श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६६४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग
| श्लोक | अनुवाद |
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| वरदं दक्षिणं हस्तं वामं पद्मविभूषितम्।<br>सर्वाभरणसम्पन्ना रक्तस्रगनुलेपनाः ॥ ५४<br><br>रक्ताम्बरधराः सर्वा मूर्तयस्तस्य संस्थिताः।<br>समण्डलो महादेवः सिन्दूरारुणविग्रहः ॥ ५५<br><br>पद्महस्तोऽमृतास्यश्च द्विहस्तनयनः प्रभुः।<br>रक्ताभरणसंयुक्तो रक्तस्रगनुलेपनः ॥ ५६<br><br>इत्थं रूपधरं ध्यायेद्भास्करं भुवनेश्वरम्। | सभी अंग विद्युत्के समान कान्तिवाले तथा शान्त हैं, उनका अस्त्र रौद्र कहा गया है, बड़ी दाढ़ोंके कारण उनका मुख विकराल है, वे भयंकर आठ मूर्तियोंसे युक्त हैं, उनके दक्षिण हाथमें वरमुद्रा तथा बायें हाथमें पद्म सुशोभित है, समस्त आभरणोंसे सुशोभित, रक्तवर्णकी माला तथा रक्त अनुलेपसे युक्त तथा रक्तवस्त्र धारण किये उनकी सभी मूर्तियाँ (शक्तियाँ) उनके साथ विराजमान हैं। मण्डलसहित वे महादेव सिन्दूरके समान अरुण विग्रहवाले हैं, हाथमें कमल धारण किये हुए हैं, अमृतमय मुखमण्डलवाले हैं, दो हाथों तथा नेत्रोंसे सम्पन्न हैं, रक्त आभरणोंसे भूषित हैं तथा रक्तवर्णकी माला एवं अनुलेपसे सुशोभित हैं—इस प्रकारका रूप धारण किये हुए भुवनेश्वर भास्करका ध्यान करना चाहिये॥ ४९–५६ १/२ ॥ |
| पद्मबाह्ये शुभं चात्र मण्डलेषु समन्ततः ॥ ५७<br><br>सोममङ्गारकं चैव बुधं बुद्धिमतां वरम्।<br>बृहस्पतिं महाबुद्धिं रुद्रपुत्रं च भार्गवम् ॥ ५८<br><br>शनैश्चरं तथा राहुं केतुं धूम्रं प्रकीर्तितम्।<br>सर्वे द्विनेत्रा द्विभुजा राहुश्चोर्ध्वशरीरधृक् ॥ ५९<br><br>विवृतास्योऽञ्जलिं कृत्वा भृकुटीकुटिलेक्षणः।<br>शनैश्चरश्च दंष्ट्रास्यो वरदाभयहस्तधृक् ॥ ६०<br><br>स्वैःस्वैर्भावैः स्वनाम्ना च प्रणवादिनमोऽन्तकम्।<br>पूजनीयाः प्रयत्नेन धर्मकामार्थसिद्धये ॥ ६१ | कमलके बाह्य भागमें सभी ओर मण्डलोंमें शुभ चन्द्र, मंगल, बुध, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ बृहस्पति, महान् बुद्धिवाले रुद्रपुत्र शुक्र, शनैश्चर, राहु तथा धूम्रवर्ण कहे जानेवाले केतुका पूजन करना चाहिये। सभी दो नेत्रों एवं दो भुजाओंवाले हैं, राहु केवल ऊर्ध्व शरीर (सिर)-वाला है, वह मुख खोले हुए तथा टेढ़ी भौंहों और कुटिल दृष्टिवाला है, शनैश्चर भयंकर दाँतोंसे युक्त मुखवाला और हाथमें वरद तथा अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं। इनके नामके आदिमें प्रणव (ॐ) तथा अन्तमें नमः लगाकर धर्म, काम एवं अर्थकी सिद्धिके लिये प्रयत्नपूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिये॥ ५७–६१॥ |
| सप्तसप्तगणांश्चैव बहिर्देवस्य पूजयेत्।<br>ऋषयो देवगन्धर्वाः पन्नगाप्सरसां गणाः ॥ ६२<br><br>ग्रामण्यो यातुधानाश्च तथा यक्षाश्च मुख्यतः।<br>सप्ताश्वान् पूजयेदग्रे सप्तच्छन्दोमयान् विभोः ॥ ६३<br><br>बालखिल्यगणं चैव निर्माल्यग्रहणं विभोः।<br>पूजयेदासनं मूर्तेर्देवतामपि पूजयेत् ॥ ६४<br><br>अर्घ्यं च दापयेत्तेषां पृथगेव विधानतः।<br>आवाहने च पूजान्ते तेषामुद्वासने तथा ॥ ६५ | सूर्यदेवके मण्डलके बाहर उनचास मरुद्गणोंकी भी पूजा करनी चाहिये। जो ऋषि, देव, गन्धर्व, नाग, अप्सराएँ, ग्रामणी, यातुधान (राक्षस) तथा यक्ष हैं, उनका भी पूजन करना चाहिये। भगवान् सूर्यके वेदमय सात अश्वोंकी पूजा पहले करनी चाहिये। प्रभु सूर्यके निर्माल्यग्राही बालखिल्य ऋषिगणोंकी भी पूजा करनी चाहिये। मूर्तिके आसन तथा देवताकी भी पूजा करनी चाहिये। उन सूर्य आदि देवताओंके आवाहनमें, पूजाके अन्तमें तथा विसर्जनके अन्तमें विधानके अनुसार पृथक्-पृथक् अर्घ्य प्रदान करना चाहिये॥ ६२–६५॥ |
| अध्याय २२ ] | शिवदीक्षा-प्रकरणमें सौरस्नानविधि तथा भास्करार्चाका वर्णन | ६६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सहस्रं वा तदर्धं वा शतमष्टोत्तरं तु वा।<br>बाष्कलं च जपेदग्रे दशांशेन च योजयेत्॥ ६६<br><br>कुण्डं च पश्चिमे कुर्याद्वर्तुलं चैव मेखलम्।<br>चतुरङ्गुलमानेन चोत्सेधाद्विस्तरादपि॥ ६७<br><br>एकहस्तप्रमाणे नित्ये नैमित्तिके तथा।<br>कृत्वाश्वत्थदलाकारं नाभिं कुण्डे दशाङ्गुलम्॥ ६८<br><br>तदर्धेन पुरस्तात्तु गजोष्ठसदृशं स्मृतम्।<br>गलमेकाङ्गुलं चैव शेषं द्विगुणविस्तरम्॥ ६९<br><br>तत्प्रमाणे कुण्डस्य त्यक्त्वा कुर्वीत मेखलाम्।<br>यत्नेन साधयित्वैव पश्चाद्धोमं च कारयेत्॥ ७० | इसके बाद एक हजार, पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार बाष्कल मन्त्रका जप करना चाहिये और पुनः दशांश हवन करना चाहिये। [हवनके लिये] मण्डलके पश्चिमकी ओर वर्तुलाकार कुण्ड बनाना चाहिये और चार अंगुल मापकी ऊँचाई तथा चौड़ाईवाली मेखला बनानी चाहिये। नित्य एवं नैमित्तिक कर्ममें एक हाथ प्रमाणका कुण्ड उत्तम होता है। कुण्डमें अश्वत्थ (पीपल)-के पत्तेके आकारकी दस अँगल परिमाणकी नाभि बनानी चाहिये; उसके आधे (पाँच अंगुल) प्रमाणवाला और हाथीके ओष्ठके सदृश आकारका कुण्डका अगला भाग (योनि) बताया गया है। एक अंगुल प्रमाणका नाल बनाना चाहिये तथा कुण्डके बाहर दो अँगल भाग छोड़कर मेखला बनानी चाहिये। इस प्रकार यत्नपूर्वक कुण्ड बनाकर ही बादमें हवन करना चाहिये॥ ६६-७०॥ |
| षष्ठेनोल्लेखनं कुर्यात्प्रोक्षयेद्वारिणा पुनः।<br>आसनं कल्पयेन्मध्ये प्रथमेन समाहितः॥ ७१<br><br>प्रभावतीं ततः शक्तिमाग्नेय्यां तु विन्यसेत्।<br>बाष्कलेनैव सम्पूज्य गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्॥ ७२<br><br>बाष्कलेनैव मन्त्रेण क्रियां प्रति यजेत्पृथक्।<br>मूलमन्त्रेण विधिना पश्चात्पूर्णाहुतिर्भवेत्॥ ७३<br><br>क्रमादेवं विधानेन सूर्याग्निजनितो भवेत्।<br>पूर्वोक्तेन विधानेन प्रागुक्तं कमलं न्यसेत्॥ ७४<br><br>मुखोपरि समभ्यर्च्य पूर्ववद्भास्करं प्रभुम्।<br>दशैवाहुतयो देया बाष्कलेन महामुने॥ ७५<br><br>अङ्गानां च तथैकैकं संहिताभिः पृथक् पुनः।<br>जयादिस्विष्टपर्यन्तमिध्मप्रक्षेपमेव च॥ ७६ | छठे मन्त्रसे उल्लेखन करना चाहिये तथा जलसे कुण्डका प्रोक्षण करना चाहिये। तदनन्तर समाहित होकर प्रथम मन्त्रसे कुण्डके मध्यमें आसन कल्पित करना चाहिये और प्रथम मन्त्रसे ही प्रभावती [नामक] शक्तिकी स्थापना करनी चाहिये। क्रमसे गन्ध, पुष्प आदिसे बाष्कलमन्त्रके द्वारा ही विधिवत् पूजन करके, बाष्कलमन्त्रसे ही प्रत्येक क्रियाका पृथक् यजन करना चाहिये। तत्पश्चात् मूलमन्त्रसे विधिपूर्वक पूर्णाहुति होनी चाहिये। क्रमशः इस विधानके द्वारा सूर्यरूपी अग्नि उत्पन्न हो, तब पहले कहे गये विधानके अनुसार अग्निमें पूर्वोक्त कमलका न्यास करना चाहिये। हे महामुने! उस कमलके मुखपर पूर्वकी भाँति प्रभु भास्करकी सम्यक् पूजा करके संहितामन्त्रोंसे एक-एक अंगोंके लिये बाष्कलमन्त्रके द्वारा पृथक्-पृथक् दस आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये॥ ७१-७५ १/२॥ |
| सामान्यं सर्वमार्गेषु पारम्पर्यक्रमेण च।<br>निवेद्य देवदेवाय भास्करायामितात्मने॥ ७७<br><br>पूजाहोमादिकं सर्वं दत्त्वार्घ्यं च प्रदक्षिणम्।<br>अङ्गैः सम्पूज्य सङ्क्षिप्य हृद्युद्वास्य नमस्य च॥ ७८ | जयाहोमसे लेकर स्विष्टकृतहोमपर्यन्त पारम्पर्य क्रमसे सभी मार्गोमें यज्ञकाष्ठका प्रक्षेप करना चाहिये। अमित आत्मावाले देवदेव भास्करको समस्त पूजा, होम आदिका समर्पण करके उन्हें अर्घ्य प्रदानकर उनकी प्रदक्षिणा करके अंगमन्त्रोंसे उनकी पूजाकर कर्मोंका |
२३- हृदयदेशमें भगवान् शिवकी मानसपूजा एवं न्यासयोगका वर्णन
| ६६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
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| शिवपूजां ततः कुर्याद्धर्मकामार्थसिद्धये।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं यजनं भास्करस्य च॥ ७९ | उपसंहार करके अपने हृदयकमलमें विसर्जन करके तथा नमस्कार करनेके अनन्तर धर्म-कामकी सिद्धिके लिये शिवपूजा करनी चाहिये। इस प्रकार संक्षेपमें सूर्यपूजन कहा गया॥ ७६-७९॥ | | यः सकृद्वा यजेद्देवं देवदेवं जगद्गुरुम्।<br>भास्करं परमात्मानं स याति परमां गतिम्॥ ८०<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वपापविवर्जितः।<br>सर्वैश्वर्यसमोपेतस्तेजसाप्रतिमश्च सः॥ ८१<br><br>पुत्रपौत्रादिमित्रैश्च बान्धवैश्च समन्ततः।<br>भुक्त्वाैव विपुलान् भोगानिहैव धनधान्यवान्॥ ८२<br><br>यानवाहनसम्पन्नो भूषणैर्विविधैरपि।<br>कालं गतोऽपि सूर्येण मोदते कालमक्षयम्॥ ८३<br><br>पुनस्तस्मादिहागत्य राजा भवति धार्मिकः।<br>वेदवेदाङ्गसम्पन्नो ब्राह्मणो वात्र जायते॥ ८४<br><br>पुनः प्राग्वासनायोगाद्धार्मिको वेदपारगः।<br>सूर्यमेव समभ्यर्च्य सूर्यसायुज्यमाप्नुयात्॥ ८५ | जो [मनुष्य] देवदेव जगद्गुरु परमात्मा भास्करका एक बार भी यजन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। वह पूर्णरूपसे सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है, सभी पापोंसे रहित हो जाता है, सभी ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हो जाता है और अप्रतिम तेजस्वी हो जाता है। वह पुत्र, पौत्र, मित्र तथा बन्धु-बान्धव, धन-धान्य, यान-वाहन, भूषण आदिसे सम्पन्न होकर इस लोकमें विपुल सुखोंका सम्यक् भोग करके मृत्युको प्राप्त होनेपर सूर्यके साथ अनन्त कालतक आनन्द प्राप्त करता है। पुनः वहाँसे इस लोकमें जन्म लेकर धार्मिक राजा होता है अथवा वेदवेदांगसे सम्पन्न ब्राह्मण होता है। तत्पश्चात् पूर्वजन्मके दृढ़ संस्कारके कारण धर्मपरायण तथा वेदमें पारंगत वह मनुष्य भगवान् सूर्यकी ही भलीभाँति उपासना करके सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है॥ ८०-८५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे तत्त्वशुद्धिवर्णनं नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः॥ २२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'तत्त्वशुद्धिवर्णन' नामक बाइसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २२॥
