श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| १०८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| द्रक्ष्यन्ति तद् द्विजा युक्ता ध्यानतत्परमानसाः।<br>यस्माच्चतुष्पदा ह्येषा त्वया दृष्टा सरस्वती ॥ ३७ | शून्य, काम-क्रोधसे विवर्जित तथा ध्यानपरायण चित्तवाले योगीजन ही उस लोकका दर्शन करेंगे॥ ३६ १/२॥<br><br>और जो आपने चार पादोंवाली इस गायत्री (सरस्वती)-को देखा है, उसीके चार चरणोंके रूपमें चरम पदवाला विष्णुलोक, शान्त तथा उत्तम स्कन्दलोक, पार्वतीलोक एवं रुद्रलोक अवस्थित हैं। ऐसी माहात्म्ययुक्त सरस्वतीका आपने दर्शन किया है॥ ३७-३८॥ |
| पादान्तं विष्णुलोकं वै कौमारं शान्तमुत्तमम्।<br>औमं माहेश्वरं चैव तस्माद् दृष्टा चतुष्पदा ॥ ३८ | |
| तस्मात्तु पशवः सर्वे भविष्यन्ति चतुष्पदाः।<br>ततश्चैषां भविष्यन्ति चत्वारस्ते पयोधराः ॥ ३९ | इससे सभी पशु भी चार पैरोंवाले होंगे और इसीसे इनके चार स्तन भी होंगे। हे ब्रह्मन्! मेरे मुखसे गिरा हुआ मन्त्रयुक्त सोमरूप अमृत प्राणधारियोंका जीवन बनकर उनके स्तनमें निवास करेगा। इसलिये वे स्तन 'पीतस्तन' कहे जायेंगे॥ ३९-४०॥ |
| सोमश्च मन्त्रसंयुक्तो यस्मान्मम मुखाच्च्युतः।<br>जीवः प्राणभृतां ब्रह्मन् पुनः पीतस्तनाः स्मृताः ॥ ४० | |
| तस्मात्सोममयं चैव अमृतं जीवसंज्ञितम्।<br>चतुष्पादा भविष्यन्ति श्वेतत्वं चास्य तेन तत् ॥ ४१ | उसीके कारण सोममय अमृत जीवनसंज्ञावाला होगा और उनके दुग्धका श्वेतत्व उसी सोमरूपत्वके कारण होगा—ऐसे गुणोंवाले वे चतुष्पाद होंगे॥ ४१॥ |
| यस्माच्चैव क्रिया भूत्वा द्विपदा च महेश्वरी।<br>दृष्टा पुनस्तथैवैषा सावित्री लोकभाविनी ॥ ४२ | आपके द्वारा देखी गयी यह लोकभाविनी सावित्री महेश्वरी पुनः दो पादोंवाली होकर क्रियारूप धारण करेगी; जिससे सभी शुभ नर-नारी दो पादों तथा दो स्तनोंवाले होंगे॥ ४२ १/२॥ |
| तस्माच्च द्विपदाः सर्वे द्विस्तनाश्च नराः शुभाः।<br>तस्माच्चेयमजा भूत्वा सर्ववर्णा महेश्वरी ॥ ४३ | सभी प्राणियोंको धारण करनेवाली तथा महान् शक्तिसे सम्पन्न जिस देवीका आपने दर्शन किया है; वह महेश्वरी अजा होकर जब सर्ववर्णमय विश्वरूप धारण करेगी, तब उसीसे सभी प्रजाएँ भी अनेक वर्णोंवाली होंगी॥ ४३-४४॥ |
| या वै दृष्टा महासत्त्वा सर्वभूतधरा त्वया।<br>तस्माच्च विश्वरूपत्वं प्रजानां वै भविष्यति ॥ ४४ | |
| अजश्चैव महातेजा विश्वरूपो भविष्यति।<br>अमोघरेताः सर्वत्र मुखे चास्य हुताशनः ॥ ४५ | तब महातेज तथा अमोघ वीर्यवाले अज विश्वरूप धारण करेंगे और इनके मुखमें सर्वत्र अग्नि विराजमान होगी; उसी कारण सर्वव्यापी पशुरूपी अग्नि पवित्र मानी जायगी॥ ४५ १/२॥ |
| तस्मात्सर्वगतो मेध्यः पशुरूपी हुताशनः।<br>तपसा भावितात्मानो ये मां द्रक्ष्यन्ति वै द्विजाः ॥ ४६ | विशुद्ध आत्मावाले जो द्विजगण अपनी तपस्यासे ईशित्व (ईश्वरत्व) तथा वशित्व (योगसिद्धि)-में सभी जगह मुझे भी सर्वव्यापी रूपमें विराजमान देखेंगे; वे रजोगुण तथा तमोगुणसे रहित होकर मानवशरीरका त्याग करके मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे और उनका पुनर्जन्म नहीं होगा॥ ४६-४७ १/२॥ |
| ईशित्वे च वशित्वे च सर्वगं सर्वतः स्थितम्।<br>रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तास्त्यक्त्वा मानुष्यकं वपुः ॥ ४७ | |
| मत्समीपमुपेष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>इत्येवमुक्तो भगवान् ब्रह्मा रुद्रेण वै द्विजाः ॥ ४८ | सूतजी कहते हैं कि हे द्विजो! शिवजीके इस |