भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ५ ] ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि···दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन २७


सुषुष्वापाम्भसि यस्तस्मान्नारायण इति स्मृतः।<br>शर्वर्यन्ते प्रबुद्धो वै दृष्ट्वा शून्यं चराचरम्॥ ५९ब्रह्माजी उसी जलराशिमें शयन करते हैं; इसीलिये उन्हें नारायण कहा जाता है॥ ५८ १/२॥<br>प्रलयकालीन रातके बीतनेपर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी उठे और चराचर जगत्‌को शून्य देखकर उन्होंने सृष्टि करनेका विचार किया॥ ५९ १/२॥
स्रष्टुं तदा मतिञ्चक्रे ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।<br>उदकैराप्लुतां क्ष्मां तां समादाय सनातनः॥ ६०<br><br>पूर्ववत् स्थापयामास वाराहं रूपमास्थितः।<br>नदीनदसमुद्रांश्च पूर्ववच्चाकरोत्प्रभुः॥ ६१उन सनातन ब्रह्माने वाराहका रूप धारण करके जलमें डूबी हुई पृथ्वीको निकालकर उसे पुनः पूर्वकी भाँति स्थापित कर दिया और उसपर नदी, नद तथा समुद्रोंको उन प्रभुने पूर्वकी भाँति पुनः कर दिया॥ ६०-६१॥
कृत्वा धरां प्रयत्नेन निम्नोन्नतिविवर्जिताम्।<br>धरायां सोऽचिनोत् सर्वान् गिरीन् दग्धान् पुराग्निना॥ ६२ब्रह्माजीने प्रयत्नपूर्वक पृथ्वीतलपर दबे हुए तथा उठे भागोंको ठीक करके उन्हें समतल किया और उन्होंने पूर्वकालमें अग्निसे दग्ध सभी पर्वतोंको धरापर पुनः पूर्ववत् बना दिया॥ ६२॥
भूराद्यांश्चतुरो लोकान् कल्पयामास पूर्ववत्।<br>स्रष्टुञ्च भगवान् चक्रे तदा स्रष्टा पुनर्मतिम्॥ ६३इस प्रकार भगवान् ब्रह्माने जब भूः आदि चारों लोकोंकी पूर्वकी भाँति रचना कर ली, तब उन सृष्टिकर्ताने पुनः सृष्टि करनेका विचार किया॥ ६३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सृष्टिप्रारम्भवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘सृष्टिप्रारम्भवर्णन’ नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥


पाँचवाँ अध्याय

ब्रह्माजीद्वारा पंचपर्वा अविद्याकी सृष्टि, नौ प्रकारकी सृष्टि (नवविध सर्ग)-की संरचना, मरीचि आदि ऋषियोंकी उत्पत्ति, मनु-शतरूपाका प्रादुर्भाव तथा दक्षप्रजापतिकी कन्याओंका वंशवर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—हे ब्राह्मणो! जब ब्रह्माजीने
यदा स्रष्टुं मतिं चक्रे मोहश्चासीन्महात्मनः।<br>द्विजाश्चाबुद्धिपूर्वं तु ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ १अबुद्धिपूर्वक अर्थात् सम्यक् विचार किये बिना सृष्टिरचनाका विचार किया, तब उन अव्यक्तजन्मा महात्मा ब्रह्माको मोहने व्याप्त कर लिया॥ १॥
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रश्चान्धसंज्ञितः।<br>अविद्या पञ्चधा ह्येषा प्रादुर्भूता स्वयम्भुवः॥ २उन स्वयम्भूसे प्रथम तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) तथा अन्धतामिस्र (अभिनिवेश) नामवाली—ये पाँच प्रकारकी [पंचपर्वा] अविद्याएँ उत्पन्न हो गयीं॥ २॥
अविद्यया मुनेर्ग्रस्तः सर्गो मुख्य इति स्मृतः।<br>असाधक इति स्मृत्वा सर्गो मुख्यः प्रजापतिः॥ ३ब्रह्माजीका वह मुख्य [प्रथम] सर्ग (सृष्टि) अविद्यासे ग्रस्त कहा गया है, तब उन्होंने इस प्रथम