श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ४४ ] | त्रिमूर्तिदानविधि | ७२१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेन तान् पूजयित्वा द्विजेभ्यो दापयेद्धनम्।<br>पृथक्पृथक् तन्मन्त्रैश्च दशनिष्कं च भूषणम्॥ ९<br><br>दशनिष्केण कर्तव्यमासनं केवलं पृथक्।<br>स्नपनं तत्र कर्तव्यं शिवस्य विधिपूर्वकम्॥ १०<br><br>दक्षिणा च प्रदातव्या यथाविभवविस्तरम्।<br>एवं यः कुरुते दानं लोकेशानां तु भक्तितः।<br>लोकेशानां चिरं स्थित्वा सार्वभौमो भवेद्बुधः॥ ११ | पूजा करवाकर उन लोकपालमन्त्रोंके द्वारा उन्हें पृथक्-पृथक् द्रव्य तथा दस निष्क सुवर्णका आभूषण दिलाये। साथ ही दस निष्क परिमाणका आसन भी प्रदान करे। वहाँ विधिपूर्वक शिवजीको स्नान कराये। तत्पश्चात् अपने सामर्थ्यके अनुसार आचार्यको दक्षिणा प्रदान करे। जो मनुष्य इस विधिसे भक्ति-पूर्वक लोकपालोंका दान करता है, वह दीर्घकालतक लोकपालोंके समीप निवास करके बुद्धिमान् तथा चक्रवर्ती राजा होता है॥ ७–११॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे लोकपालाष्टकदानविधानवर्णनं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणे अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लोकपालाष्टकदानविधानवर्णन' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४३॥
चौवालीसवाँ अध्याय
त्रिमूर्तिदानविधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>अथान्यत्सम्प्रवक्ष्यामि सर्वदानोत्तमोत्तमम्।<br>पूर्वोक्तदेशकाले च मण्डपे च विधानतः॥ १<br><br>प्रणयात्कुण्डमध्ये च स्थण्डिले शिवसन्निधौ।<br>पूर्वं विष्णुं समासाद्य पद्मयोनिमतः परम्॥ २<br><br>मन्त्राभ्यां विधिनोक्ताभ्यां प्रणवादिसमन्त्रकम्।<br>नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि।<br>तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ ३<br><br>ब्रह्मब्राह्मणवृद्धाय ब्रह्मणे विश्ववेधसे।<br>शिवाय हरये स्वाहा स्वधा वौषट् वषट् तथा॥ ४<br><br>पूजयित्वा विधानेन पश्चाद्धोमं समाचरेत्।<br>सर्वद्रव्यं हि होतव्यं द्वाभ्यां कुण्डविधानतः॥ ५<br><br>ऋत्विजौ द्वौ प्रकर्तव्यौ गुरुणा वेदपारगौ।<br>तानुद्दिश्य यथान्यायं विप्रेभ्यो दापयेद्धनम्॥ ६<br><br>शतमष्टोत्तरं तेभ्यः पृथक्पृथगनुत्तमम्।<br>वस्त्राभरणसंयुक्तं सर्वालङ्कारसंयुतम्॥ ७ | सनत्कुमार बोले—अब मैं समस्त दानोंमें अत्युत्तम अन्य [त्रिमूर्ति] दानका वर्णन करूँगा। पूर्वोक्त काल और स्थानमें भलीभाँति मण्डप तथा वेदिका निर्माण करे। इसके बाद भक्तिपूर्वक शिवकुण्डके समीप स्थण्डिलपर शिवजीको स्थापित करके उनके पार्श्वभागमें पहले विष्णुको, बादमें पद्मयोनि ब्रह्माको स्थापित करके सप्रणव शिवमन्त्रसहित विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। वे मन्त्र इस प्रकार हैं—नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ ब्रह्मब्राह्मणवृद्धाय ब्रह्मणे विश्ववेधसे। शिवाय हरये स्वाहा स्वधा वौषट् वषट् तथा॥ १–४॥<br><br>इस प्रकार विधानपूर्वक पूजन करके बादमें होम करना चाहिये। ब्रह्मा तथा विष्णु—इन दोनोंके लिये पृथक्-पृथक् कुण्डकी व्यवस्था करके सम्पूर्ण होम-द्रव्यका हवन करना चाहिये। आचार्यको चाहिये कि वेदके पारगामी दो ऋत्विजोंको नियुक्त करे। उन ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवको उद्देश्य करके ब्राह्मणोंको समुचित दक्षिणा-द्रव्य दिलाना चाहिये। वस्त्राभूषण और सभी अलंकारोंके साथ एक सौ आठ उत्तम स्वर्ण-मुद्राएँ पृथक्-पृथक् उन विप्रोंको प्रदान करनी |