भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २३ ] विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन १०७

यस्माच्च विश्वरूपो वै कल्पोऽयं समुदाहृतः।<br>विश्वरूपा तथा चेयं सावित्री समुदाहृता॥ २५<br><br>सर्वरूपा तथा चेमे संवृत्ता मम पुत्रकाः।<br>चत्वारस्ते मया ख्याताः पुत्रा वै लोकसम्मताः॥ २६इसी कारण यह कल्प विश्वरूपकल्प नामसे जाना गया और ये गायत्री विश्वरूपा नामसे कही गयीं। वे सर्वरूपा थीं और ये सद्योजात आदि चार कुमार मेरे पुत्ररूपमें प्रकट हुए, जिनकी लोकमें विशेष प्रसिद्धि हुई॥ २५-२६॥
यस्माच्च सर्ववर्णत्वं प्रजानां च भविष्यति।<br>सर्वभक्षा च मेध्या च वर्णतश्च भविष्यति॥ २७ये गायत्री शब्द और अर्थरूपसे मेध्या अर्थात् यज्ञयोग्या होंगी, सर्वभक्षा अर्थात् पातकादिविनाशि़का होंगी। गायत्रीके [सावित्रीके] सर्ववर्णा (सर्वशब्दात्मिका) होनेसे ही चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था प्रजामें व्यवस्थित होगी॥ २७॥
मोक्षो धर्मस्तथार्थश्च कामश्चेति चतुष्टयम्।<br>यस्माद्वेदाश्च वेदां च चतुर्था वै भविष्यति॥ २८<br><br>भूतग्रामाश्च चत्वार आश्रमाश्च तथैव च।<br>धर्मस्य पादाश्चत्वारश्चत्वारो मम पुत्रकाः॥ २९इसीलिये धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—चार प्रकारके ये पुरुषार्थ हैं और वेद भी चार हैं। जीव-समुदायोंके भी जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके रूप हैं तथा आश्रम भी चार हैं। दया, दान, तप, सत्य—ये धर्मके चार पाद हैं एवं मेरे पुत्र भी चार हैं॥ २८-२९॥
तस्माच्चतुर्युगावस्थं जगद्वै सचराचरम्।<br>चतुर्धावस्थितश्चैव चतुष्पादो भविष्यति॥ ३०इसीलिये यह चराचर जगत् युगरूप चार अवस्थाओंवाला है और यह चतुष्पादात्मक लोक भी भेदानुसार चार रूपोंमें अवस्थित है॥ ३०॥
भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकश्च महस्तथा।<br>जनस्तपश्च सत्यं च विष्णुलोकस्ततः परम्॥ ३१भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक तथा सत्यलोक—इन सबके परे विष्णुलोक स्थित है॥ ३१॥
अष्टाक्षरस्थितो लोकः स्थाने स्थाने तदक्षरम्।<br>भूर्भुवः स्वर्महश्चैव पादाश्चत्वार एव च॥ ३२<br><br>भूर्लोकः प्रथमः पादो भुवर्लोकस्ततः परम्।<br>स्वर्लोको वै तृतीयश्च चतुर्थस्तु महस्तथा॥ ३३अष्टाक्षररूप लोक अपने-अपने स्थानपर अक्षरात्मकरूपमें विद्यमान हैं। भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोक ही चार पादके रूपमें अवस्थित हैं। इनमें भूर्लोक पहला पाद है, भुवर्लोक दूसरा पाद है, स्वर्लोक तीसरा तथा महर्लोक चौथा पाद है॥ ३२-३३॥
पञ्चमस्तु जनस्तत्र षष्ठश्च तप उच्यते।<br>सत्यं तु सप्तमो लोको ह्यपुनर्भवगामिनाम्॥ ३४पाँचवाँ जनलोक, छठा तपलोक तथा पुनर्जन्मकी प्राप्ति न करनेवाले लोगोंका सत्यलोक सातवाँ लोक कहा गया है॥ ३४॥
विष्णुलोकः स्मृतं स्थानं पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>स्कान्दमोमं तथा स्थानं सर्वसिद्धिसमन्वितम्॥ ३५विष्णुलोक वह पद है, जहाँ पहुँचकर जीवका पुनः आगमन नहीं होता है। उससे भी आगे स्कन्दलोक तथा उससे भी परे पार्वतीलोक है, जो सर्वविध सिद्धियोंसे युक्त माना गया है॥ ३५॥
रुद्रलोकः स्मृतस्तस्मात्पदं तद्योगिनां शुभम्।<br>निर्ममा निरहङ्काराः कामक्रोधविवर्जिताः॥ ३६रुद्रलोक उससे परे विद्यमान है। वह पद योगियोंके लिये अत्यन्त शुभकर कहा गया है। ममतारहित, अहंकार-