श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| १०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ये चापि वामदेवत्वं ज्ञास्यन्तीह द्विजातयः।<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ १२ | जो भी द्विजातिगण मेरे वामदेवस्वरूपको जानेंगे, वे जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करानेवाले मेरे रुद्रलोकमें निवास करेंगे॥ १२॥ |
| यदाहं पुनरेवेह पीतवर्णो युगक्रमात्।<br>मत्कृतेन च नाम्ना वै पीतकल्पोऽभवत्तदा॥ १३ | जब मैं युगक्रमसे पीतवर्णवाला हुआ, तब मेरे वर्णनामपर उस कल्पका नाम पीतकल्प हुआ॥ १३॥ |
| मत्प्रसूता च देवेशी पीताङ्गी पीतलोहिता।<br>पीतवर्णा तदा ह्यासीद् गायत्री ब्रह्मसंज्ञिता॥ १४ | मेरे द्वारा उत्पन्न तथा ब्रह्म नामसे जानी जानेवाली देवेश्वरी गायत्रीका भी अंग पीला, रक्त पीला तथा वर्ण आदि सब पीला था॥ १४॥ |
| तत्रापि च महासत्त्व योगयुक्तेन चेतसा।<br>यस्मादहं तैर्विज्ञातो योगतत्परमानसैः॥ १५<br><br>तत्र तत्पुरुषत्वेन विज्ञातोऽहं त्वया पुनः।<br>तस्मात्तत्पुरुषत्वं वै ममैतत्कनकाण्डज॥ १६ | हे महासत्त्व! उस कल्पमें भी योगपरायण मनवाले उन द्विजातियोंने योगयुक्त चित्तसे मुझे जाना। हे कनकाण्डज! उस कल्पमें तुमने भी मुझे पुनः तत्पुरुषरूपमें जाना; उसी कारणसे मेरा यह तत्पुरुष नाम हुआ॥ १५-१६॥ |
| ये मां रुद्रं च रुद्राणीं गायत्रीं वेदमातरम्।<br>वेत्स्यन्ति तपसा युक्ता विमला ब्रह्मसङ्गताः॥ १७<br><br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | तपस्यासे युक्त, विशुद्ध मनवाले तथा ब्रह्मपरायण जो लोग मुझ रुद्र तथा वेदमाता रुद्राणी गायत्रीकी आराधना करेंगे, वे पुनर्जन्मसे मुक्ति दिलानेवाले रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ १७ १/२॥ |
| यदाहं पुनरेवासं कृष्णवर्णो भयानकः॥ १८ | पुनः जब मैंने भयानक कृष्णवर्ण धारण किया, तब मेरे वर्णके नामसे वह कल्प कृष्णकल्प कहा गया॥ १८ १/२॥ |
| मत्कृतेन च वर्णेन सङ्कल्पः कृष्ण उच्यते।<br>तत्राहं कालसङ्काशः कालो लोकप्रकालकः॥ १९ | हे ब्रह्मन्! उस कल्पमें भी तुमने कालसदृश, कालरूप, लोकोंके लिये महाकाल तथा घोर पराक्रमवाले मुझ घोरको जाना॥ १९ १/२॥ |
| विज्ञातोऽहं त्वया ब्रह्मन् घोरो घोरपराक्रमः।<br>मत्प्रसूता च गायत्री कृष्णाङ्गी कृष्णलोहिता॥ २० | हे देवेश! उस कल्पमें मुझसे उत्पन्न ब्रह्मसंज्ञावाली गायत्री भी कृष्ण अंगोंवाली, कृष्ण रक्तवाली तथा कृष्ण रूपवाली थीं॥ २० १/२॥ |
| कृष्णरूपा च देवेश तदासीद् ब्रह्मसंज्ञिता।<br>तस्माद् घोरत्वमापन्नं ये मां वेत्स्यन्ति भूतले॥ २१ | अतएव इस भूतलपर जो लोग घोरत्वको प्राप्त मुझ शिवको जान लेंगे, शाश्वत रूपवाला मैं उनके लिये सौम्य तथा शान्त हो जाऊँगा॥ २१ १/२॥ |
| तेषामघोरः शान्तश्च भविष्याम्यहमव्ययः।<br>पुनश्च विश्वरूपत्वं यदा ब्रह्मन् ममाभवत्॥ २२<br><br>तदाप्यहं त्वया ज्ञातः परमेण समाधिना।<br>विश्वरूपा च संवृत्ता गायत्री लोकधारिणी॥ २३ | हे ब्रह्मन्! पुनः जब मैं विश्वरूपत्वको प्राप्त हुआ, उस समय भी आपने परम समाधिसे मुझे जाना था। उस समय समस्त लोकोंको धारण करनेवाली गायत्री भी विश्वरूपा अर्थात् अनेक वर्णोंवाली थीं॥ २२-२३॥ |
| तस्मिन् विश्वत्वमापन्नं ये मां वेत्स्यन्ति भूतले।<br>तेषां शिवश्च सौम्यश्च भविष्यामि सदैव हि॥ २४ | इस भूतलपर जो लोग विश्वत्वको प्राप्त मुझ परमात्माको जान लेंगे, उनके प्रति मैं सदाके लिये सौम्य तथा शान्त हो जाऊँगा॥ २४॥ |