तेईसवाँ अध्याय
हृदयदेशमें भगवान् शिवकी मानसपूजा एवं न्यासयोगका वर्णन
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
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| अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि शिवार्चनमनुत्तमम्।<br>त्रिसन्ध्यमर्चयेदीशमग्निकार्यं च शक्तितः॥ १ | हे सनत्कुमार! अब मैं आपको अत्युत्तम शिव-पूजनकी विधि बताऊँगा। तीनों कालोंमें भगवान् महेश्वरका पूजन करना चाहिये और सामर्थ्यानुसार हवन भी करना चाहिये॥ १॥ |
| शिवस्नानं पुरा कृत्वा तत्त्वशुद्धिं च पूर्ववत्।<br>पुष्पहस्तः प्रविश्याथ पूजास्थानं समाहितः॥ २<br><br>प्राणायामत्रयं कृत्वा दाहनाप्लावनानि च।<br>गन्धादिवासितकरो महामुद्रां प्रविन्यसेत्॥ ३ | सर्वप्रथम शिवस्नान करके पूर्वकी भाँति तत्त्वशुद्धि करे और हाथमें पुष्प आदि लेकर पूजास्थानमें प्रवेश करके समाहितचित्त हो तीन प्राणायाम करके दाहन, आप्लावन आदि शुद्धि करके गन्ध आदिसे हाथोंको सुगन्धित करके [योगशास्त्रमें कही गयी] महामुद्राकी रचना करनी चाहिये॥ २-३॥ |
| विज्ञानेन तनुं कृत्वा ब्रह्माग्नेरपि यत्नतः।<br>अव्यक्तबुद्ध्यहङ्कारतन्मात्रासम्भवां तनुम्॥ ४ | अव्यक्त, बुद्धि, अहंकार तथा पंचतन्मात्राओंसे |
अध्याय २३] हृदयदेशमें भगवान् शिवकी मानसपूजा एवं न्यासयोगका वर्णन ६६७
| शिवामृतेन सम्पूर्तं शिवस्य च यथातथम्।<br>अधोनिष्ठ्या वितस्त्यां तु नाभ्यामुपरि तिष्ठति॥ ५<br>हृदयं तद्विजानीयाद्विश्वस्यायतनं महत्।<br>हृत्पद्मकर्णिकायां तु देवं साक्षात्सदाशिवम्॥ ६<br>पञ्चवक्त्रं दशभुजं सर्वाभरणभूषितम्।<br>प्रतिवक्त्रं त्रिनेत्रं च शशाङ्ककृतशेखरम्॥ ७<br>बद्धपद्मासनासीनं शुद्धस्फटिकसन्निभम्।<br>ऊर्ध्वं वक्त्रं सितं ध्यायेत्पूर्वं कुङ्कुमसन्निभम्॥ ८<br>नीलाभं दक्षिणं वक्त्रमतिरक्तं तथोत्तरम्।<br>गोक्षीरधवलं दिव्यं पश्चिमं परमेष्ठिनः॥ ९<br>शूलं परशुखड्गं च वज्रं शक्तिं च दक्षिणे।<br>वामे पाशाङ्कुशं घण्टां नागं नाराचमुत्तमम्॥ १०<br>वरदाभयहस्तं वा शेषं पूर्ववदेव तु।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं चित्राम्बरधरं शिवम्॥ ११<br>ब्रह्माङ्गविग्रहं देवं सर्वदेवोत्तमोत्तमम्।<br>पूजयेत्सर्वभावेन ब्रह्माङ्गैरब्रह्मणः पतिम्॥ १२ | उत्पन्न शरीरको प्रयत्नपूर्वक शुद्ध ज्ञानसे तथा ज्ञानाग्निसे दग्ध करके कल्याणमय अमृतके द्वारा शिवके योग्य पवित्र देह बनाये। ग्रीवासे एक वितस्ति नीचे तथा नाभिसे एक वितस्ति ऊपर हृदयदेश विराजमान है, उसीको विश्वका महान् स्थान समझना चाहिये; उसी हृदयकमलकी कर्णिकामें साक्षात् भगवान् सदाशिवका ध्यान करना चाहिये। वे पाँच मुखों तथा दस भुजाओंसे युक्त हैं, सभी आभरणोंसे सुशोभित हैं, उन्होंने प्रत्येक मुखमें तीन नेत्र धारण कर रखा है, उनके मस्तकपर चन्द्रमा विराजमान है, वे बद्ध पद्मासन लगाकर बैठे हुए हैं, शुद्ध स्फटिकके समान उनका वर्ण है, उनका ऊर्ध्व मुख श्वेतवर्ण है, पूर्व मुख कुंकुमसदृश है, दक्षिण मुख नील आभावाला है और उत्तर मुख अत्यन्त रक्तवर्ण है। उन परमेष्ठी शिवका पश्चिम मुख गोदुग्धके समान धवल तथा दिव्य है। उन्होंने दाहिने हाथमें शूल, परशु, खड्ग, वज्र तथा शक्ति और बायें हाथमें पाश, अंकुश, घंटा, नाग तथा श्रेष्ठ नाराच धारण कर रखा है, वे समस्त आभरणोंसे समन्वित हैं, अद्भुत वस्त्र पहने हुए हैं और वरद तथा अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं—इस प्रकार सद्योजात आदि अंगविग्रहवाले, सभी देवताओंमें अतिश्रेष्ठ तथा ब्रह्माके पति भगवान् शिवका ध्यान करना चाहिये तथा [सद्योजातादि] ब्रह्ममन्त्रोंसे सम्यक् प्रकारसे उनका पूजन करना चाहिये॥ ४—१२॥ | | उक्तानि पञ्च ब्रह्माणि शिवाङ्गानि शृणुष्व मे।<br>शक्तिभूतानि च तथा हृदयादीनि सुव्रत॥ १३<br>ॐ ईशानः सर्वविद्यानां हृदयाय शक्तिबीजाय नमः।<br>ॐ ईश्वरः सर्वभूतानाममृताय शिरसे नमः॥ १४<br>ॐ ब्रह्माधिपतये कालाग्निरूपाय शिखायै नमः।<br>ॐ ब्रह्माणोऽधिपतये कालचण्डमारुताय कवचाय नमः॥ १५<br>ॐ ब्रह्मणे बृंहणाय ज्ञानमूर्तये नेत्राय नमः।<br>ॐ शिवाय सदाशिवाय पाशुपतास्त्राय अप्रतिहताय फट् फट्॥ १६<br>ॐ सद्योजाताय भवे भवे नातिभवे भवस्य मां भवोद्भवाय शिवमूर्तये नमः। ॐ हंसशिखाय विद्यादेहाय आत्मस्वरूपाय परापराय शिवाय शिवतमाय नमः॥ १७<br>कथितानि शिवाङ्गानि मूर्तिविद्या च तस्य वै।<br>ब्रह्माङ्गमूर्तिं विद्याङ्गसहितां शिवशासने॥ १८ | हे सुव्रत! पंचब्रह्म और शिवांग पहले ही कहे गये हैं; अब शक्तिभूत हृदय आदि मन्त्रोंको सुनिये। ॐ ईशानः सर्वविद्यानां हृदयाय शक्तिबीजाय नमः। ॐ ईश्वरः सर्वभूतानाममृताय शिरसे नमः। ॐ ब्रह्माधिपतये कालाग्निरूपाय शिखायै नमः। ॐ ब्रह्माणोऽधिपतये कालचण्डमारुताय कवचाय नमः। ॐ ब्रह्मणे बृंहणाय ज्ञानमूर्तये नेत्राय नमः। ॐ शिवाय सदाशिवाय पाशुपतास्त्राय अप्रतिहताय फट् फट्। ॐ सद्योजाताय भवे भवे नातिभवे भवस्य मां भवोद्भवाय शिवमूर्तये नमः। ॐ हंसशिखाय विद्यादेहाय आत्मस्वरूपाय परापराय शिवाय शिवतमाय नमः—ये शिवांगमन्त्र, उनके मूर्तिमन्त्र तथा विद्यामन्त्र |
६६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग
| सौराणि च प्रवक्ष्यामि बाष्कलाद्यानि सुव्रत।<br>अङ्गानि सर्ववेदेषु सारभूतानि सुव्रत॥ १९<br>ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ<br>तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म।<br>नवाक्षरमयं मन्त्रं बाष्कलं परिकीर्तितम्।<br>न क्षरतीति लोकेऽस्मिंस्ततो ह्यक्षरमुच्यते।<br>सत्यमक्षरमित्युक्तं प्रणवादिनमोऽन्तकम्॥ २०<br>ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।<br>धियो यो नः प्रचोदयात्।<br>नमः सूर्याय खखोल्काय नमः॥ २१<br>मूलमन्त्रमिति प्रोक्तं भास्करस्य महात्मनः।<br>नवाक्षरेण दीप्ताद्या मूलमन्त्रेण भास्करम्॥ २२<br>पूजयेदङ्गमन्त्राणि कथयामि समासतः।<br>वेदादिभिः प्रभूताद्यं प्रणवेन तु मध्यमम्॥ २३<br>ॐ भूः ब्रह्मणे हृदयाय नमः। ॐ भुवः विष्णवे<br>शिरसे नमः। ॐ स्वः रुद्राय शिखायै नमः। ॐ<br>भूर्भुवः स्वः ज्वालामालिन्यै देवाय नमः। ॐ महः<br>महेश्वराय कवचाय नमः। ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यो<br>नमः। ॐ तपस्तापनाय अस्त्राय नमः।<br>एवं प्रसङ्गाद्देवेश सौराणि कथितानि ह।<br>शैवानि च समासेन न्यासयोगेन सुव्रत॥ २४<br>इत्थं मन्त्रमयं देवं पूजयेद्धृदयाम्बुजे।<br>नाभौ होमं तु कर्तव्यं जनयित्वा यथाक्रमम्॥ २५<br>मनसा सर्वकार्याणि शिवाग्नौ देवमीश्वरम्।<br>पञ्चब्रह्माङ्गसम्भूतं शिवमूर्तिं सदाशिवम्॥ २६<br>रक्तपद्मासनासीनं शकलीकृत्य यत्नतः।<br>मूलेन मूर्तिमन्त्रेण ब्रह्माङ्गाद्यैस्तु सुव्रत॥ २७<br>समिदाज्याहुतीर्हुत्वा मनसा चन्द्रमण्डलात्।<br>चन्द्रस्थानात्समुत्पन्नां पूर्णधारामनुस्मरेत्॥ २८<br>पूर्णाहुतिविधानेन ज्ञानिनां शिवशासने।<br>शिवं वक्त्रगतं ध्यायेत्तेजोमात्रं च शाङ्करम्॥ २९<br>ललाटे देवदेवेशं भ्रूमध्ये वा स्मरेत्पुनः।<br>यच्च हृत्कमले सर्वं समाप्य विधिविस्तरम्॥ ३० | कहे गये हैं। विद्यांगसहित ब्रह्मांग-मूर्तिको शिवशास्त्रमें विद्यमान जानना चाहिये। हे सुव्रत! सभी वेदोंके सारभूत सूर्यसम्बन्धी बाष्कल आदि तथा अंगमन्त्रोंको मैं [प्रसंगवश फिरसे] बताऊँगा॥ १३-१९॥<br><br>ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ ऋतम् ॐ ब्रह्म—यह नौ अक्षरोंवाला बाष्कलमन्त्र कहा गया है। चूँकि नष्ट नहीं होता, अतः इस लोकमें उसे अक्षर कहा जाता है। आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमःसे युक्त मन्त्रको सत्य तथा अक्षर कहा गया है। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥ नमः सूर्याय खखोल्काय नमः—यह महात्मा भास्करका मूलमन्त्र कहा गया है। नवाक्षरमन्त्रसे दीप्ता आदि शक्तियोंकी तथा मूलमन्त्रसे भास्करकी पूजा करनी चाहिये। अब संक्षेपमें अंगमन्त्र बता रहा हूँ। अंगमन्त्र आदिमें प्रणव तथा मध्यमें व्याहृतियोंसे युक्त है। ॐ भूः ब्रह्मणे हृदयाय नमः, ॐ भुवः विष्णवे शिरसे नमः, ॐ स्वः रुद्राय शिखायै नमः, ॐ भूर्भुवः स्वः ज्वालामालिन्यै देवाय नमः, ॐ महः महेश्वराय कवचाय नमः, ॐ जनः शिवाय नेत्रेभ्यो नमः, ॐ तपस्तापनाय अस्त्राय नमः। हे सुव्रत! इस प्रकार मैंने यहाँ प्रसंगवश संक्षेपमें न्यासयोगसे सौर तथा शैव मन्त्रोंको कह दिया॥ २०-२४॥<br><br>इस प्रकार हृदयकमलमें मन्त्रमय भगवान् शिवकी पूजा करे तथा नाभिस्थानमें यथाविधि अग्नि उत्पन्न करके होम करे; सभी कार्य मनसे ही सम्पन्न करना चाहिये। रक्तकमलके आसनपर बैठे हुए पंचब्रह्मांगसम्भूत कल्याणमूर्ति भगवान् सदाशिवको सकलीकृत करके यत्नपूर्वक मूलमन्त्र, मूर्तिमन्त्र, ब्रह्ममन्त्र और अंगमन्त्रोंसे शिवाग्निमें मनसे ही समिधा और घृतकी आहुति प्रदान करके ज्ञानियोंके लिये शिवशास्त्रमें कही गयी तथा चन्द्रमण्डलमें चन्द्रस्थानसे उत्पन्न अमृतधाराका पूर्णाहृतिके विधानसे स्मरण करना चाहिये। कल्याणकारी तेजोमय शिव मेरे मुखमें प्रविष्ट हैं—ऐसा ध्यान करना चाहिये। ललाटमें अथवा भ्रूमध्यस्थानमें उन देवदेवेश शिवका |
