्राकृत तथा वैकृत दोनों है॥ ८॥ |
| पुरस्तादसृजद्देवः सनन्दं सनकं तथा।<br>सनातनं मुनिश्रेष्ठा नैष्कर्म्येण गताः परम्॥ ९ | तदुपरान्त भगवान् ब्रह्माने सनक, सनन्दन तथा सनातन [एवं सनत्कुमार] मुनि उत्पन्न किये। ये श्रेष्ठ मुनिगण निष्काम कर्मयोगसे परमपदको प्राप्त हुए॥ ९॥ |
| मरीचिभृग्वङ्गिरसः पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठञ्च सोऽसृजद्योगविद्यया॥ १०<br><br>नवौते ब्रह्मणः पुत्रा ब्रह्मज्ञा ब्राह्मणोत्तमाः।<br>ब्रह्मवादिन एवैते ब्रह्मणः सदृशाः स्मृताः॥ ११<br><br>सङ्कल्पश्चैव धर्मश्च ह्यधर्मो धर्मसन्निधिः।<br>द्वादशैव प्रजास्त्वेता ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ १२ | तत्पश्चात् उन्होंने अपनी योगविद्यासे मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ—इन ऋषियोंको उत्पन्न किया। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ब्रह्माजीके ये नौ [मानस] पुत्र ब्रह्मको जाननेवाले थे। ये ब्रह्मवादी ऋषि ब्रह्माके ही तुल्य कहे गये हैं। संकल्प, धर्म तथा अधर्म भी उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन अव्यक्तजन्मा ब्रह्माकी ये बारह सन्तानें कहलायीं॥ १०-१२॥ |
| ऋभुं सनत्कुमारञ्च ससर्जादौ सनातनः।<br>तावूर्ध्वरेतसौ दिव्यौ चाग्रजौ ब्रह्मवादिनौ॥ १३ | उन सनातन ब्रह्माने आदिमें ऋभु तथा सनत्कुमारको |