श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| १०४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो वातपित्तकफात्मकाः।<br>महाभागा महासत्त्वाः स्वस्तिकैरप्यलङ्कृताः॥ १९ | युक्त उन ब्रह्माके दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी बूँदें गिरने लगीं॥ १७-१८॥<br><br>तत्पश्चात् उन अश्रुबिन्दुओंसे वात-पित्त-कफयुक्त, महान् सत्त्वसे सम्पन्न, महाभाग्यशाली तथा महाविषधर सर्प उत्पन्न हुए। वे स्वस्तिक चिह्नसे विभूषित थे तथा उनके केश फैले हुए थे॥ १९ १/२॥ |
| प्रकीर्णकेशाः सर्पास्ते प्रादुर्भूता महाविषाः।<br>सर्पांस्तानग्रजान् दृष्ट्वा ब्रह्मात्मानमनिन्दयत्॥ २० | उन सर्पोंको पहले उत्पन्न हुआ देखकर ब्रह्माजीको बड़ी आत्मग्लानि हुई। वे अपनी भर्त्सना करते हुए कहने लगे—'अहो, मुझे धिक्कार है। मेरी तपस्याका मुझे यही फल प्राप्त हुआ कि आरम्भमें ही मेरी लोकविनाशक सर्परूप प्रजा उत्पन्न हुई'॥ २०-२१॥ |
| अहो धिक् तपसो मह्यं फलमीदृशकं यदि।<br>लोकवैनाशिकी जज्ञे आदावेव प्रजा मम॥ २१ | |
| तस्य तीव्राभवन्मूर्च्छा क्रोधामर्षसमुद्भवा।<br>मूर्च्छाभिपरितापेन जहौ प्राणान् प्रजापतिः॥ २२ | अत्यधिक क्रोध तथा अधीरतासे युक्त होनेके कारण ब्रह्माजीको तीव्र मूर्च्छा उत्पन्न हुई और उस मूर्च्छासे आक्रान्त पितामहने अपने प्राण त्याग दिये॥ २२॥ |
| तस्याप्रतिमवीर्यस्य देहात्कारुण्यपूर्वकम्।<br>अथैकादश ते रुद्रा रुदन्तोऽभ्यक्रमंस्तथा॥ २३ | इसके पश्चात् अप्रतिम वीर्यवाले उन ब्रह्माके देहसे दीनभावसे कारुण्यपूर्वक ग्यारह रुद्र रोते हुए निकले। रुदन करनेके कारण ही उनका नाम रुद्र पड़ा॥ २३ १/२॥ |
| रोदनात्खलु रुद्रत्वं तेषु वै समजायत।<br>ये रुद्रास्ते खलु प्राणाः ये प्राणास्ते तदात्मकाः॥ २४ | जो रुद्र हैं, वे ही प्राणरूप हैं तथा जो प्राण हैं, वे उन्हीं रुद्रके आत्मारूप हैं। सभी प्राणियोंमें स्थित उन रुद्रोंको ही जीवोंके प्राणरूपमें जानना चाहिये॥ २४ १/२॥ |
| प्राणाः प्राणवतां ज्ञेयाः सर्वभूतेष्ववस्थिताः।<br>अत्युग्रस्य महत्त्वस्य साधुराचरितस्य च॥ २५ | नीललोहित त्रिशूलधारी शिवजीने अत्यन्त उग्र स्वभाववाले, महिमाशाली तथा उत्तम आचरणवाले उन ब्रह्माको पुनः उनके प्राण प्रदान कर दिये॥ २५ १/२॥ |
| प्राणांस्तस्य ददौ भूयस्त्रिशूली नीललोहितः।<br>लब्ध्वासून् भगवान् ब्रह्मा देवदेवमुमापतिम्॥ २६ | तत्पश्चात् प्राण प्राप्तकर भगवान् ब्रह्माने खड़े होकर देवाधिदेव उमापतिको प्रणामकर गायत्रीके ध्यानसे विश्वरूप परमात्मा शिवको वहाँ देखा॥ २६ १/२॥ |
| प्रणम्य संस्थितोऽपश्यद् गायत्र्या विश्वमीश्वरम्।<br>सर्वलोकमयं देवं दृष्ट्वा स्तुत्वा पितामहः॥ २७ | समस्त लोकोंमें व्याप्त रहनेवाले महादेवको देखकर ब्रह्माजीने उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् उन्होंने आश्चर्यचकित होकर शिवजीको बार-बार प्रणामकर उनसे पूछा—हे विभो! 'सद्योजात' आदि रूपमें आपका प्रादुर्भाव क्यों हुआ?॥ २७-२८॥ |
| ततो विस्मयमापन्नः प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः।<br>उवाच वचनं शर्वं सद्यादित्वं कथं विभो॥ २८ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे रुद्रोत्पत्तिवर्णनं नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः ॥ २२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'रुद्रोत्पत्तिवर्णन' नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २२ ॥