२४- न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन और शिवार्चाका माहात्म्य
अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन ६६९
| शुद्धदीपशिखाकारं भावयेद्भवनाशनम्।<br><br>लिङ्गे च पूजयेद्देवं स्थण्डिले वा सदाशिवम्॥ ३१ | स्मरण करना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक समस्त कृत्य सम्पन्न करके अपने हृदयकमलमें शुद्ध दीपशिखाके आकारवाले भवनाशक शिवकी भावना करनी चाहिये और शिवलिङ्ग अथवा स्थण्डिलमें प्रभु सदाशिवकी पूजा करनी चाहिये॥ २५—३१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवार्चनविधिवर्णनं नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः॥ २३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवार्चनविधिवर्णन' नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥
चौबीसवाँ अध्याय
न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन और शिवार्चाका माहात्म्य
| शैलादिरुवाच<br>व्याख्यां पूजाविधानस्य प्रवदामि समासतः।<br>शिवशास्त्रोक्तमार्गेण शिवेन कथितं पुरा॥ १ | शैलादि बोले—[हे सनत्कुमार!] मैं शिवशास्त्रमें कही गयी रीतिसे शिवपूजा-विधिका वर्णन संक्षेपमें कर रहा हूँ, जिसे पूर्व कालमें स्वयं शिवजीने कहा था॥ १॥ |
| अथोभौ चन्दनचर्चितौ हस्तौ वौषडन्तेनाद्यञ्जलिं<br>कृत्वा मूर्तिविद्याशिवादीनि जप्त्वा अङ्गुष्ठादि-<br>कनिष्ठिकान्तं ईशानाद्यं कनिष्ठिकादिमध्यमान्तं<br>हृदयादितृतीयान्तं तुरीयमङ्गुष्ठेनानामिकया पञ्चमं<br>तलद्वयेन षष्ठं तर्जन्यङ्गुष्ठाभ्यां नाराचास्त्रप्रयोगेण<br>पुनरपि मूलं जप्त्वा तुरीयेणावगुण्ठ्य<br>शिवहस्तमित्युच्यते॥ २<br><br>शिवार्चना तेन हस्तेन कार्या॥ ३ | [शिवस्नान और भस्मस्नानके पश्चात्] दोनों हाथोंको चन्दनसे चर्चित करके अन्तमें 'वौषट्' से युक्त मूलमन्त्रके द्वारा अंजलि बाँधकर मूर्ति, विद्या और अंगमन्त्रोंका जप करके अँगुष्ठसे कनिष्ठिकापर्यन्त ईशान आदि पाँच मन्त्रोंका न्यास करे। [न्यासक्रम इस प्रकार है—] पूर्वोक्त अंगमन्त्रोंमेंसे सद्योजातसे लेकर तीसरे अघोर मन्त्रोंका कनिष्ठिका, तर्जनी और मध्यमामें न्यास करे; चौथे मन्त्र (तत्पुरुषमन्त्र)-का अंगुष्ठमें और पाँचवें मन्त्रका अनामिकामें और छठे मन्त्रका दोनों हाथोंके दोनों तलोंमें न्यास करे। इसके पश्चात् तर्जनी तथा अंगुष्ठके योगसे नाराच अस्त्र मुद्रा बनाये और फिर मूलमन्त्र (पंचाक्षरमन्त्र)-का जप करके चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन करे; इसे ही शिवहस्त कहा जाता है, उसी हाथसे शिवपूजन करना चाहिये॥ २-३॥ |
| तत्त्वगतमात्मानं व्यवस्थाप्य तत्त्वशुद्धिं पूर्ववत्॥ ४<br><br>क्ष्माम्भोऽग्निवायुव्योमान्तं पञ्चचतुःशुद्धकोट्यन्ते<br>धारासहितेन व्यवस्थाप्य तत्त्वशुद्धिं पूर्वं कुर्यात्॥ ५ | तत्त्वोंमें विद्यमान आत्माको व्यवस्थित करके पूर्वकी भाँति तत्त्वशुद्धि करनी चाहिये। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशपर्यन्त पंचकोशोंका अतिक्रमण करके अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति और ब्रह्मका भी उल्लंघनकर शुद्धकोटि (ब्रह्म)-के समीप अमृतधारासहित सुषुम्णा मार्गसे अपनी आत्माको स्थापित करके सर्वप्रथम |
| ६७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्त्वशुद्धिः षष्ठेन सद्येन तृतीयेन फडन्ताद्धराशुद्धिः ॥ ६<br><br>षष्ठसहितेन सद्येन तृतीयेन फडन्तेन वारितत्त्वशुद्धिः ॥ ७<br><br>वाह्नेयतृतीयेन फडन्तेनाग्निशुद्धिः ॥ ८<br><br>वायव्यचतुर्थेन षष्ठसहितेन फडन्तेन वायुशुद्धिः ॥ ९<br><br>षष्ठेन ससद्येन तृतीयेन फडन्तेनाकाशशुद्धिः ॥ १० | तत्त्वशुद्धि करनी चाहिये ॥ ४-५ ॥<br><br>तत्त्वशुद्धि इस प्रकार होती है—अन्तमें फट्से युक्त छठे 'नमो हिरण्यबाहवे०' मन्त्र, सद्योजातमन्त्र तथा तृतीय अघोरमन्त्रसे पृथ्वीतत्त्वकी शुद्धि होती है, फडन्त षष्ठ मन्त्रसहित सद्योजात और तृतीय अघोरमन्त्रसे जलतत्त्वकी शुद्धि होती है, फडन्त अग्निसम्बन्धी तृतीय अघोरमन्त्रसे अग्नितत्त्वकी शुद्धि होती है, फडन्त षष्ठ मन्त्रसहित वायुसम्बन्धी चतुर्थ तत्पुरुषमन्त्रसे वायुतत्त्वकी शुद्धि होती है और फडन्त सद्योजातसहित षष्ठ तथा तृतीय अघोर-मन्त्रसे आकाशतत्त्वकी शुद्धि होती है ॥ ६—१०॥ |
| उपसंहृत्यैवं सद्यषष्ठेन तृतीयेन मूलेन फडन्तेन ताडनं<br>तृतीयेन सम्पुटीकृत्य ग्रहणं मूलमेव योनिबीजेन<br>सम्पुटीकृत्वा बन्धनं बन्धः ॥ ११ | इस प्रकार पूर्वोक्तका उपसंहार करके सद्योजातमन्त्रके साथ षष्ठ 'नमो हिरण्यबाहवे०' और तृतीय 'अघोरेभ्यो०' मन्त्रके साथ फडन्त मूलमन्त्र [पंचाक्षरी]-से ताड़न करे। तृतीय [अघोरेभ्यो०] मन्त्रसे सम्पुटित मूल [पंचाक्षरी] मन्त्रद्वारा ग्रहण करे। योनि [ह्रीं] बीजद्वारा सम्पुटितकर मूल [पंचाक्षरी]-से दिग्बन्ध करे ॥ ११ ॥ |
| एवं शान्तातीतादिनिवृत्तिपर्यन्तं पूर्ववत्कृत्वा प्रणवेन<br>तत्त्वत्रयकमनुध्याय आत्मानं दीपशिखाकारं<br>पुर्यष्टकसहितं त्रयातीतं शक्तिक्षोभेणामृतधारां<br>सुषुम्णायां ध्यात्वा ॥ १२ | इक्कीसवें अध्यायमें कहे गये शांतातीतादिसे निवृत्तिकलातक सब विधान पूर्ण करके प्रणवद्वारा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्ररूप दीपशिखाकार आत्माका ध्यान करके शुद्ध चैतन्यरूपको मूलाधारादि पुर्यष्टकके साथ त्रयातीत [विश्व तैजस, प्राज्ञादिसे परे] स्वयं का कुण्डलिनीप्रबोध होनेसे सुषुम्णामें अमृतधारारूपमें ध्यान करे। इसी प्रकार नाद, बिन्दु, अकार, उकार तथा मकारका जिनमें अन्त होता है और जो रुद्र, विष्णु तथा ब्रह्मासे भी अतीत हैं, उन कल्याणकारी सदाशिवका शान्त्यातीता आदिसे |
| शान्त्यतीतादिनिवृत्तिपर्यन्तानां चान्तर्नादबिन्द्वकारो-<br>कारमकारान्तं शिवं सदाशिवं रुद्रविष्णुब्रह्मान्तं<br>सृष्टिक्रमेणामृतीकरणं ब्रह्मन्यासं कृत्वा पञ्चवक्त्रेषु<br>पञ्चदशनयनं विन्यस्य मूलेन पादादिकेशान्तं<br>महामुद्रामपि बद्ध्वा शिवोऽहमिति ध्यात्वा<br>शक्त्यादीनि विन्यस्य हृदि शक्त्या बीजाङ्कुरा-<br>नन्तरात्तसुषिरसूत्रकण्टकपत्रकेसरधर्मज्ञानवैराग्यै-<br>श्वर्यसूर्यसोमाग्निवामा-ज्येष्ठा-रौद्रीकाली-कल- | निवृत्तिपर्यन्त [पाँच] कलाओंका ध्यान करके सृष्टिक्रमसे अमृतीकरण तथा ब्रह्मन्यासकर उनके पाँच मुखोंमें पन्द्रह नेत्रोंका न्यास करे और मूल मन्त्र (पंचाक्षरमन्त्र)-के द्वारा पादसे केशपर्यन्त न्यास करके महामुद्रा बाँधकर 'मैं शिव हूँ'—ऐसा ध्यान करे, पुनः शक्ति आदिका न्यास करके हृदयाकाशमें शक्तिके साथ बीज, अंकुर, व्यवधानरहित छिद्र, सूत्र, कण्टक, पत्र, केसर और कर्णिकायुक्त कमलका ध्यान करके उसमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, सूर्य, चन्द्र, अग्निका तथा उसके |
अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन ६७१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विकरणीबलविकरणीबलप्रमथनीसर्वभूतदमनीः<br>केसरेषु कर्णिकायां मनोन्मनीमपि ध्यात्वा॥ १३ | केसरोंमें वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथनी और सर्वभूतदमनीका तथा उसकी कर्णिकामें मनोन्मनी शक्तिका भी ध्यान करे॥ १२-१३॥ |
