भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २४ ] श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन १११

| विकोशश्च विकेशश्च विपाशः शापनाशनः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण योगोक्तेन महौजसः॥ २२<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | उस समय भी विकोश, विकेश, विपाश तथा शापनाशन नामवाले मेरे चार शिष्य होंगे। उसी पूर्वोक्त ध्यान-योगके द्वारा वे महान् ओजस्वी शिष्य भी शिव-लोकको प्राप्त होंगे, जहाँसे जीवका पुनः आगमन नहीं होता है॥ २०—२२१/२॥ | | चतुर्थे द्वापरे चैव व्यासोऽङ्गिराः स्मृतः॥ २३<br>तदाप्यहं भविष्यामि सुहोत्रो नाम नामतः।<br>तत्रापि मम ते पुत्राश्चत्वारोऽपि तपोधनाः॥ २४<br>द्विजश्रेष्ठा भविष्यन्ति योगात्मानो दृढव्रताः।<br>सुमुखो दुर्मुखश्चैव दुर्द्ररो दुरतिक्रमः॥ २५ | चौथे द्वापरके अन्तमें जब 'अंगिरा' नामक व्यास होंगे, तब मैं भी सुहोत्र नामसे अवतीर्ण होऊँगा और उस समय भी मेरे चार पुत्र प्रकट होंगे। सुमुख, दुर्मुख, दुर्दर तथा दुरतिक्रम नामवाले मेरे वे सभी पुत्र तपस्वी, द्विजश्रेष्ठ, योगात्मा एवं दृढ़ व्रतवाले होंगे॥ २३—२५॥ | | प्राप्य योगगतिं सूक्ष्मां विमला दग्धकिल्बिषाः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण योगयुक्ता महौजसः॥ २६<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | विशुद्ध मन तथा नष्टपापवाले, योगयुक्त और महान् ओजस्वी वे पुत्र भी उसी मार्गसे योगकी सूक्ष्म गतिको प्राप्त होकर रुद्रलोकको जायँगे, जहाँसे जीवका पुनर्जन्म नहीं होता है॥ २६१/२॥ | | पञ्चमे द्वापरे चैव व्यासस्तु सविता यदा॥ २७<br>तदा चापि भविष्यामि कङ्को नाम महातपाः।<br>अनुग्रहार्थं लोकानां योगात्मकैकलागतिः॥ २८ | पाँचवें द्वापरके अन्तमें जब 'सविता' नामक व्यास होंगे; उस समय भी लोकोंके अनुग्रहार्थ योगात्मा, एककलागतिवाला तथा महान् तपोव्रती मैं 'कंक' नामसे अवतार ग्रहण करूँगा॥ २७-२८॥ | | चत्वारस्तु महाभागा विमलाः शुद्धयोनयः।<br>शिष्या मम भविष्यन्ति योगात्मानो दृढव्रताः॥ २९<br>सनकः सनन्दनश्चैव प्रभुर्यश्च सनातनः।<br>विभुः सनत्कुमारश्च निर्ममा निरहङ्कृताः॥ ३०<br>मत्समीपमुपेष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | उस समय सनक, सनन्दन, प्रभु सनातन तथा विभु सनत्कुमार नामक मेरे चार शिष्य प्रकट होंगे। महाभाग्यशाली, विशुद्ध चित्तवाले, शुद्धयोनि, योगात्मा, दृढ़व्रती, ममतारहित तथा अहंकारशून्य वे शिष्य पुनर्जन्मसे मुक्ति प्राप्त करानेवाले मेरे सान्निध्यको प्राप्त होंगे॥ २९-३०१/२॥ | | परिवर्ते पुनः षष्ठे मृत्युर्व्यासो यदा विभुः॥ ३१<br>तदाप्यहं भविष्यामि लोगाक्षिर्नाम नामतः।<br>तत्रापि मम ते शिष्या योगात्मानो दृढव्रताः॥ ३२<br>भविष्यन्ति महाभागाश्चत्वारो लोकसम्मताः।<br>सुधामा विरजाश्चैव शङ्खपाद्रज एव च॥ ३३ | पुनः छठे द्वापरके अन्तमें जब 'मृत्यु' नामक महान् ऐश्वर्यशाली व्यासका अवतार होगा, तब मैं लोगाक्षि नामसे आविर्भूत होऊँगा। उस समय भी सुधामा, विरजा, शंखपाद तथा रज नामक मेरे चार शिष्य होंगे। वे योगात्मा, दृढ़ व्रतवाले, महाभाग्यवान् एवं लोकविश्रुत होंगे॥ ३१—३३॥ | | योगात्मानो महात्मानः सर्वे वै दग्धकिल्बिषाः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण ध्यानयोगसमन्विताः॥ ३४<br>मत्समीपं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | योगात्मा, महान् आत्मावाले तथा ध्यानयोगसे सम्पन्न वे सभी शिष्य उसी मार्गका आश्रय लेकर मेरे समीप पहुँचेंगे, जहाँसे पुनर्जन्म नहीं होता है॥ ३४१/२॥ | | सप्तमे परिवर्ते तु यदा व्यासः शतक्रतुः॥ ३५<br>विभुनामा महातेजाः प्रथितः पूर्वजन्मनि।<br>तदाप्यहं भविष्यामि कलौ तस्मिन् युगान्तिके॥ ३६ | पूर्वजन्ममें विभु नामसे प्रख्यात महातेजस्वी शतक्रतु नामक व्यास जब सातवें द्वापरके अन्तमें होंगे, उस समय भी मैं उस द्वापरकी समाप्तिपर कलिमें सभी |