श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ११० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| न तीर्थफलयोगेन क्रतुभिर्वाप्तदक्षिणैः।<br>न वेदाध्ययनैर्वापि न वित्तेन न वेदनैः॥ ७<br>न शक्यं मानवैर्द्रष्टुमृते ध्यानादहं त्विह। | तपसे, न आचारसे, न दानसे, न धर्मफलसे, न तीर्थाटनसे, न योगसे, न पुष्कल दक्षिणावाले यज्ञोंसे, न वेदोंके अध्ययनसे, न धनसे तथा न तो शास्त्रोंके परिशीलनमात्रसे ही देख सकनेमें समर्थ हैं, मेरा दर्शन ध्यानरहित साधनाके द्वारा नहीं किया जा सकता॥ ६-७१/२॥ | | सप्तमे चैव वाराहे ततस्तस्मिन् पितामह॥ ८<br>कल्पेश्वरोऽथ भगवान् सर्वलोकप्रकाशकः।<br>मनुर्वैवस्वतश्चैव तव पौत्रो भविष्यति॥ ९ | हे पितामह! वाराहकल्पके सातवें मन्वन्तरमें सभी लोकोंको प्रकाशित करनेवाला और कल्पका स्वामी मेरा अवताररूप वैवस्वत मनु आपके पौत्रके रूपमें अवतरित होगा॥ ८-९॥ | | तदा चतुर्युगावस्थे तस्मिन् कल्पे युगान्तिके।<br>अनुग्रहार्थं लोकानां ब्राह्मणानां हिताय च॥ १०<br>उत्पत्स्यामि तदा ब्रह्मन् पुनरस्मिन् युगान्तिके।<br>युगप्रवृत्त्या च तदा तस्मिंश्च प्रथमे युगे॥ ११<br>द्वापरे प्रथमे ब्रह्मन् यदा व्यासः स्वयं प्रभुः।<br>तदाहं ब्राह्मणार्थाय कलौ तस्मिन् युगान्तिके॥ १२<br>भविष्यामि शिखायुक्तः श्वेतो नाम महामुनिः।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये छागले पर्वतोत्तमे॥ १३ | उसी कल्पके द्वापरयुगके अन्तमें लोकोंपर अनुग्रह तथा ब्राह्मणोंके हितके लिये मैं अवतार ग्रहण करूँगा। पुनः हे ब्रह्मन्! युगप्रवृत्तिके अनुसार इसी प्रथम द्वापरयुगके अन्तमें जब स्वयं प्रभु व्यास होंगे, उस समय ब्राह्मणोंके हितार्थ मेरा अवतार होगा। इसके अनन्तर उसी युगकी समाप्तिपर कलिमें मैं शिखाधारी ‘श्वेत’ नामक महामुनिके रूपमें अवतीर्ण होऊँगा और पर्वतोंमें उत्तम हिमालयके छागल नामवाले शिखरपर निवास करूँगा॥ १०-१३॥ | | तत्र शिष्याः शिखायुक्ता भविष्यन्ति तदा मम।<br>श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेतास्यः श्वेतलोहितः॥ १४<br>चत्वारस्तु महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>ततस्ते ब्रह्मभूयिष्ठा दृष्ट्वा ब्रह्मगतिं पराम्॥ १५<br>मत्समीपं गमिष्यन्ति ध्यानयोगपरायणाः। | वहाँपर उस समय श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य तथा श्वेतलोहित नामक शिखायुक्त मेरे चार शिष्य प्रकट होंगे। ये चारों महात्मा, ब्रह्मनिष्ठ और वेदोंके पारगामी विद्वान् होंगे। तदनन्तर ध्यानयोगमें पूर्ण तत्पर वे ब्रह्मभूयिष्ठ शिष्य ब्रह्मकी परम गतिको जानकर मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे॥ १४-१५१/२॥ | | ततः पुनर्यदा ब्रह्मन् द्वितीये द्वापरे प्रभुः॥ १६<br>प्रजापतिर्यदा व्यासः सद्यो नाम भविष्यति।<br>तदा लोकहितार्थाय सुतारो नाम नामतः॥ १७<br>भविष्यामि कलौ तस्मिन् शिष्यानुग्रहकाम्यया। | हे ब्रह्मन्! इसके बाद द्वितीय द्वापरके अन्तमें पुनः जब ‘सद्य’ नामक प्रजापतिरूप प्रभु व्यास होंगे, उसके अनन्तर कलिमें अपने शिष्योंके अनुग्रहकी कामनासे तथा लोकके कल्याणार्थ मैं सुतार नामसे अवतार ग्रहण करूँगा॥ १६-१७१/२॥ | | तत्रापि मम ते शिष्या नामतः परिकीर्तिताः॥ १८<br>दुन्दुभिः शतरूपश्च ऋचीकः केतुमांस्तदा।<br>प्राप्य योगं तथा ध्यानं स्थाप्य ब्रह्म च भूतले॥ १९<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति सहचारित्वमेव च। | वहाँ भी दुन्दुभि, शतरूप, ऋचीक तथा केतुमान् नामसे प्रसिद्ध मेरे शिष्य प्रकट होंगे। वे योग तथा ध्यानको पूर्णतः प्राप्त होकर भूतलपर ब्रह्मज्ञान स्थापित करके शिवलोकको प्राप्त होंगे और सदा मेरे सान्निध्यमें रहेंगे॥ १८-१९१/२॥ | | तृतीये द्वापरे चैव यदा व्यासस्तु भार्गवः॥ २०<br>तदाप्यहं भविष्यामि दमनस्तु युगान्तिके।<br>तत्रापि च भविष्यन्ति चत्वारो मम पुत्रकाः॥ २१ | पुनः तीसरे द्वापरके अन्तमें जब ‘भार्गव’ नामक व्यास होंगे, तब मैं दमन नामसे अवतीर्ण होऊँगा और |