| आसनं परिकल्प्यैवं सर्वोपचारसहितं बहिर्योगोप-<br>चारेणान्तःकरणं कृत्वा नाभौ वह्निकुण्डे पूर्ववदासनं<br>परिकल्प्य सदाशिवं ध्यात्वा बिन्दुतोऽमृतधारां<br>शिवमण्डले निपतितां ध्यात्वा ललाटे महेश्वरं<br>दीपशिखाकारं ध्यात्वा आत्मशुद्धिरित्थं प्राणापानौ<br>संयम्य सुषुम्णया वायुं व्यवस्थाप्य षष्ठेन तालुमुद्रां<br>कृत्वा दिग्बन्धं कृत्वा षष्ठेन स्थानशुद्धिर्वस्त्रादि-<br>दिपूतान्तरर्घ्यपात्रादिषु प्रणवेन तत्त्वत्रयं विन्यस्य<br>तदुपरि बिन्दुं ध्यात्वा त्वम्भसा विपूर्य द्रव्याणि च<br>विधाय अमृतप्लावनं कृत्वा पाद्यपात्रादिषु<br>तेषामर्घ्यवदासनं परिकल्प्य संहितयाभिमन्त्र्या-<br>द्येनाभ्यर्च्य द्वितीयेनामृतीकृत्वा तृतीयेन विशोध्य<br>चतुर्थेनावगुण्ठ्य पञ्चमेनावलोक्य षष्ठेन रक्षां<br>विधाय चतुर्थेन कुशपुञ्जेनार्घ्याम्भसाभ्युक्ष्य<br>आत्मानमपि द्रव्याणि पुनरर्घ्याम्भसाभ्युक्ष्य सपुष्पेण<br>सर्वद्रव्याणि पृथक्पृथक् शोधयेत्॥ १४ | बहिर्योगके उपचारसे अन्तःकरण सामग्री करके पूर्वोक्त प्रकारसे समस्त उपचारसहित आसन कल्पितकर नाभिमें वह्निकुण्डके मध्य पूर्वकी भाँति आसन परिकल्पित करके उसके ऊपर सदाशिवका चिन्तनकर ललाटमें दीपशिखाके आकारवाले महेश्वरका ध्यान करके बिन्दुसे शिवमण्डलमें गिरती हुई अमृतधाराका ध्यान करे—इस रूपसे आत्मशुद्धि होती है। प्राण तथा अपानको संयमित करके सुषुम्णाद्वारा वायुको व्यवस्थितकर षष्ठ मन्त्रसे खेचरी मुद्रा बनाकर षष्ठ मन्त्रसे ही दिग्बन्ध करे—इस प्रकारसे शरीरशुद्धि होती है। तदनन्तर वस्त्र आदिके द्वारा सम्यक् पोंछकर पवित्र किये गये अर्घ्यपात्र आदिमें प्रणवके द्वारा तत्त्वत्रयका न्यास करके उनके ऊपर बिन्दुका ध्यानकर जलसे पूर्ण करके पूजाद्रव्योंको व्यवस्थितकर अमृतप्लावन करके पाद्यपात्रोंमें तत्त्व आदिके लिये अर्घ्यकी भाँति आसनकी कल्पना करे; तत्पश्चात् संहितामन्त्रसे अभिमन्त्रित करके प्रथम मन्त्रसे उनका अभ्यर्चन, द्वितीय मन्त्रसे अमृतीकरण, तृतीय मन्त्रसे विशोधन, चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन, पंचम मन्त्रसे अवलोकन और षष्ठ मन्त्रसे रक्षाविधान करे, इसके बाद चतुर्थ मन्त्रसे कुशकूर्चके द्वारा अपने ऊपर तथा द्रव्योंके ऊपर भी अर्घ्यजलसे अभ्युक्षण करके पुनः पुष्पयुक्त अर्घ्यजलसे सभी द्रव्योंका पृथक्-पृथक् शोधन करे॥ १४॥ |
| सद्येन गन्धं वामेन वस्त्रम्। अघोरेण आभरणं पुरुषेण<br>नैवेद्यम्। ईशानेन पुष्पाणि अथाभिमन्त्रयेत्॥ १५ | तत्पश्चात् सद्योजातमन्त्रसे गन्धको, वामदेवमन्त्रसे वस्त्रको, अघोरमन्त्रसे आभरणको, तत्पुरुषमन्त्रसे नैवेद्यको और ईशानमन्त्रसे पुष्पोंको अभिमन्त्रित करना चाहिये; |
| शिवगायत्र्या शेषं प्रोक्षयेत्॥ १६ | शिवगायत्रीसे शेष अन्य द्रव्योंका प्रोक्षण करना चाहिये। |
| पञ्चामृतपञ्चगव्यादीनि ब्रह्माङ्गमूलाद्यैरभिमन्त्रयेत्॥ १७ | पंचामृत, पंचगव्य आदि पदार्थोंके ब्रह्ममन्त्र, अंगमन्त्र, मूलमन्त्र (पंचाक्षर बीजमन्त्र) आदिसे अभिमन्त्रित करना चाहिये। पुनः पृथक्-पृथक् उन गन्ध आदि |
| पृथक्पृथङ्भूलेनार्घ्यं धूपं दत्त्वाचमनीयं च तेषामपि | पूजोपचारोंको मूलमन्त्रके द्वारा अर्घ्य, धूप, आचमनीय |
| ६७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग | | :--- | :--- |
| धेनुमुद्रां च दर्शयित्वा कवचेनावगुण्ठ्यास्त्रेण रक्षां च विधाय द्रव्यशुद्धिं कुर्यात् ॥ १८ | आदि अर्पण करके उन्हें धेनुमुद्रा दिखाकर कवचसे अवगुण्ठन और अस्त्र-मन्त्रसे रक्षाविधान करके द्रव्यशुद्धि करनी चाहिये ॥ १५-१८ ॥ | | अर्घ्योदकमग्रे हृदा गन्धमादायास्त्रेण विशोध्यं पूजाप्रभृतिकरणं रक्षान्तं कृत्वैवं द्रव्यशुद्धिं पूजासमर्पणान्तं मौनमास्थाय पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा सर्वमन्त्राणि प्रणवादिन्मोऽन्ताज्जपित्वा पुष्पाञ्जलिं त्यजेन्मन्त्रशुद्धिरित्थम् ॥ १९ | सर्वप्रथम हृदयमन्त्रके द्वारा अर्घ्योदकयुक्त गन्ध लेकर अस्त्रमन्त्रसे शोधन करके पूजनोपयोगी साधन सम्प्रोक्षणसे लेकर [भूतापसारण, दिग्बन्धनादि] रक्षाविधान करके ही द्रव्यशुद्धि करे; तब पूजासमर्पणके अन्ततक मौन धारण करके अन्तमें पुष्पांजलि ग्रहण करके आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नमःसे युक्त सभी पूजा-मन्त्रोंको जपकर पुष्पांजलि छोड़ देनी चाहिये—इस प्रकार मन्त्रशुद्धि होती है॥ १९॥ | | अग्रे सामान्यार्घ्यपात्रं पयसापूर्य गन्धपुष्पादिना संहितायामभिमन्त्र्य धेनुमुद्रां दत्त्वा कवचेनावगुण्ठ्यास्त्रेण रक्षयेत्। पूजां पर्युषितां गायत्र्या समभ्यर्च्य सामान्यार्घ्यं दत्त्वा गन्धपुष्पधूपाचमनीयं स्वधान्तं नमोऽन्तं वा दत्त्वा ब्रह्माभिः पृथक्पृथक्पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा फडन्तास्त्रेण निर्माल्यं व्यपोह्य ईशान्यां चण्डमभ्यर्च्य्यासनमूर्तिं चण्डं सामान्यास्त्रेण लिङ्गपीठं शिवं पाशुपतास्त्रेण विशोध्य मूर्ध्नि पुष्पं निधाय पूजयेल्लिङ्गशुद्धिः ॥ २० | अपने आगे सामान्य अर्घ्यपात्रको जलसे पूर्ण करके उसमें गन्ध-पुष्प आदि डालकर संहितामन्त्रसे उसे अभिमन्त्रित करे और धेनुमुद्रा दिखाकर कवचसे अवगुण्ठन करके अस्त्रमन्त्रसे रक्षा करे। पूर्व दिनके पूजित शिवलिङ्गकी गायत्रीसे अर्चना करके सामान्य अर्घ्य प्रदानकर स्वधा अथवा नमः अन्तमें लगाकर गन्ध, पुष्प, धूप, आचमनीय आदि उपचार अर्पित करके ब्रह्ममन्त्रोंसे पृथक्-पृथक् पुष्पांजलि प्रदान करे; इसके बाद फडन्त अस्त्रमन्त्रसे निर्माल्य उतारकर ईशान दिशामें चण्डका अभ्यर्चन करके आसनमूर्ति चण्डका सामान्य अस्त्रमन्त्रसे और लिङ्गपीठ (योनि) तथा शिवलिङ्गका पाशुपतास्त्रमन्त्रसे विशोधन करके लिङ्गके मस्तकपर पुष्प रखकर पूजन करे; इस प्रकार लिङ्गशुद्धि होती है॥ २०॥ | | आसनं कूर्मशिलायां बीजाङ्कुरं तदुपरि ब्रह्मशिलायामन्तन्नालसुषिरे सूत्रपत्रकण्टककर्णिकाकेसरधर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यसूर्यासोमाग्निकेसरशक्तिं मनोन्मनीं कर्णिकायां मनोन्मनेनानन्तासनायेति समासेनासनं परिकल्प्य तदुपरि निवृत्त्यादिकलामयं षड्विधसहितं कर्मकलाङ्गदेहं सदाशिवं भावयेत् ॥ २१ | तत्पश्चात् कूर्मपृष्ठके आसन और उसके ऊपर बीजांकुर, पुनः उसके ऊपर ब्रह्मशिलापर छिद्रयुक्त अनन्त नालके भीतर सूत्र, दल, कण्टक, कर्णिका, केसर, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वामा आदि [पूर्वकथित आठ] शक्तियाँ और कर्णिकामें मनोन्मनसहित मनोन्मनीका ध्यान करे। पुनः ‘अनन्तासनाय नमः’—इस मन्त्रसे संक्षेपमें आसन कल्पित करके उसके ऊपर निवृत्ति आदि कलायुक्त षट्कोशसहित वेदमूर्ति सदाशिवका चिन्तन करे॥ २१॥ | | उभाभ्यां सपुष्पाभ्यां हस्ताभ्यामङ्गुष्ठेन पुष्पमापीड्य | तदनन्तर दोनों हाथोंमें पुष्प ग्रहणकर अँगुष्ठसे |
अध्याय २४ ] न्यास एवं तत्त्वशुद्धिपूर्वक विविध उपचारोंसे भगवान् सदाशिवका पूजन ६७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आवाहनमुद्रया शनैः शनैः हृदयादिमस्तकान्तमारोप्य<br>हृदा सह मूलं प्लुतमुच्चार्य सद्येन बिन्दुस्था-<br>नादभ्यधिकं दीपशिखाकारं सर्वतोमुखहस्तं व्याप्य-<br>व्यापकमावाह्य स्थापयेत्॥ २२ | पुष्पको दबाकर आवाहनमुद्राके द्वारा धीरे-धीरे हृदयसे मस्तकपर्यन्य आरोपण करके हृदयमन्त्रसहित मूलमन्त्र (पंचाक्षरमन्त्र)-को उच्च स्वरमें उच्चारित करके बिन्दुस्थानसे भी अधिक दीपशिखाकार और सभी ओर मुख तथा हाथ करके व्याप्त उन व्यापक परमेश्वरको सद्योजातमन्त्रसे आवाहितकर स्थापित करना चाहिये॥ २२॥ |
| पूर्वहृदा शिवशक्तिसमवायेन परमीकरणममृतीकरणं<br>हृदयादिमूलेन सद्येनावाहनं हृदा मूलोपरि वामेन<br>स्थापनं हृदा मूलोपरि अघोरेण संनिरोधं हृदा मूलोपरि<br>पुरुषेण सान्निध्यं हृदा मूलेन ईशानेन पूजयेदिति<br>उपदेशः॥ २३<br><br>पञ्चमन्त्रसहितेन यथापूर्वमात्मनो देहनिर्माणं तथा<br>देवस्यापि वह्नेश्चैवमुपदेशः॥ २४ | पहले हृदयमन्त्रसे शिवशक्तिके तादात्म्यसे एकीकरण तथा अमृतीकरण करे; पुनः हृदयमन्त्रपूर्वक मूलमन्त्रसहित सद्योजातमन्त्रसे आवाहन करके हृदयमन्त्र तथा मूलमन्त्रयुक्त वामदेवमन्त्रसे स्थापन और इसी प्रकार हृदयमन्त्र एवं मूलमन्त्रसहित अघोर मन्त्रसे संनिरोधन करे; इसके बाद हृदयमन्त्र तथा मूलमन्त्रसहित तत्पुरुषमन्त्रसे सान्निध्य करे। तदनन्तर हृदयमन्त्र और मूलमन्त्रयुक्त ईशानमन्त्रसे पूजन करे—यह उपदेश है। पूर्वमें जिस प्रकार पाँच मन्त्रोंसे अपना देहनिर्माण किया, उसी प्रकार देवता तथा अग्निका भी देहनिर्माण करना चाहिये—ऐसा उपदेश है॥ २३-२४॥ |
| रूपकध्यानं कृत्वा मूलेन नमस्कारान्तमापाद्य<br>स्वधान्तमाचमनीयं सर्वं नमस्कारान्तं वा स्वाहाकारा-<br>न्तमर्घ्यं मूलेन पुष्पाञ्जलिं वौषडन्तेन सर्वं नमस्कारान्तं<br>हृदा वा ईशानेन वा रुद्रगायत्र्या ॐ नमः शिवायेति<br>मूलमन्त्रेण वा पूजयेत्॥ २५ | मूलमन्त्र (ॐ नमः शिवाय)-को नमस्कारान्त बोलकर सदाशिवके प्रतिबिम्बका ध्यान करके, आचमनीय देते समय मन्त्रको स्वधान्त अथवा सब कुछ नमस्कारान्त ही करे। अर्घ्यदानमें मूलमन्त्रको स्वाहान्त बोले, पुष्पांजलि वौषट्युक्त मूलमन्त्रसे अथवा सर्वत्र नमस्कारान्त हृदयमन्त्रसे, ईशानमन्त्रसे, रुद्रगायत्रीसे अथवा ‘ॐ नमः शिवाय’—इस मूलमन्त्रसे पूजा करे। तत्पश्चात् पुष्पांजलि देकर धूप तथा आचमनीय अर्पण करे। इसके बाद षष्ठ मन्त्रसे |
| पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा पुनर्धूपाचमनीयं षष्ठेन पुष्पावसरणं<br>विसर्जनं मन्त्रोदकेन मूलेन संस्नाप्य सर्वद्रव्या-<br>भिषेकमिशानेन प्रतिद्रव्यमष्टपुष्पं दत्त्वैवमर्घ्यं च<br>गन्धपुष्पधूपाचमनीयं फडन्तास्त्रेण पूजापसरणं<br>शुद्धोदकेन मूलेन संस्नाप्य पिष्टामलकादिभिः॥ २६ | पुष्पोंको उतारकर पूजाका विसर्जन करके मूलमन्त्रद्वारा शुद्ध जल, पंचामृत आदि द्रव्योंसे स्नान कराये। प्रत्येक द्रव्यके स्नानमें ईशानमन्त्रसे आठ-आठ पुष्पांजलि देकर अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, आचमनीय आदि अर्पण करे; पुनः फडन्त अस्त्रमन्त्रसे पूजाद्रव्योंको [शिवलिङ्गसे] हटाकर पिसे हुए आमलक आदिसे युक्त शुद्ध जलसे मूलमन्त्रके द्वारा स्नान कराकर |
