भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 680
६७८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उस्सेधस्तु तदर्थं स्यात्सूत्रेण समितं ततः।<br>सप्ताङ्गुलं भवेदास्यं विस्तरायामतः पुनः॥ ३०<br>त्रिभागैकं भवेदग्रं कृत्वा शेषं परित्यजेत्।<br>कण्ठं च द्व्यङ्गुलायामं विस्तारं चतुरङ्गुलम्॥ ३१पूर्णाहुतिमें प्रयुक्त होनेवाला स्रुव छत्तीस अँगल लम्बा, आठ अँगल चौड़ा और चार अँगल मोटा बनाना चाहिये। सूतके द्वारा उसे सम कर लेना चाहिये। उस स्रुवका मुख सात अँगल चौड़ा होना चाहिये और बारह अँगल लम्बा होना चाहिये। स्रुव का कण्ठ दो अँगल लम्बा और चार अँगल चौड़ा होना चाहिये॥ २९–३१॥
वेदिरष्टाङ्गुलायामा विस्तारस्तत्प्रमाणतः।<br>तस्य मध्ये बिलं कुर्याच्चतुरङ्गुलमानतः॥ ३२<br>बिलं सुवर्तितं कुर्यादष्टपत्रं सुकर्णिकम्।<br>परितो बिलबाह्ये तु पट्टिकार्थाङ्गुलेन तु॥ ३३<br>तद्बाह्ये च विनिद्रं तु पद्मपत्रविचित्रितम्।<br>यवद्वयप्रमाणेने तद्बाह्ये पट्टिका भवेत्॥ ३४वेदी आठ अँगल लम्बी तथा उतने ही प्रमाणकी अर्थात् आठ अँगल चौड़ी होनी चाहिये। उसके मध्यमें चार अँगल प्रमाणका गर्त बनाना चाहिये। गर्त पूर्णरूपसे गोल, अष्टदलयुक्त और सुन्दर कर्णिकामय निर्मित करना चाहिये। उस गर्तके बाहर चारों ओर आधे अँगलप्रमाणकी पट्टिका, पट्टिकाके बाहर विकसित सुन्दर कमल और पुनः उसके बाहर दो यव-प्रमाणकी पट्टिकाकी रचना करनी चाहिये॥ ३२–३४॥
वेदिकामध्यतो रन्ध्रं कनिष्ठाङ्गुलमानतः।<br>खातं यावन्मुखान्तः स्याद् बिलमानं तु निम्नगम्॥ ३५<br>दण्डं षडङ्गुलं नालं दण्डाग्रे दण्डिकात्रयम्।<br>अर्धाङ्गुलविवृद्ध्या तु कर्तव्यं चतुरङ्गुलम्॥ ३६<br>त्रयोदशाङ्गुलायामं दण्डमूले घटं भवेत्।<br>द्व्यङ्गुलस्तु भवेत्कुम्भो नाभिं विद्याद्दशाङ्गुलम्॥ ३७<br>वेदिमध्ये तथा कृत्वा पादं कुर्याच्च द्व्यङ्गुलम्।<br>पद्मपृष्ठसमाकारं पादं वै कर्णिकाकृतिम्॥ ३८<br>गजौष्ठसदृशाकारं तस्य पृष्ठाकृतिर्भवेत्।<br>अभिचारादिकार्येषु कुर्यात्कृष्णायसेन तु॥ ३९<br>पञ्चविंशत्कुशेनैव स्रुक्स्रुवौ मार्जयेत्पुनः।<br>अग्रमग्रेण संशोध्य मध्यं मध्येन सुव्रत॥ ४०<br>मूलं मूलेन विधिना अग्नौ ताप्य हृदा पुनः।वेदीके मध्यमें कनिष्ठा अँगुलीके प्रमाणसे मुखपर्यन्त गम्भीर प्रवाहवाला छिद्र होना चाहिये। दण्डका मूल छः अँगल-प्रमाणका होना चाहिये, दण्डके अग्रभागमें चार अँगलके बीच आधे अँगलकी वृद्धिसे तीन दण्डिकाएँ बनानी चाहिये। दण्डके अग्रभागमें तेरह अँगलके विस्तारमें घट (शिर) होना चाहिये, उसका कण्ठ दो अँगल और नाभि अर्थात् मध्य भाग दस अँगल होना चाहिये। वेदीके मध्यमें वैसे ही दस अँगलकी पद्मपृष्ठके आकारकी नाभि बनाकर दो अँगल-प्रमाणका कर्णिकाके आकृतिसदृश पाद बनाना चाहिये। उस स्रुवके पृष्ठकी आकृति हाथीके ओष्ठके आकारसदृश होनी चाहिये। अभिचार आदि कर्मोंमें कृष्ण लौहसे स्रुक्-स्रुवका निर्माण करना चाहिये। तदनन्तर पचीस कुशोंके द्वारा स्रुक्-स्रुवका मार्जन करना चाहिये। हे सुव्रत! [स्रुक्-स्रुवके] अग्रभागको कुशके अग्रभागसे, मध्यभागको मध्य भागसे और मूलको मूलसे शोधित करके पुनः भलीभाँति हृदयमन्त्रका उच्चारण करके अग्निमें उन्हें तपाना चाहिये॥ ३५–४० १/२॥
आज्यस्थाली प्रणीता च प्रोक्षणी तिस्त्र एव च॥ ४१<br>सौवर्णी राजती वापि ताम्री वा मृन्मयी तु वा।<br>अन्यथा नैव कर्तव्यं शान्तिके पौष्टिके शुभे॥ ४२आज्यस्थाली, प्रणीता और प्रोक्षणी—ये तीनों ही पात्र सोने, चाँदी, ताम्र अथवा मिट्टीके होने चाहिये। शान्तिक तथा पौष्टिक शुभ कर्ममें अन्य धातुके पात्रोंका