भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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६७४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| मूर्ध्नि पुष्पं निधायैवं न शून्यं लिङ्गमस्तकं कुर्यादत्र श्लोकः॥ २८<br><br>यस्य राष्ट्रे तु लिङ्गस्य मस्तकं शून्यलक्षणम्।<br>तस्यालक्ष्मीर्महारोगो दुर्भिक्षं वाहनक्षयः॥ २९<br><br>तस्मात्परिहरेद्राजा धर्मकामार्थमुक्तये।<br>शून्ये लिङ्गे स्वयं राजा राष्ट्रं चैव प्रणश्यति॥ ३० | स्नान कराना चाहिये॥ २५-२७॥<br><br>शिवलिङ्गके मस्तकपर पुष्प रखकर ही अभिषेक करना चाहिये; लिङ्गमस्तकको शून्य नहीं रखना चाहिये। इस सम्बन्धमें यह श्लोक है—जिस राजाके राष्ट्रमें लिङ्गका मस्तक बिल्वपत्र या पुष्पसे शून्य रहता है, उसके यहाँ लक्ष्मीशून्यता, महारोग, दुर्भिक्ष तथा वाहनोंका क्षय होता है। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चतुर्विधपुरुषार्थकी प्राप्तिके लिये राजाको चाहिये कि शिवलिङ्गके मस्तकको शून्य न रखे; लिङ्गके शून्य रहनेपर स्वयं राजा तथा राष्ट्र—दोनों ही नष्ट हो जाते हैं॥ २८-३०॥ | | एवं सुस्नाप्यार्घ्यं च दत्त्वा सम्मृज्य वस्त्रेण गन्धपुष्पवस्त्रालङ्कारादींश्च मूलेन दद्यात्॥ ३१<br><br>धूपाचमनीयदीपनैवेद्यादींश्च मूलेन प्रधानेनोपरि पूजनं पवित्रीकरणमित्युक्तम्॥ ३२ | इस प्रकार सम्यक् स्नान कराकर अर्घ्य अर्पण करके वस्त्रसे [शिवलिङ्गको] भलीभाँति पोंछकर मूलमन्त्रके द्वारा गन्ध, पुष्प, वस्त्र, अलंकार, धूप, आचमनीय, दीप, नैवेद्य आदि प्रदान करना चाहिये। शिवलिङ्गके मस्तकपर केवल प्रणवके द्वारा पूजनको पवित्रीकरण कहा गया है। | | आरार्तिदीपादींश्चैव धेनुमुद्रामुद्रितानि कवचेनावगुण्ठितानि षष्ठेन रक्षितानि लिङ्गोपरि लिङ्गे च लिङ्गस्याधः साधारणं च दर्शयेत्॥ ३३ | आरती तथा दीप, धेनुमुद्रा बनाकर कवचसे अवगुण्ठनकर तथा षष्ठ मन्त्रसे रक्षण करके लिङ्गके मस्तकपर, लिङ्गके मध्य भागमें तथा लिङ्गके अधोभागमें प्रदर्शित करना चाहिये। | | मूलेन नमस्कारं विज्ञाप्यावाहनस्थापनसन्निरोधसान्निध्यपाद्याचमनीयार्घ्यगन्धपुष्पधूपनैवेद्याचमनीयहस्तोद्वर्तनमुखवासाद्युपचारयुक्तं ब्रह्माङ्गभोगमार्गेण पूजयेत्॥ ३४ | मूल मन्त्रसे नमस्कार करके आवाहन, स्थापन, संनिरोधन, सान्निध्य, पाद्य, आचमनीय, अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमनीय, हस्तोद्वर्तन, मुखवास आदि उपचार निवेदित करके ब्रह्ममन्त्रस्वरूप पाद आदि अंगोंकी उपचारक्रमसे पूजा करनी चाहिये॥ ३१-३४॥ | | सकलध्यानं निष्कलस्मरणं परावरध्यानं मूलमन्त्रजपः। दशांशं ब्रह्माङ्गजपसमर्पणमात्मनिवेदनस्तुतिनमस्कारादयश्च गुरुपूजा च पूर्वतो दक्षिणे विनायकस्य॥ ३५ | पूजाके अनन्तर सकल (सगुण) ध्यान, निष्कल (निर्गुण) ध्यान, परावर ध्यान, मूलमन्त्रजप, ब्रह्ममन्त्र तथा अंगमन्त्रका दशांशजप, समर्पण, आत्मनिवेदन, स्तुति, नमस्कार आदि करके पूर्वभागमें गुरुपूजा तथा दक्षिण भागमें विनायक गणपतिकी पूजा करनी चाहिये। | | आदौ चान्ते च सम्पूज्यो विघ्नेशो जगदीश्वरः।<br>दैवतैश्च द्विजैश्चैव सर्वकर्मार्थसिद्धये॥ ३६ | देवताओं तथा ब्राह्मणोंको समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये आदिमें तथा अन्तमें जगत्‌के स्वामी विघ्नेश्वर श्रीगणेशकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करनी चाहिये॥ ३५-३६॥ | | यः शिवं पूजयेद्देवं लिङ्गे वा स्थण्डिलेऽपि वा।<br>स याति शिवसायुज्यं वर्षमात्रेण कर्मणा॥ ३७ | जो लिङ्गमें अथवा स्थण्डिलमें शिवकी पूजा करता है, वह केवल एक ही वर्षमें अपने इस कर्मके |