| उष्णोदकेन हरिद्राद्येन लिङ्गमूर्तिं पीठसहितां विशोध्य<br>गन्धोदकहिरण्योदकमन्त्रोदकेन रुद्राध्यायं पठमानः<br>नीलरुद्रत्वरितरुद्रपञ्चब्रह्मादिभिः नमः शिवायेति<br>स्नापयेत्॥ २७ | हरिद्रा आदिके चूर्णसे युक्त उष्ण जलसे पीठसहित शिवलिङ्गका शोधनकर गन्ध-हिरण्यसमन्वित अभिमन्त्रित जलके द्वारा रुद्राध्यायका पाठ करते हुए एवं नीलरुद्र, त्वरितरुद्र, पंचब्रह्म तथा नमः शिवाय—इन मन्त्रोंसे |
| ६७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| मूर्ध्नि पुष्पं निधायैवं न शून्यं लिङ्गमस्तकं कुर्यादत्र श्लोकः॥ २८<br><br>यस्य राष्ट्रे तु लिङ्गस्य मस्तकं शून्यलक्षणम्।<br>तस्यालक्ष्मीर्महारोगो दुर्भिक्षं वाहनक्षयः॥ २९<br><br>तस्मात्परिहरेद्राजा धर्मकामार्थमुक्तये।<br>शून्ये लिङ्गे स्वयं राजा राष्ट्रं चैव प्रणश्यति॥ ३० | स्नान कराना चाहिये॥ २५-२७॥<br><br>शिवलिङ्गके मस्तकपर पुष्प रखकर ही अभिषेक करना चाहिये; लिङ्गमस्तकको शून्य नहीं रखना चाहिये। इस सम्बन्धमें यह श्लोक है—जिस राजाके राष्ट्रमें लिङ्गका मस्तक बिल्वपत्र या पुष्पसे शून्य रहता है, उसके यहाँ लक्ष्मीशून्यता, महारोग, दुर्भिक्ष तथा वाहनोंका क्षय होता है। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चतुर्विधपुरुषार्थकी प्राप्तिके लिये राजाको चाहिये कि शिवलिङ्गके मस्तकको शून्य न रखे; लिङ्गके शून्य रहनेपर स्वयं राजा तथा राष्ट्र—दोनों ही नष्ट हो जाते हैं॥ २८-३०॥ | | एवं सुस्नाप्यार्घ्यं च दत्त्वा सम्मृज्य वस्त्रेण गन्धपुष्पवस्त्रालङ्कारादींश्च मूलेन दद्यात्॥ ३१<br><br>धूपाचमनीयदीपनैवेद्यादींश्च मूलेन प्रधानेनोपरि पूजनं पवित्रीकरणमित्युक्तम्॥ ३२ | इस प्रकार सम्यक् स्नान कराकर अर्घ्य अर्पण करके वस्त्रसे [शिवलिङ्गको] भलीभाँति पोंछकर मूलमन्त्रके द्वारा गन्ध, पुष्प, वस्त्र, अलंकार, धूप, आचमनीय, दीप, नैवेद्य आदि प्रदान करना चाहिये। शिवलिङ्गके मस्तकपर केवल प्रणवके द्वारा पूजनको पवित्रीकरण कहा गया है। | | आरार्तिदीपादींश्चैव धेनुमुद्रामुद्रितानि कवचेनावगुण्ठितानि षष्ठेन रक्षितानि लिङ्गोपरि लिङ्गे च लिङ्गस्याधः साधारणं च दर्शयेत्॥ ३३ | आरती तथा दीप, धेनुमुद्रा बनाकर कवचसे अवगुण्ठनकर तथा षष्ठ मन्त्रसे रक्षण करके लिङ्गके मस्तकपर, लिङ्गके मध्य भागमें तथा लिङ्गके अधोभागमें प्रदर्शित करना चाहिये। | | मूलेन नमस्कारं विज्ञाप्यावाहनस्थापनसन्निरोधसान्निध्यपाद्याचमनीयार्घ्यगन्धपुष्पधूपनैवेद्याचमनीयहस्तोद्वर्तनमुखवासाद्युपचारयुक्तं ब्रह्माङ्गभोगमार्गेण पूजयेत्॥ ३४ | मूल मन्त्रसे नमस्कार करके आवाहन, स्थापन, संनिरोधन, सान्निध्य, पाद्य, आचमनीय, अर्घ्य, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमनीय, हस्तोद्वर्तन, मुखवास आदि उपचार निवेदित करके ब्रह्ममन्त्रस्वरूप पाद आदि अंगोंकी उपचारक्रमसे पूजा करनी चाहिये॥ ३१-३४॥ | | सकलध्यानं निष्कलस्मरणं परावरध्यानं मूलमन्त्रजपः। दशांशं ब्रह्माङ्गजपसमर्पणमात्मनिवेदनस्तुतिनमस्कारादयश्च गुरुपूजा च पूर्वतो दक्षिणे विनायकस्य॥ ३५ | पूजाके अनन्तर सकल (सगुण) ध्यान, निष्कल (निर्गुण) ध्यान, परावर ध्यान, मूलमन्त्रजप, ब्रह्ममन्त्र तथा अंगमन्त्रका दशांशजप, समर्पण, आत्मनिवेदन, स्तुति, नमस्कार आदि करके पूर्वभागमें गुरुपूजा तथा दक्षिण भागमें विनायक गणपतिकी पूजा करनी चाहिये। | | आदौ चान्ते च सम्पूज्यो विघ्नेशो जगदीश्वरः।<br>दैवतैश्च द्विजैश्चैव सर्वकर्मार्थसिद्धये॥ ३६ | देवताओं तथा ब्राह्मणोंको समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये आदिमें तथा अन्तमें जगत्के स्वामी विघ्नेश्वर श्रीगणेशकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करनी चाहिये॥ ३५-३६॥ | | यः शिवं पूजयेद्देवं लिङ्गे वा स्थण्डिलेऽपि वा।<br>स याति शिवसायुज्यं वर्षमात्रेण कर्मणा॥ ३७ | जो लिङ्गमें अथवा स्थण्डिलमें शिवकी पूजा करता है, वह केवल एक ही वर्षमें अपने इस कर्मके |
२५- शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण, अरणि-मन्थन, पात्रासादन, आज्यसंस्कार, अग्निसंस्कार तथा हवन-विधानका वर्णन
अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण... हवन-विधानका वर्णन [ ६७५
| लिङ्गार्चकश्च षण्मासान्नात्र कार्या विचारणा।<br>सप्त प्रदक्षिणाः कृत्वा दण्डवत्प्रणमेद्बुधः॥ ३८ | प्रभावसे शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है। केवल शिवलिङ्गकी पूजा करनेवाला छः मासमें ही शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। बुद्धिमान् भक्तको चाहिये कि [पूजाके अनन्तर] सात प्रदक्षिणा करके दण्डवत् प्रणाम करे॥ ३७-३८॥ |
| प्रदक्षिणक्रमपादेन अश्वमेधफलं शतम्।<br>तस्मात्सम्पूजयेन्नित्यं सर्वकर्मार्थसिद्धये॥ ३९ | प्रदक्षिणामें एक-एक पगके द्वारा सौ-सौ अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। अतः समस्त मनोरथोंकी सिद्धिके लिये सम्यक् प्रकारसे [भगवान् शिवकी] नित्य पूजा करनी चाहिये। [इस पूजनसे] |
| भोगार्थी भोगमाप्नोति राज्यार्थी राज्यमाप्नुयात्।<br>पुत्रार्थी तनयं श्रेष्ठं रोगी रोगात्प्रमुच्यते॥ ४० | भोगकी अभिलाषा रखनेवाला भोग-सुख प्राप्त करता है, राज्यकी कामना करनेवाला राज्य प्राप्त करता है, पुत्रकी इच्छा रखनेवाला उत्तम पुत्र प्राप्त करता है और रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है। मनुष्य जिन-जिन मनोरथोंको सोचता है, |
| यान् यांश्चिन्तयते कामांस्तांस्तान् प्राप्नोति मानवः॥ ४१ | उन्हें प्राप्त कर लेता है॥ ३९-४१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लिङ्गार्चनविधानं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लिङ्गार्चनविधान' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २४॥
पचीसवाँ अध्याय
शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण, अरणिमन्थन, पात्रासादन, आज्यसंस्कार, अग्निसंस्कार तथा हवन-विधानका वर्णन
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
|---|---|
| शिवाग्निकार्यं वक्ष्यामि शिवेन परिभाषितम्।<br>जनयित्वाग्रतः प्राचीं शुभे देशे सुसंस्कृते॥ १ | [हे सनत्कुमार!] अब मैं शैव-अग्निकार्यका वर्णन करूँगा, जिसे [स्वयं] शिवजीने कहा है। सर्वप्रथम [दिक्साधनके विधानसे] पूर्व दिशाका निर्धारण करके शुभ तथा परिष्कृत भूमिपर |
| पूर्वाग्रमुत्तराग्रं च कुर्यात्सूत्रत्रयं शुभम्।<br>चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे कुर्यात्कुण्डानि यत्नतः॥ २ | पवित्र तीन सूत पूर्वाग्र तथा तीन सूत उत्तराग्र रखकर चतुष्कोणीय निर्मित की गयी भूमिमें यत्नपूर्वक कुण्ड बनाना चाहिये॥ १-२॥ |
| नित्यहोमाग्निकुण्डं च त्रिमेखलसमायुतम्।<br>चतुस्त्रिद्व्यङ्गुलायामा मेखला हस्तमात्रतः॥ ३ | नित्यहोमके लिये तीन मेखलाओंसे युक्त अग्निकुण्ड होना चाहिये। तीनों मेखलाएँ एक हाथ प्रमाणकी तथा चार अँगुल, तीन अँगुल और दो अँगुल ऊँचाईकी बनानी चाहिये। कुण्ड एक हाथ प्रमाणका होना चाहिये तथा |
| हस्तमात्रं भवेत्कुण्डं योनिः प्रादेशमात्रतः।<br>अश्वत्थपत्रवद्योनिं मेखलोपरि कल्पयेत्॥ ४ | योनि प्रादेशमात्र (अँगूठे तथा तर्जनी अँगुलीके बीचकी दूरी) होनी चाहिये। मेखलाके ऊपर अश्वत्थ (पीपल)-के पत्तेके आकारकी योनि बनानी चाहिये॥ ३-४॥ |
| ६७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुण्डमध्ये तु नाभिः स्यादष्टपत्रं सकर्णिकम्।<br>प्रादेशमात्रं विधिना कारयेद्ब्रह्मणः सुत॥ ५<br><br>षष्ठेनोल्लेखनं प्रोक्तं प्रोक्षणं वर्मणा स्मृतम्।<br>नेत्रेणालोक्य वै कुण्डं षड्रेखाः कारयेद्बुधः॥ ६<br><br>प्रागायतेन विप्रेन्द्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>उत्तराग्राः शिवा रेखाः प्रोक्षयेद्वर्मणा पुनः॥ ७ | हे ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार! कुण्डके मध्यमें नाभि होनी चाहिये; उसे विधिपूर्वक अष्टदलीय, कर्णिकायुक्त और प्रादेशमात्र प्रमाणकी निर्मित करानी चाहिये। अस्त्रमन्त्रसे उल्लेखन करना कहा गया है तथा कवचमन्त्रसे प्रोक्षण करना बताया गया है; बुद्धिमान्को चाहिये कि कुण्डको नेत्रमन्त्रसे देखकर छः रेखाएँ बनाये। हे विप्रेन्द्र! पूर्वाग्र तीन रेखाएँ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरस्वरूप हैं और उत्तराग्र रेखाएँ शिवस्वरूप हैं। इसके बाद कवचमन्त्रसे पुनः प्रोक्षण करना चाहिये॥ ५-७॥ |
| शमीपिप्पलसम्भूतामरणीं षोडशाङ्गुलाम्।<br>मथित्वा वह्निबीजेन शक्तिन्यासं हृदैव तु॥ ८<br><br>प्रक्षिपेद्विधिना वह्निमन्वाधाय यथाविधि।<br>तूष्णीं प्रादेशमात्रैस्तु याज्ञिकैः शकलैः शुभैः॥ ९<br><br>परिसम्मोहनं कुर्याज्जलेनाष्टसु दिक्षु वै।<br>परिस्तीर्य विधानेन प्रागाद्येवमनुक्रमात्॥ १०<br><br>उत्तराग्रं पुरस्ताद्धि प्रागग्रं दक्षिणे पुनः।<br>पश्चिमे चोत्तराग्रं तु सौम्ये पूर्वाग्रमेव तु॥ ११ | शमीगर्भस्थ पीपलके काष्ठकी बनी हुई सोलह अँगुल प्रमाणकी अरणीद्वारा वह्निबीज (रं)-से मन्थन करके और हृदयमन्त्रसे शक्तिन्यास करके अग्नि उत्पन्न करनी चाहिये। इसके बाद मौन होकर विधिपूर्वक उसे अग्निकुण्डमें रख देना चाहिये। विधानके अनुसार अग्न्याधान करके शान्तिपूर्वक प्रादेशप्रमाणके यज्ञसम्बन्धी शुभ काष्ठकी समिधाओंको उसपर प्राक् आदिके क्रमसे विधिपूर्वक व्यवस्थित करके जलके द्वारा आठों दिशाओंमें परिसम्मोहन करना चाहिये। पूरबमें उत्तराग्र, दक्षिणमें पूर्वाग्र, पश्चिममें उत्तराग्र और उत्तरमें पूर्वाग्र कुश बिछाना चाहिये॥ ८-११॥ |
