श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ११२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जैगीषव्यो विभुः ख्यातः सर्वेषां योगिनां वरः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति युगे तथा॥ ३७<br>सारस्वतश्च मेघश्च मेघवाहः सुवाहनः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण ध्यानयोगपरायणाः॥ ३८<br>गमिष्यन्ति महात्मानो रुद्रलोकं निरामयम्। | योगियोंमें श्रेष्ठ विभु जैगीषव्य नामसे प्रसिद्ध होऊँगा। उस युगमें भी सारस्वत, मेघ, मेघवाह तथा सुवाहन नामक मेरे चार पुत्र होंगे। ध्यानयोगमें परायण वे महात्मा उसी योगमार्गपर चलकर निर्विकार शिवलोकको प्राप्त होंगे॥ ३५–३८ १/२ ॥ |
| वसिष्ठश्चाष्टमे व्यासः परिवर्ते भविष्यति॥ ३९<br>यदा तदा भविष्यामि नाम्नाहं दधिवाहनः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा योगात्मानो दृढव्रताः॥ ४०<br>भविष्यन्ति महायोगा येषां नास्ति समो भुवि।<br>कपिलश्चासुरिश्चैव तथा पञ्चशिखो मुनिः॥ ४१<br>बाष्कलश्च महायोगी धर्मात्मानो महौजसः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं ज्ञानिनो दग्धकिल्बिषाः॥ ४२<br>मत्समीपं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | पुनः आठवें द्वापरके अन्तमें जब 'वसिष्ठ' नामक व्यास होंगे, तब दधिवाहन नामसे मैं अवतरित होऊँगा। उस समय भी कपिल, आसुरि, पंचशिखमुनि तथा महायोगी बाष्कल—ये मेरे परम योगात्मा एवं दृढ़व्रती चार पुत्र होंगे, जिनके सदृश महान् योगी भूतलपर कोई नहीं होगा। वे धर्मात्मा तथा महान् ओजस्वी पुत्र भी माहेश्वर योगमें सिद्ध होकर ज्ञानसम्पन्न और पापमुक्त हो मेरे सान्निध्यको प्राप्त होंगे, जहाँसे जीवका पुनः आगमन (जन्म) नहीं होता है॥ ३९–४२ १/२ ॥ |
| परिवर्ते तु नवमे व्यासः सारस्वतो यदा॥ ४३<br>तदाप्यहं भविष्यामि ऋषभो नाम नामतः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः॥ ४४<br>पराशरश्च गर्गश्च भार्गवाङ्गिरसौ तथा।<br>भविष्यन्ति महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः॥ ४५<br>ध्यानमार्गं समासाद्य गमिष्यन्ति तथैव ते।<br>सर्वे तपोबलोत्कृष्टाः शापानुग्रहकोविदाः॥ ४६<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण योगोक्तेन तपस्विनः।<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ ४७ | नौवें द्वापरके अन्तमें जब 'सारस्वत' नामके व्यास होंगे, तब मैं भी ऋषभनामसे अवतीर्ण होऊँगा। उस समय भी पराशर, गर्ग, भार्गव तथा अंगिरा नामवाले मेरे चार पुत्र होंगे, जो महान् ओजस्वी, ब्रह्मनिष्ठ, वेदोंके पारगामी विद्वान् एवं महान् आत्मावाले होंगे। वे भी उसी प्रकार ध्यानमार्गको प्राप्त होकर इस लोकसे प्रस्थान करेंगे। तपोबलमें उत्कृष्ट, शाप-अनुग्रहके पूर्ण विद्वान् एवं तपोव्रती वे सभी पुत्र भी पूर्वोक्त उसी योगमार्गका आश्रय लेकर रुद्रलोकको प्राप्त होंगे, जहाँसे पुनः आगमन नहीं होता है॥ ४३–४७॥ |
| दशमे द्वापरे व्यासः त्रिपाद्वै नाम नामतः।<br>यदा भविष्यते विप्रस्तदाहं भविता मुनिः॥ ४८<br>हिमवच्छिखरे रम्ये भृगुतुङ्गे नगोत्तमे।<br>नाम्ना भृगोस्तु शिखरं प्रथितं देवपूजितम्॥ ४९<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति दृढव्रताः। | दसवें द्वापरके अन्तमें जब त्रिपाद् नामक विप्ररूप व्यास होंगे, तब मैं भृगुमुनिके रूपमें पर्वतोंमें उत्तम हिमालयके रमणीक भृगुतुंग नामक श्रेष्ठ पर्वत-शिखरपर अवतीर्ण होऊँगा। वह शिखर मेरे ही नामपर 'भृगुतुंग' नामसे प्रसिद्ध होगा तथा देवताओंद्वारा पूजित होगा॥ ४८-४९॥ |
| बलबन्धुर्निरामित्रः केतुशृङ्गस्तपोधनः॥ ५०<br>योगात्मानो महात्मानस्तपोयोगसमन्विताः।<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति तपसा दग्धकिल्बिषाः॥ ५१ | उस समय भी बलबन्धु, निरामित्र, केतुशृंग तथा तपोधन—ये मेरे चार पुत्र होंगे, जो दृढ़व्रती, योगात्मा, महात्मा एवं तपोयोगसे युक्त होंगे। वे अपनी तपस्यासे पापोंको दग्ध करके रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ५०–५१॥ |
| एकादशे द्वापरे तु व्यासस्तु त्रिव्रतो यदा।<br>तदाप्यहं भविष्यामि गङ्गाद्वारे कलौ तथा॥ ५२ | ग्यारहवें द्वापरके अन्तमें जब 'त्रिव्रत' नामक व्यास होंगे, उस समय भी मैं कलिमें गंगाद्वारक्षेत्रमें |