श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| श्लोक | अर्थ |
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| संहारकर्ता तथा मृत्युस्वरूप ईश्वरको नमस्कार है॥ ११॥ | |
| अचेतनाय चिन्त्याय चेतनायासहारिणे।<br>अरूपाय सुरूपाय अनङ्गायाङ्गहारिणे॥ १२ | चित्तजन्य ज्ञानसे रहित, चिन्तनके योग्य, जीवोंके जन्म-मरणरूप कष्टोंका हरण करनेवाले, रूपरहित तथा सुन्दर रूपवाले, अंगोंसे रहित कामदेवरूप तथा अंगोंका नाश करनेवाले रुद्रको नमस्कार है॥ १२॥ |
| भस्मदिग्धशरीराय भानुसोमाग्निहेतवे।<br>श्वेताय श्वेतवर्णाय तुहिनाद्रिचराय च॥ १३<br><br>सुश्वेताय सुवक्त्राय नमः श्वेतशिखाय च।<br>श्वेतास्याय महास्याय नमस्ते श्वेतलोहित॥ १४ | भस्मसे भूषित शरीरवाले, सूर्य-चन्द्र-अग्निके कारणरूप, श्वेतरूप, श्वेत वर्णवाले, हिमाद्रिपर विचरण करनेवाले, अति श्वेतरूपसम्पन्न, सुन्दर वक्त्रवाले तथा श्वेत शिखाधारी, श्वेत मुखवाले, महान् मुखवाले हे श्वेतलोहित! आपको नमस्कार है॥ १३-१४॥ |
| सुताराय विशिष्टाय नमो दुन्दुभिने हर।<br>शतरूपविरूपाय नमः केतुमते सदा॥ १५ | सुन्दर कान्तिवाले, विशिष्टतासम्पन्न तथा दुन्दुभि धारण करनेवाले, सैकड़ों रूपोंवाले, विशिष्ट रूपवाले तथा केतुमान् हे हर! आपको सर्वदा नमस्कार है॥ १५॥ |
| ऋद्धिशोकविशोकाय पिनाकाय कपर्दिने।<br>विपाशाय सुपाशाय नमस्ते पाशनाशिने॥ १६ | ऋद्धि-शोक-विशोकस्वरूप, पिनाक धारण करनेवाले, जटाजूट धारण करनेवाले, बन्धनमुक्त, सुन्दर पाश धारण करनेवाले तथा पाशहर आप रुद्रको नमस्कार है॥ १६॥ |
| सुहोत्राय हविष्याय सुब्रह्मण्याय सूरिणे।<br>सुमुखाय सुवक्त्राय दुर्दम्याय दमाय च॥ १७<br>कङ्काय कङ्करूपाय कङ्कणीकृतपन्नग।<br>सनकाय नमस्तुभ्यं सनातन सनन्दन॥ १८<br>सनत्कुमार सारङ्गमारणाय महात्मने।<br>लोकाक्षिणे त्रिधामाय नमो विरजसे सदा॥ १९ | हे भुजंगरूप कंकण (कंगन) धारण करनेवाले! आप श्रेष्ठ यजनकर्ता, हविष्यरूप, सुब्रह्मण्य, महाविद्या-सम्पन्न, सुन्दर मुखवाले, शुभ वक्त्रवाले, दुर्दमनीय, दमन करनेवाले, कंक (कपटद्विजरूप), कंकरूप (यम-स्वरूप)-को नमस्कार है। आप सनकको नमस्कार है। हे सनातनरूप! हे सनन्दनरूप! हे सनत्कुमाररूप! पशु-पक्षियोंको मारनेके लिये किरातरूप! महात्मा, संसारके नेत्ररूप, तीन धामोंवाले तथा आप विरजको सदा नमस्कार है॥ १७-१९॥ |
| शङ्खपालाय शङ्खाय रजसे तमसे नमः।<br>सारस्वताय मेघाय मेघवाहन ते नमः॥ २० | शंखपाल, शंखरूप, रज तथा तम गुणोंसे युक्त शिवको नमस्कार है। हे मेघवाहन! आप मेघरूप तथा सारस्वतको नमस्कार है॥ २०॥ |
| सुवाहाय विवाहाय विवादवरदाय च।<br>नमः शिवाय रुद्राय प्रधानाय नमो नमः॥ २१ | भलीभाँति सबको वहन करनेवाले, विशिष्ट वाहनवाले, वाद (तर्क-वितर्क)-से रहित भक्तोंको वर देनेवाले, प्रधानरूप, कल्याणप्रद रुद्रको नमस्कार है, नमस्कार है॥ २१॥ |
| त्रिगुणाय नमस्तुभ्यं चतुर्व्यूहात्मने नमः।<br>संसाराय नमस्तुभ्यं नमः संसारहेतवे॥ २२ | तीन गुणोंवाले आपको नमस्कार है। चतुर्व्यूहरूप आपको नमस्कार है। संसारस्वरूप तथा संसारके कारण-रूप आपको बार-बार नमस्कार है॥ २२॥ |