| ऐन्द्रे चैन्द्राग्नमावाह्य याम्य एवं विधीयते।<br>सौम्यस्योपरि चान्द्राग्नं वारुणाग्नमधस्ततः॥ १२<br><br>द्वन्द्वरूपेण पात्राणि बर्हिष्वासाद्य सुव्रत।<br>अधोमुखानि सर्वाणि द्रव्याणि च तथोत्तरे॥ १३<br><br>तस्योपरि न्यसेद्दर्भाञ्छिवं दक्षिणतो न्यसेत्।<br>पूजयेन्मूलमन्त्रेण पश्चाद्धोमं समाचरेत्॥ १४ | पूर्व दिग्भागमें इन्द्राग्निदैवतका आवाहन करके दक्षिण दिग्भागमें यामाग्नि, उत्तर दिग्भागमें चन्द्राग्नि और इसके बाद पश्चिम दिग्भागमें वारुणाग्निका आवाहन किया जाता है। हे सुव्रत! पात्रोंको द्वन्द्वरूपमें अधोमुख करके कुशाओंपर रखकर तथा सभी द्रव्योंको उत्तर भागमें रखकर उसके ऊपर कुशोंको रख देना चाहिये। दक्षिण भागमें शिवको स्थापित करना चाहिये; इसके बाद मूलमन्त्रसे पूजन करना चाहिये, तत्पश्चात् विधिपूर्वक हवन करना चाहिये॥ १२-१४॥ |
| प्रोक्षणीपात्रमादाय पूरयेदम्बुना पुनः।<br>प्रादेशमात्रौ तु कुशौ स्थापयेदुदकोपरि॥ १५<br><br>प्लावयेच्च कुशाग्रं तु वसोः सूर्यस्य रश्मिभिः।<br>विकीर्य सर्वपात्राणि सुसम्प्रोक्ष्य विधानतः॥ १६<br><br>प्रणीतापात्रमादाय पूरयेदम्बुना पुनः।<br>अन्योदककुशाग्रैस्तु सम्यगाच्छाद्य सुव्रत॥ १७ | तदनन्तर प्रोक्षणीपात्र लेकर उसे जलसे भर देना चाहिये और फिर प्रादेशप्रमाणके दो कुशोंको जलके ऊपर स्थापित कर देना चाहिये। अग्नि तथा सूर्यकी किरणोंसे कुशाग्रको प्लावित करना चाहिये। तदनन्तर सभी पात्रोंको फैलाकर विधिपूर्वक प्रोक्षण करके प्रणीतापात्रको लेकर उसे पुनः जलसे पूर्ण करना |
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अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण···हवन-विधानका वर्णन [ ६७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हस्ताभ्यां नासिकं पात्रमैशान्यां दिशि विन्यसेत्।<br>आज्याधिश्रयणं कुर्यात्पश्चिमोत्तरतः शुभम् ॥ १८<br><br>भस्ममिश्रांस्तथाङ्गारान् ग्राहयेत्सकलेन वै।<br>पश्चिमोत्तरतो नीत्वा तत्र चाज्यं प्रतापयेत् ॥ १९<br><br>कुशानग्नौ तु प्रज्वाल्य पर्यग्निं त्रिभिराचरेत्।<br>तान् सर्वांस्तत्र निःक्षिप्य चाग्रे चाज्यं निधापयेत् ॥ २०<br><br>अङ्गुष्ठमात्रौ तु कुशौ प्रक्षाल्य विधिनैव तु।<br>पर्यग्निं च ततः कुर्यात्तैरेव नवभिः पुनः ॥ २१<br><br>पर्यग्निं च पुनः कुर्यात्तदाज्यमवरोपयेत्।<br>अथापकर्षयेत्पात्रं क्रमेणोत्तरपश्चिमे ॥ २२ | चाहिये। हे सुव्रत! इसके बाद जलमें रखी अन्य कुशाओंके द्वारा उसे भलीभाँति आच्छादित करके दोनों हाथोंसे नासिकापर्यन्त उस पात्रको उठाकर ईशान दिशामें स्थापित कर देना चाहिये॥ १५-१७॥<br><br>तत्पश्चात् वायव्य कोणमें शुभ आज्याश्रयण (घृतस्थापन) करना चाहिये। भस्मयुक्त अंगारोंको लेना चाहिये और उसे वायव्य दिशामें रखकर उसके ऊपर घृतको तपाना चाहिये। तदनन्तर कुशोंको अग्निमें प्रज्वलित करके तीन कुशोंसे पर्यग्निकरण करना चाहिये। फिर उन सभी कुशोंको उस कुण्डमें डालकर घृतको अपने सम्मुख रख लेना चाहिये। इसके बाद अँगुष्ठप्रमाणके दो कुशोंको विधिवत् प्रक्षालित करके उन कुशोंसे तथा अन्य नौ कुशोंसे पर्यग्नि करनी चाहिये, इसके बाद फिर पर्यग्नि करनी चाहिये। तदनन्तर घृतको अग्निपरसे उतार लेना चाहिये और घृतपात्रको क्रमसे उत्तर-पश्चिम दिशामें रख देना चाहिये॥ १८-२२॥ |
| संयुज्य चाग्निं काष्ठेन प्रक्षाल्यारोप्य पश्चिमे।<br>आज्यस्योत्पवनं कुर्यात्पवित्राभ्यां सहैव तु ॥ २३<br><br>पृथगादाय हस्ताभ्यां प्रवाहेण यथाक्रमम्।<br>अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां तु उभाभ्यां मूलविद्यया ॥ २४<br><br>अभ्युक्ष्य दापयेदग्नौ पवित्रे घृतपङ्किते। | तदनन्तर उपवेषणकाष्ठद्वारा अग्निका संयोजन करके पश्चिम दिशामें रखकर उसे प्रक्षालित करके दोनों हाथोंकी अँगुष्ठ और अनामिका अँगुलियोंद्वारा याज्ञिकोक्त पद्धतिके अनुसार दो पवित्रियोंको ग्रहण करके मूलमन्त्रके द्वारा आज्योत्पवन करना चाहिये। उसके बाद घृतसे भीगी हुई दोनों पवित्रियोंका अभ्युक्षण करके उन्हें अग्निमें डाल देना चाहिये॥ २३-२४ १/२॥ |
| सौवर्णं स्रुक्स्रुवं कुर्याद्रत्निमात्रेण सुव्रत ॥ २५<br><br>राजतं वा यथान्यायं सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>अथवा याज्ञिकैर्वृक्षैः कर्तव्यौ स्रुक्स्रुवावुभौ ॥ २६ | हे सुव्रत! सोने अथवा चाँदीका स्रुक्-स्रुव बनाना चाहिये, जो एक हाथ लम्बा हो तथा सभी लक्षणोंसे सम्पन्न हो अथवा यज्ञीय वृक्षोंसे ही स्रुक्-स्रुवाका निर्माण करना चाहिये॥ २५-२६॥ |
| अरत्निमात्रमायामं तत्पोत्रे तु बिलं भवेत्।<br>षडङ्गुलपरीणाहं दण्डमूलं महामुने ॥ २७<br><br>तदर्धं कण्ठनालं स्यात्पुष्करं मूलवद्भवेत्।<br>गोबालसदृशं दण्डं स्रुवाग्रं नासिकासमम् ॥ २८<br><br>पुटद्वयसमायुक्तं मुक्ताद्येन प्रपूरितम्। | स्रुव एक हाथ प्रमाणका और उसके मुखपर गहरा गर्त होना चाहिये। हे महामुने! उस स्रुवका दण्डमूल छः अँगल चौड़ा और कण्ठनाल तीन अँगल चौड़ा होना चाहिये। उसका मुख भी मूलकी भाँति बनाना चाहिये। स्रुवका दण्ड गायकी पूँछके सदृश ऊपर मोटा और क्रमशः नीचेकी ओर पतला होना चाहिये; उसका अग्रभाग नासिकाके समान दो पुटोंसे युक्त तथा मुक्ता आदिसे समन्वित होना चाहिये॥ २७-२८ १/२॥ |
| षट्त्रिंशदङ्गुलायाममष्टाङ्गुलसविस्तरम् ॥ २९ |
| ६७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उस्सेधस्तु तदर्थं स्यात्सूत्रेण समितं ततः।<br>सप्ताङ्गुलं भवेदास्यं विस्तरायामतः पुनः॥ ३०<br>त्रिभागैकं भवेदग्रं कृत्वा शेषं परित्यजेत्।<br>कण्ठं च द्व्यङ्गुलायामं विस्तारं चतुरङ्गुलम्॥ ३१ | पूर्णाहुतिमें प्रयुक्त होनेवाला स्रुव छत्तीस अँगल लम्बा, आठ अँगल चौड़ा और चार अँगल मोटा बनाना चाहिये। सूतके द्वारा उसे सम कर लेना चाहिये। उस स्रुवका मुख सात अँगल चौड़ा होना चाहिये और बारह अँगल लम्बा होना चाहिये। स्रुव का कण्ठ दो अँगल लम्बा और चार अँगल चौड़ा होना चाहिये॥ २९–३१॥ |
| वेदिरष्टाङ्गुलायामा विस्तारस्तत्प्रमाणतः।<br>तस्य मध्ये बिलं कुर्याच्चतुरङ्गुलमानतः॥ ३२<br>बिलं सुवर्तितं कुर्यादष्टपत्रं सुकर्णिकम्।<br>परितो बिलबाह्ये तु पट्टिकार्थाङ्गुलेन तु॥ ३३<br>तद्बाह्ये च विनिद्रं तु पद्मपत्रविचित्रितम्।<br>यवद्वयप्रमाणेने तद्बाह्ये पट्टिका भवेत्॥ ३४ | वेदी आठ अँगल लम्बी तथा उतने ही प्रमाणकी अर्थात् आठ अँगल चौड़ी होनी चाहिये। उसके मध्यमें चार अँगल प्रमाणका गर्त बनाना चाहिये। गर्त पूर्णरूपसे गोल, अष्टदलयुक्त और सुन्दर कर्णिकामय निर्मित करना चाहिये। उस गर्तके बाहर चारों ओर आधे अँगलप्रमाणकी पट्टिका, पट्टिकाके बाहर विकसित सुन्दर कमल और पुनः उसके बाहर दो यव-प्रमाणकी पट्टिकाकी रचना करनी चाहिये॥ ३२–३४॥ |
| वेदिकामध्यतो रन्ध्रं कनिष्ठाङ्गुलमानतः।<br>खातं यावन्मुखान्तः स्याद् बिलमानं तु निम्नगम्॥ ३५<br>दण्डं षडङ्गुलं नालं दण्डाग्रे दण्डिकात्रयम्।<br>अर्धाङ्गुलविवृद्ध्या तु कर्तव्यं चतुरङ्गुलम्॥ ३६<br>त्रयोदशाङ्गुलायामं दण्डमूले घटं भवेत्।<br>द्व्यङ्गुलस्तु भवेत्कुम्भो नाभिं विद्याद्दशाङ्गुलम्॥ ३७<br>वेदिमध्ये तथा कृत्वा पादं कुर्याच्च द्व्यङ्गुलम्।<br>पद्मपृष्ठसमाकारं पादं वै कर्णिकाकृतिम्॥ ३८<br>गजौष्ठसदृशाकारं तस्य पृष्ठाकृतिर्भवेत्।<br>अभिचारादिकार्येषु कुर्यात्कृष्णायसेन तु॥ ३९<br>पञ्चविंशत्कुशेनैव स्रुक्स्रुवौ मार्जयेत्पुनः।<br>अग्रमग्रेण संशोध्य मध्यं मध्येन सुव्रत॥ ४०<br>मूलं मूलेन विधिना अग्नौ ताप्य हृदा पुनः। | वेदीके मध्यमें कनिष्ठा अँगुलीके प्रमाणसे मुखपर्यन्त गम्भीर प्रवाहवाला छिद्र होना चाहिये। दण्डका मूल छः अँगल-प्रमाणका होना चाहिये, दण्डके अग्रभागमें चार अँगलके बीच आधे अँगलकी वृद्धिसे तीन दण्डिकाएँ बनानी चाहिये। दण्डके अग्रभागमें तेरह अँगलके विस्तारमें घट (शिर) होना चाहिये, उसका कण्ठ दो अँगल और नाभि अर्थात् मध्य भाग दस अँगल होना चाहिये। वेदीके मध्यमें वैसे ही दस अँगलकी पद्मपृष्ठके आकारकी नाभि बनाकर दो अँगल-प्रमाणका कर्णिकाके आकृतिसदृश पाद बनाना चाहिये। उस स्रुवके पृष्ठकी आकृति हाथीके ओष्ठके आकारसदृश होनी चाहिये। अभिचार आदि कर्मोंमें कृष्ण लौहसे स्रुक्-स्रुवका निर्माण करना चाहिये। तदनन्तर पचीस कुशोंके द्वारा स्रुक्-स्रुवका मार्जन करना चाहिये। हे सुव्रत! [स्रुक्-स्रुवके] अग्रभागको कुशके अग्रभागसे, मध्यभागको मध्य भागसे और मूलको मूलसे शोधित करके पुनः भलीभाँति हृदयमन्त्रका उच्चारण करके अग्निमें उन्हें तपाना चाहिये॥ ३५–४० १/२॥ |
