श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २४] श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन १०९
| प्रणम्य प्रयतो भूत्वा पुनराह पितामहः।<br>य एवं भगवान् विद्वान् गायत्र्या वै महेश्वरम्॥ ४९<br><br>विश्वात्मानं हि सर्वं त्वां गायत्र्यास्तव चेश्वर।<br>तस्य देहि परं स्थानं तथास्त्विति च सोऽब्रवीत्॥ ५० | प्रकार कहनेपर भगवान् ब्रह्माने प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक रुद्रसे पुनः कहा—हे भगवन्! जो विद्वान् सर्वव्यापी विश्वात्मा आप महेश्वरको गायत्रीसहित सर्वत्र स्थित देखे तथा हे ईश्वर! आपकी एवं गायत्रीकी आराधना करे, उसे आप परमपद दें। इसपर उन शिवजीने कहा—वैसा ही होगा॥ ४८-५०॥ |
| तस्माद्विद्वान् हि विश्वत्वमस्याश्चास्य महात्मनः।<br>स याति ब्रह्मसायुज्यं वचनाद् ब्रह्मणः प्रभोः॥ ५१ | इसलिये प्रभु शिवद्वारा ब्रह्माजीके प्रति कहे गये वचनके अनुसार जो विद्वान् गायत्री तथा महात्मा रुद्रका विश्वरूपत्व जान लेता है, वह ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होता है अर्थात् ब्रह्मके साथ उसका तादात्म्य स्थापित हो जाता है॥ ५१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ‘विविधकल्पवर्णनं’ नाम त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘विविधकल्पवर्णन’ नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥
चौबीसवाँ अध्याय
श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले अट्ठाईस व्यासों, अट्ठाईस शिवावतारों तथा विविध शिवयोगियोंका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| श्रुतैवमखिलं ब्रह्मा रुद्रेण परिभाषितम्।<br>पुनः प्रणम्य देवेशं रुद्रमाह प्रजापतिः॥ १ | [हे मुनियो!] शिवके द्वारा कथित सम्पूर्ण वचनोंको सुनकर प्रजापति ब्रह्माने उन देवाधिदेव शिवको प्रणाम करके पुनः उनसे कहा—॥ १॥ |
| भगवन् देवेश विश्वरूप महेश्वर।<br>उमाधव महादेव नमो लोकाभिवन्दित॥ २ | हे भगवन्! हे देवेश! हे विश्वरूप! हे महेश्वर! हे उमापते! हे महादेव! हे लोकवन्द्य! आपको नमस्कार है॥ २॥ |
| विश्वरूप महाभाग कस्मिन् काले महेश्वर।<br>या इमास्ते महादेव तनवो लोकवन्दिताः॥ ३<br>कस्यां वा युगसम्भूतयां द्रक्ष्यन्तीह द्विजातयः।<br>केन वा तपसा देव ध्यानयोगेन केन वा॥ ४ | हे विश्वरूप! हे महाभाग! हे महेश्वर! हे महादेव! आपके ये जो लोकवन्द्य अवतार हैं, वे किस कालमें तथा किस युगमें द्विजातियोंके द्वारा इस लोकमें देखे जा सकेंगे?॥ ३½॥<br>हे देव! हे महादेव! आपको नमस्कार है। द्विजातिगण किस तप या ध्यानयोगके द्वारा आपका दर्शन कर पानेमें समर्थ हो सकते हैं?॥ ४½॥ |
| नमस्ते वै महादेव शक्यो द्रष्टुं द्विजातिभिः।<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शर्वः सम्प्रेक्ष्य तं पुरः॥ ५<br>स्मयन् प्राह महादेवो ऋग्यजुःसामसम्भवः। | ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदसे प्रादुर्भूत महादेव रुद्र अपने सम्मुख-स्थित उन पितामहको देखकर मुसकराते हुए उनसे बोले॥ ५½॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>तपसा नैव वृत्तेन दानधर्मफलेन च॥ ६ | भगवान् शिव बोले— मानव मुझे न तो केवल |