भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 666, कुल 834 में से

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पृष्ठ 666

६६४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग


श्लोकअनुवाद
वरदं दक्षिणं हस्तं वामं पद्मविभूषितम्।<br>सर्वाभरणसम्पन्ना रक्तस्रगनुलेपनाः ॥ ५४<br><br>रक्ताम्बरधराः सर्वा मूर्तयस्तस्य संस्थिताः।<br>समण्डलो महादेवः सिन्दूरारुणविग्रहः ॥ ५५<br><br>पद्महस्तोऽमृतास्यश्च द्विहस्तनयनः प्रभुः।<br>रक्ताभरणसंयुक्तो रक्तस्रगनुलेपनः ॥ ५६<br><br>इत्थं रूपधरं ध्यायेद्भास्करं भुवनेश्वरम्।सभी अंग विद्युत्के समान कान्तिवाले तथा शान्त हैं, उनका अस्त्र रौद्र कहा गया है, बड़ी दाढ़ोंके कारण उनका मुख विकराल है, वे भयंकर आठ मूर्तियोंसे युक्त हैं, उनके दक्षिण हाथमें वरमुद्रा तथा बायें हाथमें पद्म सुशोभित है, समस्त आभरणोंसे सुशोभित, रक्तवर्णकी माला तथा रक्त अनुलेपसे युक्त तथा रक्तवस्त्र धारण किये उनकी सभी मूर्तियाँ (शक्तियाँ) उनके साथ विराजमान हैं। मण्डलसहित वे महादेव सिन्दूरके समान अरुण विग्रहवाले हैं, हाथमें कमल धारण किये हुए हैं, अमृतमय मुखमण्डलवाले हैं, दो हाथों तथा नेत्रोंसे सम्पन्न हैं, रक्त आभरणोंसे भूषित हैं तथा रक्तवर्णकी माला एवं अनुलेपसे सुशोभित हैं—इस प्रकारका रूप धारण किये हुए भुवनेश्वर भास्करका ध्यान करना चाहिये॥ ४९–५६ १/२ ॥
पद्मबाह्ये शुभं चात्र मण्डलेषु समन्ततः ॥ ५७<br><br>सोममङ्गारकं चैव बुधं बुद्धिमतां वरम्।<br>बृहस्पतिं महाबुद्धिं रुद्रपुत्रं च भार्गवम् ॥ ५८<br><br>शनैश्चरं तथा राहुं केतुं धूम्रं प्रकीर्तितम्।<br>सर्वे द्विनेत्रा द्विभुजा राहुश्चोर्ध्वशरीरधृक् ॥ ५९<br><br>विवृतास्योऽञ्जलिं कृत्वा भृकुटीकुटिलेक्षणः।<br>शनैश्चरश्च दंष्ट्रास्यो वरदाभयहस्तधृक् ॥ ६०<br><br>स्वैःस्वैर्भावैः स्वनाम्ना च प्रणवादिनमोऽन्तकम्।<br>पूजनीयाः प्रयत्नेन धर्मकामार्थसिद्धये ॥ ६१कमलके बाह्य भागमें सभी ओर मण्डलोंमें शुभ चन्द्र, मंगल, बुध, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बृहस्पति, महान् बुद्धिवाले रुद्रपुत्र शुक्र, शनैश्चर, राहु तथा धूम्रवर्ण कहे जानेवाले केतुका पूजन करना चाहिये। सभी दो नेत्रों एवं दो भुजाओंवाले हैं, राहु केवल ऊर्ध्व शरीर (सिर)-वाला है, वह मुख खोले हुए तथा टेढ़ी भौंहों और कुटिल दृष्टिवाला है, शनैश्चर भयंकर दाँतोंसे युक्त मुखवाला और हाथमें वरद तथा अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं। इनके नामके आदिमें प्रणव (ॐ) तथा अन्तमें नमः लगाकर धर्म, काम एवं अर्थकी सिद्धिके लिये प्रयत्नपूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिये॥ ५७–६१॥
सप्तसप्तगणांश्चैव बहिर्देवस्य पूजयेत्।<br>ऋषयो देवगन्धर्वाः पन्नगाप्सरसां गणाः ॥ ६२<br><br>ग्रामण्यो यातुधानाश्च तथा यक्षाश्च मुख्यतः।<br>सप्ताश्वान् पूजयेदग्रे सप्तच्छन्दोमयान् विभोः ॥ ६३<br><br>बालखिल्यगणं चैव निर्माल्यग्रहणं विभोः।<br>पूजयेदासनं मूर्तेर्देवतामपि पूजयेत् ॥ ६४<br><br>अर्घ्यं च दापयेत्तेषां पृथगेव विधानतः।<br>आवाहने च पूजान्ते तेषामुद्वासने तथा ॥ ६५सूर्यदेवके मण्डलके बाहर उनचास मरुद्गणोंकी भी पूजा करनी चाहिये। जो ऋषि, देव, गन्धर्व, नाग, अप्सराएँ, ग्रामणी, यातुधान (राक्षस) तथा यक्ष हैं, उनका भी पूजन करना चाहिये। भगवान् सूर्यके वेदमय सात अश्वोंकी पूजा पहले करनी चाहिये। प्रभु सूर्यके निर्माल्यग्राही बालखिल्य ऋषिगणोंकी भी पूजा करनी चाहिये। मूर्तिके आसन तथा देवताकी भी पूजा करनी चाहिये। उन सूर्य आदि देवताओंके आवाहनमें, पूजाके अन्तमें तथा विसर्जनके अन्तमें विधानके अनुसार पृथक्-पृथक् अर्घ्य प्रदान करना चाहिये॥ ६२–६५॥
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