| आज्यस्थाली प्रणीता च प्रोक्षणी तिस्त्र एव च॥ ४१<br>सौवर्णी राजती वापि ताम्री वा मृन्मयी तु वा।<br>अन्यथा नैव कर्तव्यं शान्तिके पौष्टिके शुभे॥ ४२ | आज्यस्थाली, प्रणीता और प्रोक्षणी—ये तीनों ही पात्र सोने, चाँदी, ताम्र अथवा मिट्टीके होने चाहिये। शान्तिक तथा पौष्टिक शुभ कर्ममें अन्य धातुके पात्रोंका |
अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण...हवन-विधानका वर्णन [ ६७९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| आयसी त्वभिचारे तु शान्तिके मृन्मयी तु वा।<br>षडङ्गुलं सुविस्तीर्णं पात्राणां मुखमुच्यते॥ ४३<br><br>प्रोक्षणी द्व्यङ्गुलोत्सेधा प्रणीता द्व्यङ्गुलाधिका।<br>आज्यस्थाली ततस्तस्या उत्सेधो द्व्यङ्गुलाधिकः॥ ४४ | प्रयोग नहीं करना चाहिये। अभिचार (जारण, मारण आदि)-कर्ममें लौहकी और शान्तिकर्ममें मृत्तिकाकी आज्यस्थाली, प्रणीता और प्रोक्षणीपात्र प्रयुक्त करना चाहिये; इन पात्रोंका मुख छः अँगल चौड़ा होना चाहिये—ऐसा कहा जाता है। प्रोक्षणी दो अँगल ऊँची, प्रणीता चार अँगल ऊँची और आज्यस्थाली उससे भी दो अँगल अधिक अर्थात् छः अँगल ऊँची होनी चाहिये॥ ४१-४४॥ |
| यैः समिद्भिर्हुतं प्रोक्तं तैरेव परिधिर्भवेत्।<br>मध्याङ्गुलपरीणाहा अवक्रा निर्व्रणाः समाः॥ ४५<br><br>द्वात्रिंशदङ्गुलायामास्तिस्रः परिधयः स्मृताः।<br>द्वात्रिंशदङ्गुलायामैस्त्रिंशद्दर्भैः परिस्तरेत्॥ ४६<br><br>चतुरङ्गुलमध्ये तु ग्रथितं तु प्रदक्षिणम्।<br>अभिचारादिकार्येषु शिवाग्न्याधानवर्जितम्॥ ४७<br><br>अकोमलाः स्थिरा विप्र सङ्ग्राह्यास्त्वाभिचारिके।<br>समग्राः सुसमाः स्थूलाः कनिष्ठाङ्गुलसम्मिताः॥ ४८<br><br>अवक्रा निर्व्रणाः स्निग्धा द्वादशाङ्गुलसम्मिताः।<br>समिधस्थं प्रमाणं हि सर्वकार्येषु सुव्रत॥ ४९ | जिन समिधाओंसे हवन बताया गया है, उन्हींसे परिधि बनानी चाहिये। मध्य अँगुलीतुल्य चौड़ी, सीधी व्रणरहित, सम तथा बत्तीस अँगल लम्बी तीन परिधियाँ कही गयी हैं। चार अँगलके बीच प्रदक्षिणक्रमसे ग्रथितरूपसे बत्तीस-बत्तीस अँगल लम्बे तीस कुशोंसे परिस्तरण करना चाहिये। अभिचार आदि कार्योंमें शिवाग्न्याधानसे वर्जित कर्म करना चाहिये। हे विप्र! अभिचारकर्ममें कठोर और दृढ़ समिधाएँ लेनी चाहिये, किंतु शुभ कर्ममें पूर्णरूपसे सम, कनिष्ठा अँगुलीके सदृश मोटी, सीधी, व्रणरहित, कोमल तथा बारह अँगल लम्बी समिधाएँ ग्रहण करनी चाहिये। हे सुव्रत! सभी कार्योंमें समिधाका यही प्रमाण सुनिश्चित किया गया है॥ ४५-४९॥ |
| गव्यं घृतं ततः श्रेष्ठं कापिलं तु ततोऽधिकम्।<br>आहुतीनां प्रमाणं तु स्रुवं पूर्णं यथा भवेत्॥ ५०<br><br>अन्नमक्षप्रमाणं स्याच्छुक्तिमात्रेण वै तिलः।<br>यवानां च तदधं स्यात्फलानां स्वप्रमाणतः॥ ५१<br><br>क्षीरस्य मधुनो दध्नः प्रमाणं घृतवद्भवेत्।<br>चतुःस्रुवप्रमाणेन स्रुचा पूर्णाहुतिर्भवेत्॥ ५२<br><br>तदधं स्विष्टकृत्प्रोक्तं शेषं सर्वमथापि वा।<br>शान्तिकं पौष्टिकं चैव शिवाग्नौ जुहुयात्सदा॥ ५३ | हवनके लिये गोघृत श्रेष्ठ होता है, किंतु कपिला गोका घृत उससे भी श्रेष्ठ माना गया है। आहुतिका प्रमाण उतना ही है, जितनेमें स्रुव पूर्णरूपसे भरा हुआ हो। अन्न (चरु)-का प्रमाण एक अक्ष (कर्ष) तथा तिलका प्रमाण एक शुक्ति (सीप) होना चाहिये। जौका प्रमाण उसका आधा अर्थात् आधी शुक्ति और फलोंका प्रमाण अपने इच्छानुसार होना चाहिये। दुग्ध, मधु और दहीका प्रमाण घृतके बराबर होना चाहिये। चार स्रुवसे स्रुक्को भरकर आहुति देनेसे पूर्णाहुति होती है। उसके आधे अर्थात् दो स्रुव-परिमाणके द्वारा अथवा अवशिष्ट भागद्वारा हवनको स्विष्टकृत् कहा गया है॥ ५०-५२ १/२॥ |
| लौकिकाग्नौ महाभाग मोहनोच्चाटनादयः।<br>शिवाग्निं जनयित्वा तु सर्वकर्मणि सुव्रत॥ ५४ | शान्तिक और पौष्टिक कर्मोंमें सदा शिवाग्निमें ही हवन करना चाहिये, किंतु हे महाभाग! मोहन, उच्चाटन आदि [अभिचार-कर्म]-से सम्बन्धित हवन लौकिकाग्निमें |
६८० श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
| सप्त जिह्वाः प्रकल्प्यैव सर्वकार्याणि कारयेत्।<br>अथवा सर्वकार्याणि जिह्वामात्रेण सिध्यति॥ ५५<br><br>शिवाग्निरिति विप्रेन्द्रा जिह्वामात्रेण साधकः॥ ५६<br><br>ॐ बहुरूपायै मध्यजिह्वायै अनेकवर्णायै दक्षिणोत्तरमध्यगायै शान्तिकपौष्टिकमोक्षादिफलप्रदायै स्वाहा॥ ५७<br><br>ॐ हिरण्यायै चामीकराभायै ईशानजिह्वायै ज्ञानप्रदायै स्वाहा॥ ५८<br><br>ॐ कनकायै कनकनिभायै रम्यायै ऐन्द्रजिह्वायै स्वाहा॥ ५९<br><br>ॐ रक्तायै रक्तवर्णायै आग्नेयजिह्वायै अनेकवर्णायै विद्वेषणमोहनायै स्वाहा॥ ६०<br><br>ॐ कृष्णायै नैर्ऋतजिह्वायै मारणायै स्वाहा॥ ६१<br><br>ॐ सुप्रभायै पश्चिमजिह्वायै मुक्ताफलायै शान्तिकायै पौष्टिकायै स्वाहा॥ ६२<br><br>ॐ अभिव्यक्तायै वायव्यजिह्वायै शत्रूच्चाटनायै स्वाहा॥ ६३<br><br>ॐ वह्नये तेजस्विने स्वाहा॥ ६४<br><br>एतावद्वह्निheaderसंस्कारमथवा वह्निकर्मसु।<br>नैमित्तिके च विधिना शिवाग्निं कारयेत्पुनः॥ ६५<br><br>निरीक्षणं प्रोक्षणं ताडनं च षष्ठेन फडन्तेन अभ्युक्षणं चतुर्थेन खननोट्किरणं षष्ठेन पूरणं समीकरणमाद्येन सेचनं वौषडन्तेन कुट्टनं षष्ठेन सम्मार्जनोपलेपने तुरीयेण कुण्डपरिकल्पनं निवृत्या त्रिभिरेव कुण्डपरिधानं चतुर्थेन कुण्डार्चनमाद्येन रेखाचतुष्टयसम्पादनं षष्ठेन फडन्तेन वज्रीकरणं चतुष्पदापादनमाद्येन एवं कुण्डसंस्कारमष्टादशविधम्॥ ६६ | होते हैं। हे सुव्रत! समस्त कर्मोंमें शिवाग्नि उत्पन्न करके सात जिह्वाओंकी कल्पना करके ही सभी कार्य करने चाहिये अथवा शिवाग्नि जिह्वामात्रसे ही सिद्ध हो जाती है, अतः हे विप्रेन्द्रो! साधकको चाहिये कि जिह्वामात्रसे ही समस्त कार्य सम्पन्न करे॥ ५३—५६॥<br><br>[सात जिह्वाओंका स्वरूप इस प्रकार बताया जाता है—] ॐ बहुरूपायै मध्यजिह्वायै अनेकवर्णायै दक्षिणोत्तरमध्यगायै शान्तिकपौष्टिकमोक्षादिफलप्रदायै स्वाहा।<br><br>ॐ हिरण्यायै चामीकराभायै ईशानजिह्वायै ज्ञानप्रदायै स्वाहा।<br><br>ॐ कनकायै कनकनिभायै रम्यायै ऐन्द्रजिह्वायै स्वाहा।<br><br>ॐ रक्तायै रक्तवर्णायै आग्नेयजिह्वायै अनेकवर्णायै विद्वेषणमोहनायै स्वाहा।<br><br>ॐ कृष्णायै नैर्ऋतजिह्वायै मारणायै स्वाहा।<br><br>ॐ सुप्रभायै पश्चिमजिह्वायै मुक्ताफलायै शान्तिकायै पौष्टिकायै स्वाहा।<br><br>ॐ अभिव्यक्तायै वायव्यजिह्वायै शत्रूच्चाटनायै स्वाहा—ये सात जिह्वारूप मन्त्र हैं और ॐ वह्नये तेजस्विने स्वाहा—यह प्रधान मन्त्र है॥ ५७—६४॥<br><br>इस विधिसे वह्निसंस्कार करना चाहिये। अथवा वह्निकार्योंमें और नैमित्तिक कर्ममें विधिपूर्वक शिवाग्नि उत्पन्न करनी चाहिये। [उसकी विधि इस प्रकार है—] फडन्त षष्ठ मन्त्रसे निरीक्षण, प्रोक्षण और ताड़न; चतुर्थ मन्त्रसे अभ्युक्षण; षष्ठ मन्त्रसे खनन तथा उत्किरण; आद्यमन्त्रसे पूरण तथा समीकरण; वौषडन्त आद्यमन्त्रसे सेचन; षष्ठ मन्त्रसे कुट्टन; तुरीय (चतुर्थ) मन्त्रसे सम्मार्जन तथा उपलेपन; अघोर, वामदेव और सद्योजात—इन तीन मन्त्रोंसे कुण्डपरिकल्पन; चतुर्थ मन्त्रसे कुण्डका परिधान (मेखलाकरण); आद्य (प्रथम) मन्त्रसे कुण्डका अर्चन फडन्त षष्ठ मन्त्रसे रेखाचतुष्टयकरण और प्रथम मन्त्रसे वज्रीकरण और ऐन्द्रागण आदि चारों देवोंका स्थापन प्रथम मन्त्रसे—इस प्रकार अठारह प्रकारके इन कुण्डसंस्कारोंको करना |
अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण-हवन-विधानका वर्णन ६८१
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुण्डसंस्कारानन्तरमक्षपाटनं षष्ठेन विष्टरन्यासमाद्येन<br>वज्रासने वागीश्वर्यावाहनम्॥ ६७<br><br>ॐ ह्रीं वागीश्वरीं श्यामवर्णां विशालाक्षीं<br>यौवनोन्मत्तविग्रहाम्। ऋतुमतीं वागीश्वरशक्तिमा-<br>वाहयामि॥ ६८<br><br>ॐ वागीश्वरीं पूजयामि॥ ६९<br><br>ॐ पुनर्वागीश्वरावाहनम्॥ ७०<br><br>एकवक्त्रं चतुर्भुजं शुद्धस्फटिकाभं वरदाभयहस्तं<br>परशुमृगधरं जटामुकुटमण्डितं सर्वाभरणभूषित-<br>मावाहयामि॥ ७१<br><br>ॐ ईं वागीश्वराय नमः। आवाहनस्थापन-<br>सन्निधानसन्निरोधपूजान्तं वागीश्वरीं सम्भाव्य<br>गर्भाधानवह्निसंस्कारम्॥ ७२ | चाहिये॥ ६५-६६॥<br><br>कुण्डसंस्कारके पश्चात् षष्ठ मन्त्रसे अक्षपाटन और प्रथम मन्त्रसे विष्टरन्यास करके वज्रासन (हीरेके आसन)-पर भगवती वागीश्वरीका आवाहन करना चाहिये। [वागीश्वरीके आवाहनका मन्त्र इस प्रकार है—] ॐ ह्रीं वागीश्वरीं श्यामवर्णां विशालाक्षीं यौवनोन्मत्तविग्रहाम्। ऋतुमतीं वागीश्वरशक्तिमावाहयामि। वागीश्वरीं पूजयामि। इसके अनन्तर वागीश्वरका आवाहन करना चाहिये। [मन्त्र इस प्रकार है—] एकवक्त्रं चतुर्भुजं शुद्धस्फटिकाभं वरदाभयहस्तं परशुमृगधरं जटामुकुटमण्डितं सर्वाभरणभूषितमावाहयामि। ॐ ईं वागीश्वराय नमः। इस प्रकार आवाहन, स्थापन, सन्निधान तथा सन्निरोध पूजापर्यन्त करके वागीश्वरीको सत्कृतकर गर्भाधान, वह्निसंस्कार करना चाहिये॥ ६७—७२॥ |
