भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

अध्याय २३ ] विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन १०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

तेईसवाँ अध्याय

विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन, विभिन्न लोकोंकी स्थिति तथा महारुद्रका विश्वरूपत्व

सूत उवाचसूतजी बोले—ब्रह्माजीका वह वचन सुनकर उनके प्रबोधनके लिये ब्रह्मरूप भगवान् शिवने मुसकराकर उनसे कहा— ॥ १ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणो भगवान् भवः।<br>ब्रह्मरूपी प्रबोधार्थं ब्रह्माणं प्राह सस्मितम्॥ १
श्वेतकल्पो यदा ह्यासीदहमेव तदाभवम्।<br>श्वेतोष्णीषः श्वेतमाल्यः श्वेताम्बरधरः सितः॥ २जब श्वेतकल्प था, उस समय मैं श्वेत वर्णका था। मेरी श्वेत पगड़ी, श्वेत माला, श्वेत वस्त्र, श्वेत अस्थि, श्वेत रोम, श्वेत त्वचा तथा श्वेत ही मेरा रुधिर था। इसी कारणसे वह कल्प 'श्वेतकल्प' नाम से विख्यात हुआ॥ २-३॥
श्वेतास्थिः श्वेतरौमा च श्वेतासृक् श्वेतलोहितः।<br>तेन नाम्ना च विख्यातः श्वेतकल्पस्तदा ह्यसौ ॥ ३
मत्प्रसूता च देवेशी श्वेताङ्गा श्वेतलोहिता।<br>श्वेतवर्णा तदा ह्यासीद् गायत्री ब्रह्मसंज्ञिता॥ ४उस कल्पमें मुझसे उत्पन्न ब्रह्म नामसे जानी जानेवाली देवेश्वरी गायत्री भी श्वेत अंगोंवाली, श्वेत रक्तवाली तथा श्वेत वर्णवाली थीं॥ ४॥
तस्मादहं च देवेश त्वया गुह्येन वै पुनः।<br>विज्ञातः स्वेन तपसा सद्योजातत्वमागतः॥ ५तदनन्तर हे देवेश! आपने अपने उग्र तपसे सद्योजातत्वको प्राप्त मुझ शिवको जाना॥ ५॥
सद्योजातेति ब्रह्मैतद् गुह्यं चैतत्प्रकीर्तितम्।<br>तस्माद् गुह्यत्वमापन्नं ये वेत्स्यन्ति द्विजातयः॥ ६मेरा यह सद्योजातरूप गुह्य ब्रह्मके रूपमें जाना जाता है। अतएव गुह्यत्वको प्राप्त मुझ सद्योजात शिवको जो द्विजातिगण जानेंगे, वे मेरे सान्निध्यको प्राप्त होंगे, जहाँसे उनका पुनरागमन नहीं होता अर्थात् वे जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं॥ ६१/२॥
मत्समीपं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।<br>यदा चैव पुनस्त्व्ाासील्लोहितो नाम नामतः॥ ७पुनः जब मेरा नाम लोहित था, तब मेरे द्वारा धारित लोहित वर्णके कारण वह कल्प लोहितकल्प नामसे कहा गया॥ ७१/२॥
मत्कृतेन च वर्णेन कल्पो वै लोहितः स्मृतः।<br>तदा लोहितमांसास्थिलोहितक्षीरसम्भवा॥ ८उस कल्पमें रक्तवर्णके मांस तथा हड्डियोंवाली, रक्त-वर्णका दूध प्रदान करनेवाली, लाल आँखोंवाली तथा लाल स्तनवाली धेनुरूपमें गायत्री अधिष्ठित हुईं॥ ८१/२॥
लोहिताक्षी स्तनवती गायत्री गौः प्रकीर्तिता।<br>ततोऽस्या लोहितत्वेन वर्णस्य च विपर्ययात्॥ ९तदनन्तर उस धेनुके लोहितत्व, उस कल्पमें वर्णके बदल जाने तथा योगकी वामताके कारण मैं वामदेवत्वको प्राप्त हुआ अर्थात् मेरा नाम वामदेव पड़ गया॥ ९१/२॥
वामत्वाच्चैव देवस्य वामदेवत्वमागतः।<br>तत्रापि च महासत्त्व त्वयाहं नियतात्मना॥ १०हे महासत्त्व ! उस कल्पमें भी नियत आत्मावाले आपने अपने योगबलसे लोहितवर्ण-स्थित मुझ परमेश्वरको जाना और तभीसे मैं पृथ्वीलोकमें वामदेव नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हो गया॥ १०-११॥
विज्ञातः स्वेन योगेन तस्मिन् वर्णान्तरे स्थितः।<br>ततश्च वामदेवेति ख्यातिं यातोऽस्मि भूतले ॥ ११