श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २२ ] महादेवजीद्वारा विष्णु और ब्रह्माको वरदान···रुद्रोंकी सृष्टि [ १०३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उवाच भगवान् देवो मधुरं श्लक्ष्णया गिरा।<br>भो भो हिरण्यगर्भ त्वां त्वां च कृष्ण ब्रवीम्यहम्॥ ७<br>प्रीतोऽहमनया भक्त्या शाश्वताक्षरयुक्तया।<br>भवन्तौ हृदयस्यास्य मम हृद्यतरावुभौ॥ ८ | उन दोनोंकी वह बात सुनकर भगवान् शंकर प्रसन्न होकर सम्मानपूर्वक कोमल वाणीमें धीरेसे बोले—हे हिरण्यगर्भ! हे कृष्ण! मैं आप दोनोंको बता रहा हूँ कि मैं आपकी इस शाश्वत तथा दृढ़ भक्तिसे प्रसन्न हूँ॥ ६-७ १/२॥<br><br>आप दोनों लोगोंके प्रति मेरे हृदयमें अपार प्रेम है। मैं आज आपलोगोंको श्रेष्ठ तथा मनोवांछित कौन-सा वर प्रदान करूँ?॥ ८ १/२॥ |
| युवाभ्यां किं ददाम्यद्य वराणां वरमीप्सितम्।<br>अथोवाच महाभागो विष्णुर्भवमिदं वचः॥ ९<br>सर्वं मम कृतं देव परितुष्टोऽसि मे यदि।<br>त्वयि मे सुप्रतिष्ठा तु भक्तिर्भवतु शङ्कर॥ १० | तदनन्तर महाभाग विष्णुने रुद्रसे यह वचन कहा—हे देव! मेरा यही सर्व अभीष्ट है कि यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो हे शंकर! मुझे अपने प्रति अचल भक्ति प्रदान कीजिये॥ ९-१०॥ |
| एवमुक्तस्तु विज्ञाय सम्भावयत केशवम्।<br>प्रददौ च महादेवो भक्तिं निजपदाम्बुजे॥ ११ | विष्णुके ऐसा कहनेपर महादेवने विष्णुभगवान्को स्नेहपूर्वक अपने चरणकमलोंमें स्थिर भक्ति प्रदान की॥ ११॥ |
| भवान् सर्वस्य लोकस्य कर्ता त्वमधिदैवतम्।<br>तदेवं स्वस्ति ते वत्स गमिष्याम्यम्बुजेक्षण॥ १२<br>एवमुक्त्वा तु भगवान् ब्रह्माणं चापि शङ्करः।<br>अनुगृह्यास्पृशद्देवो ब्रह्माणं परमेश्वरः॥ १३<br>कराभ्यां सुशुभाभ्यां च प्राह हृष्टतरः स्वयम्।<br>मत्समस्त्वं न सन्देहो वत्स भक्तश्च मे भवान्॥ १४<br>स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि संज्ञा भवतु सुव्रत। | तत्पश्चात् भगवान् शंकरने ब्रह्माजीसे कहा—हे कमलनयन! आप समस्त लोकके कर्ता हैं तथा आप ही अधिष्ठातृ देवता हैं। अतः हे वत्स! आपका कल्याण हो। मैं तो अब प्रस्थान करूँगा। ब्रह्माजीसे इस प्रकार कहकर भगवान् शंकरने अपने दोनों पवित्र हाथोंसे अनुग्रहपूर्वक ब्रह्माजीका स्पर्श किया। पुनः उन परमेश्वर शंकरने प्रसन्न मनसे ब्रह्मासे स्वयं कहा—आप भी मेरे ही तुल्य हैं; इसमें सन्देह नहीं है। हे वत्स! आप मेरे भक्त हैं। आपका कल्याण हो और आपको यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो। हे सुव्रत! अब मैं प्रस्थान कर रहा हूँ॥ १२-१४ १/२॥ |
| एवमुक्त्वा तु भगवांस्ततोऽन्तर्धानमीश्वरः॥ १५ | इस प्रकार कहकर समस्त देवताओंके वन्दनीय, गणोंके रक्षक, परमेश्वर भगवान् महादेव अन्तर्धान हो गये॥ १५ १/२॥ |
| गतवान् गणपो देवः सर्वदेवनमस्कृतः।<br>अवाप्य संज्ञां गोविन्दात् पद्मयोनिः पितामहः॥ १६<br>प्रजाः स्रष्टुमनाश्चक्रे तप उग्रं पितामहः। | भगवान् गोविन्दसे ज्ञान प्राप्त करके पितामह ब्रह्माने प्रजाओंकी सृष्टिकी कामनासे भीषण तप करना आरम्भ कर दिया॥ १६ १/२॥ |
| तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित्समवर्तत॥ १७<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात्क्रोधो ह्यजायत।<br>क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः॥ १८ | इस प्रकार दीर्घ कालतक तपस्या करते हुए उनका जब कुछ भी सिद्ध नहीं हुआ, तब उन्हें बहुत दुःख हुआ और उस दुःखसे वे बहुत क्रोधित हो उठे। कोपसे |