| अरणीजनितं कान्तोद्भवं वा अग्निहोत्रजं वा ताम्रपात्रे<br>शरावे वा आनीय निरीक्षणताडनाभ्युक्षणप्रक्षालन-<br>माद्येन क्रव्यादाशिवपरित्यागोऽपि प्रथमेन<br>वह्नेस्त्रैकारणं जठरभ्रूमध्यादावाह्याग्निं<br>वैकारणामूर्तावाग्नेयेन उद्दीपनमाद्येन पुरुषेण संहितया<br>धारणा धेनुमुद्रां तुरीयेणावगुण्ठ्य जानुभ्यामवनिं<br>गत्वा शरावोत्थापनं कुण्डोपरि निधाय<br>प्रदक्षिणामावर्त्य तुरीयेणात्मसम्मुखां वागीश्वरीं<br>गर्भनाड्यां गर्भाधानान्तरीयेण कमलप्रदानमाद्येन<br>वौषडन्तेन कुशार्घ्यं दत्त्वा इन्धनप्रदानमाद्येन प्रज्वालनं<br>गर्भाधानं च सद्येनाद्येन पूजनं पुंसवनं वामेन पूजनं<br>द्वितीयेन सीमन्तोन्नयनमघोरेण तृतीयेन पूजनम्॥ ७३ | [संस्कारविधि इस प्रकार है—] अरणीसे उत्पन्न, सूर्यकान्तमणिसे उत्पन्न अथवा अग्निहोत्रसे उत्पन्न अग्निको ताम्रपात्र या मिट्टीके शराव (कसोरा)-में लाकर आद्यमन्त्रसे निरीक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण तथा प्रक्षालन करके पुनः आद्य मन्त्रसे ही क्रव्यादंश तथा अशिवका परित्यागकर जठर और भ्रूमध्यसे वह्निके त्रैकारण (त्रिवर्गसाधन)-का आवाहन करके उस आवाहित मूर्तिमें वह्निमन्त्रसे उद्दीपन करके तत्पुरुषमन्त्रसहित आद्यमन्त्रके द्वारा धारणा तथा संहितामन्त्रसे धेनुमुद्रा प्रदर्शित करनी चाहिये। तत्पश्चात् चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन करके दोनों घुटनोंको भूमिपर टेककर कसोरेको उठाकर कुण्डके ऊपर रखकर चतुर्थ मन्त्रसे प्रदक्षिणक्रमसे चारों ओर घुमाकर अपने सम्मुख विराजमान वागीश्वरीका ध्यान करके गर्भनालमें गर्भाधानकी रीतिसे वौषडन्त आद्यमन्त्रसे कमल प्रदान करके कुशार्घ्य देकर तथा प्रथम मन्त्रसे ईंधन देकर सद्योजातमन्त्रसे प्रज्वालन तथा गर्भाधान करना चाहिये। तदनन्तर प्रथम सद्योजातमन्त्रसे पूजन, वामदेवमन्त्रसे पुंसवन, उसी द्वितीय मन्त्रसे पुनः पूजन, अघोरमन्त्रसे सीमन्तोन्नयन और पुनः उसी तृतीय मन्त्रसे पूजन करना चाहिये॥ ७३॥ |
| ६८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| अवयवव्याप्तिर्वक्त्रोद्घाटनं वक्त्रनिष्कृतिरिति<br>तृतीयेन गर्भजातकर्मपुरुषेण पूजनं तुरीयेण षष्ठेन<br>प्रोक्षणं सूतकशुद्धये चाग्निसूनुरक्षाकुशास्त्रेण वक्त्रे-<br>णाऽग्नौ मूलमीशाग्रं नैर्ऋतिमूलं वायव्याग्रं वायव्य-<br>मूलमीशाग्रमिति कुशास्तरणमिति पूर्वोक्तमिध्ममग्र-<br>मूलघृताक्तं लालापनोदाय षष्ठेन जुहुयात्॥ ७४ | अंगोंकी व्याप्ति, वक्त्रोद्घाटन और वक्त्रनिष्कृति तृतीय मन्त्रसे करना चाहिये। गर्भजातकर्म तत्पुरुषमन्त्रसे, पूजन चतुर्थ मन्त्रसे, सूतकशुद्धिके लिये प्रोक्षण षष्ठ मन्त्रसे और अग्निरूप पुत्रकी रक्षा कुशास्त्र मन्त्रसे करे। तत्पश्चात् वक्त्रमन्त्रसे अग्निकोणमें कुशमूल, ईशानमें कुशका अग्रभाग, नैर्ऋत्यमें कुशमूल, वायव्यमें अग्रभाग, वायव्यमें कुशमूल और ईशानमें अग्रभाग—इस भाँति पूर्वोक्त रीतिसे कुशास्तरण करके घृतमें भींगी हुई समिधाका अग्निकी लालानिवृत्तिके लिये षष्ठ मन्त्रसे हवन करना चाहिये॥ ७४॥ | | पञ्चपूर्वातिक्रमेण परिधिविष्टरन्यासोऽपि आद्येन<br>विष्टरोपरि हिरण्यगर्भहरनारायणानपि पूजयेत्॥ ७५<br><br>इन्द्रादिलोकपालांश्च पूजयेत्॥ ७६<br><br>वज्रावर्तपर्यन्तानपि पूजयेत्॥ ७७<br><br>वागीश्वरवागीश्वरीपूजाद्येनमुद्रास्य हुतं विसर्ज-<br>येत्॥ ७८ | वामदेव आदि चार मन्त्रोंसे परिधियुक्त विष्टरका स्थापन करके आद्यमन्त्रसे विष्टरके ऊपर ब्रह्मा, शिव तथा नारायणका पूजन करना चाहिये। इसी प्रकार इन्द्र आदि लोकपालों तथा वज्रसे लेकर त्रिशूलपर्यन्त उनके आठ आयुधोंकी भी पूजा करनी चाहिये। वागीश्वर तथा वागीश्वरीकी पूजा आदि करके इन वागीश्वरका उद्वासनकर होमद्रव्यका हवन करना चाहिये॥ ७५—७८॥ | | स्रुक्स्रुवसंस्कारमथो निरीक्षणप्रोक्षणताडना-<br>भ्युक्षणादीनि पूर्ववत् स्रुक् स्रुवं च हस्तद्वये गृहीत्वा<br>संस्थापनमाद्येन ताडनमपि स्रुक्स्रुवोपरि<br>दर्भानुलेखनमूलमध्यमाग्रेण त्रित्वेन स्रुक्शक्तिं<br>स्रुवमपि शम्भुं दक्षिणपार्श्वे कुशोपरि शक्तये नमः<br>शम्भवे नमः॥ ७९ | इसके पश्चात् स्रुक्-स्रुवका संस्कार बताया जाता है—पूर्वकी भाँति निरीक्षण, प्रोक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण आदि करके दोनों हाथोंमें स्रुक्-स्रुव ग्रहणकर प्रथम मन्त्रसे संस्थापन तथा ताड़न करके स्रुक्-स्रुवके ऊपर कुशके मूल, मध्य और अग्रभागसे तीन प्रकारसे अनुलेखन करके स्रुक्को शक्ति और स्रुवको शिव मानकर उन्हें दक्षिण भागमें कुशके ऊपर 'शक्तये नमः', 'शम्भवे नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा स्थापित करना चाहिये॥ ७९॥ | | ततो ह्यन्तिसूत्रेण स्रुक्स्रुवौ तुरीयेण<br>वेष्टयेदर्चयेच्च॥ ८०<br><br>धेनुमुद्रां दर्शयित्वा तुरीयेणावगुण्ठ्य षष्ठेन रक्षां<br>विधाय स्रुक्स्रुवसंस्कारः पूर्वमेवोक्तः॥ ८१ | तदनन्तर समीपवर्ती सूत्रसे स्रुक्-स्रुवको चतुर्थ मन्त्रका उच्चारण करके वेष्टित करना चाहिये और पुनः अर्चन करना चाहिये। इसके बाद धेनुमुद्रा दिखाकर चतुर्थ मन्त्रसे अवगुण्ठन तथा षष्ठ मन्त्रसे रक्षाकर्म सम्पन्न करके स्रुक्-स्रुव संस्कार करना चाहिये॥ ८०–८१॥ | | पुनराज्यसंस्कारः पूर्वमेवोक्तः निरीक्षणप्रोक्षणताडना-<br>भ्युक्षणादीनि पूर्ववत्॥ ८२ | आज्यसंस्कार पूर्वमें बताया गया है, पूर्वकी भाँति निरीक्षण, प्रोक्षण, ताड़न, अभ्युक्षण आदि करना चाहिये। | | आज्यप्रतापनमैशान्यां वा षष्ठेन वेद्युपरि विन्यस्य<br>घृतपात्रं वितस्तिमात्रं कुशपवित्रं वामहस्ताङ्गुष्ठा- | इसके बाद षष्ठ मन्त्रसे ईशानकोणमें घृतको तपाकर घृतपात्रको वेदीके ऊपर रखकर वितस्तिमात्र (बारह |
अध्याय २५ ] शिवहोमार्चाके लिये कुण्ड-मेखला-निर्माण... हवन-विधानका वर्णन [ ६८३
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नामिकाग्रं गृहीत्वा दक्षिणाङ्गुष्ठानामिकामूलं गृही-<br>त्वाग्निज्वलोत्प्लवनं स्वाहान्तेन तुरीयेण पुनः षड्<br>दर्भान् गृहीत्वा पूर्ववत्स्वात्मसम्प्लवनं स्वाहान्तेनाद्येन<br>कुशद्वयपवित्रबन्धनं चाद्येन घृते न्यशेदिति पवित्री-<br>करणम्॥ ८३ | अंगुल) कुशाके पवित्रकका अग्रभाग अपने वाम<br>हस्तके अँगुष्ठ और अनामिकासे ग्रहण करके तथा<br>दक्षिण हस्तके अँगुष्ठ और अनामिकासे पवित्रकका<br>मूल ग्रहण करके स्वाहान्त चतुर्थ मन्त्रसे अग्निज्वालाका<br>उत्प्लवन करना चाहिये। इसके बाद छः कुश लेकर<br>स्वाहान्त प्रथम मन्त्रसे पूर्वकी भाँति अपने देहमें<br>सम्प्लवन करके दो कुशोंका पवित्रक बनाकर प्रथम<br>मन्त्रसे उसे घृतमें डाल देना चाहिये—यह पवित्रीकरण<br>है॥ ८२-८३॥ |
| दर्भद्वयं प्रगृह्याग्निप्रज्वालनं घृतं त्रिधा वर्तयेत्।<br>सम्प्रोक्ष्याग्नौ निधापयेदिति नीराजनम्॥ ८४ | घृतप्लुत दो दर्भ लेकर उसे प्रज्वलित करके<br>घृतके ऊपर तीन बार घुमाये और पुनः सम्प्रोक्षण करके<br>अग्निमें डाल दे—यह नीराजन है। पुनः दर्भोंको लेकर<br>कीट आदि देख करके अर्घ्यजलसे सम्प्रोक्षण करके<br>दर्भोंको अग्निमें डाल देना चाहिये—यह अवद्योतन है।<br>दो दर्भ लेकर अग्निमें प्रज्वलित करके घृतको देखे—<br>यह निरीक्षण है॥ ८४-८६॥ |
| पुनर्दर्भान् गृहीत्वा कीटकादि निरीक्ष्यार्घ्येण सम्प्रोक्ष्य<br>दर्भानग्नौ निधाय इत्यवद्योतनम्॥ ८५ | |
| दर्भद्वयं गृहीत्वाग्निज्वल्य घृतं निरीक्षयेत्॥ ८६ | |
| दर्भेण गृहीत्वा तेनाग्रद्वयेन शुक्लपक्षद्वयेनाद्येनेति<br>कृष्णपक्षसम्पातनं घृतं त्रिभागेन विभज्य<br>स्रुवेणैकभागेनाज्येनाग्नये स्वाहा द्वितीयेनाज्येन<br>सोमाय स्वाहा आज्येन ॐ अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा<br>आज्येनाग्नये स्विष्टकृते स्वाहा॥ ८७ | इसके बाद अन्य दर्भके साथ दो पवित्रक लेकर<br>उनमें शुक्लपक्षद्वयकी भावना करे तथा उन दोनोंके<br>सहित घृतको सद्योजातमन्त्रसे पृथक् कर दे, शेषको<br>कृष्णपक्षकी भावनासे पृथक् करे; इस प्रकार घीको तीन<br>भागोंमें विभक्त करके स्रुवद्वारा घृतके एक भागको<br>‘अग्नये स्वाहा’, घृतके द्वितीय भागको ‘सोमाय<br>स्वाहा’ और घृतके तृतीय भागको ‘अग्नीषोमाभ्यां<br>स्वाहा’ तथा अवशिष्ट घृतको ‘अग्नये स्विष्टकृते<br>स्वाहा’—ऐसा कहकर होम करे॥ ८७॥ |
| पुनः कुशेन गृहीत्वा संहिताभिमन्त्रेण<br>नमोऽन्तेनाभिमन्त्रयेत्॥ ८८ | तत्पश्चात् कुशयुक्त पवित्रक लेकर अन्तमें नमः<br>लगाकर संहिता मन्त्रसे घृतको अभिमन्त्रित करना<br>चाहिये। |
| अभिमन्त्र्य धेनुमुद्राप्रदर्शनकवचावगुण्ठनास्त्रेण<br>रक्षाम्। अथ संस्कृते निधापयेद् आज्यसंस्कारः॥ ८९ | अभिमन्त्रित करके धेनुमुद्रा प्रदर्शित करे।<br>कवचसे अवगुण्ठन और अस्त्रमन्त्रसे रक्षण करना<br>चाहिये, इसके बाद संस्कारित पवित्रकोंको अग्निमें<br>डाल देना चाहिये—यह आज्यसंस्कार है॥ ८८-८९॥ |
| आज्येन स्रुग्वदनेन चक्राभिधारणं शक्तिबीजादी-<br>शानमूर्तये स्वाहा। पूर्ववत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा<br>अघोरहृदयाय स्वाहा वामदेवाय गुह्याय स्वाहा<br>सद्योजातमूर्तये स्वाहा। इति वक्त्रोद्घाटनम्॥ ९० | स्रुवमें भरकर लिये गये घृतसे शक्तिबीजमन्त्र<br>(ह्रीं)-के द्वारा आहुति दे—यह चक्राभिधारण है। इसके<br>बाद ईशानमूर्तये स्वाहा, तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा,<br>अघोरहृदाय स्वाहा, वामदेवगुह्याय स्वाहा, |
| ईशानमूर्तये तत्पुरुषवक्त्राय स्वाहा तत्पुरुषवक्त्राय<br>अघोरहृदयाय स्वाहा अघोरहृदाय वामगुह्याय |