भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| [ पूर्वभाग | | :---: | :---: | | १०२ | श्रीलिङ्गमहापुराण |

श्रावयेद्वा द्विजान् विद्वान् शृणुयाद्वा समाहितः।<br>अश्वमेधायुतं कृत्वा यत्फलं तदवाप्नुयात्॥ ८९होकर भक्तिपूर्वक ब्रह्मा तथा विष्णुके द्वारा की गयी इस शिवस्तुतिको कहता है, सुनता है अथवा द्विजों तथा विद्वानोंको सुनाता है; वह दस हजार अश्वमेध यज्ञ करके जो फल मिलता है, उस फलको प्राप्त कर लेता है॥ ८८-८९॥
पापाचारोऽपि यो मर्त्यः शृणुयाच्छिवसन्निधौ।<br>जपेद्वापि विनिर्मुक्तो ब्रह्मलोकं स गच्छति॥ ९०घोर पापकर्म करनेवाला जो कोई भी प्राणी शिवके समीप इस स्तुतिका पाठ करता है अथवा इसे सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकको जाता है॥ ९०॥
श्राद्धे वा दैविके कार्ये यज्ञे वावभृथान्तिके।<br>कीर्तयेद्वा सतां मध्ये स याति ब्रह्मणोऽन्तिकम्॥ ९१जो सज्जनोंके बीचमें, श्राद्धकर्ममें, देवकर्ममें, यज्ञधर्मादि अनुष्ठानोंके बाद किये जानेवाले स्नानके अनन्तर इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है॥ ९१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ब्रह्मविष्णुस्तुतिर्नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ब्रह्मविष्णुस्तुति' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २१॥


बाईसवाँ अध्याय

महादेवजीद्वारा विष्णु और ब्रह्माको वरदान, सृष्टिके लिये ब्रह्माजीद्वारा तप करना तथा सर्पों एवं रुद्रोंकी सृष्टि

सूत उवाचसूतजी बोले—
अत्यन्तावनतौ दृष्ट्वा मधुपिङ्गायतेक्षणः।<br>प्रहृष्टवदनोऽत्यर्थमभवत्सत्यकीर्तनात् ॥ १<br><br>उमापतिर्विरूपाक्षो दक्षयज्ञविनाशनः।<br>पिनाकी खण्डपरशुः सुप्रीतस्तु त्रिलोचनः॥ २[हे मुनियो!] उन ब्रह्मा तथा विष्णुको अत्यन्त विनीत भावसे सत्य स्तुति करते देखकर सुन्दर, लालिमायुक्त तथा विशाल नेत्रोंवाले उमापति, विरूपाक्ष, दक्षयज्ञके विध्वंसक, पिनाकी, खण्डपरशु धारण करनेवाले, त्रिनेत्र शिवजीका मुख प्रसन्नतासे प्रफुल्लित हो उठा और उनके मनमें उन दोनोंके प्रति अत्यधिक प्रीति उत्पन्न हुई॥ १-२॥
ततः स भगवान् देवः श्रुत्वा वागमृतं तयोः।<br>जानन्नपि महादेवः क्रीडापूर्वमथाब्रवीत्॥ ३<br><br>कौ भवन्तौ महात्मानौ परस्परहितैषिणौ।<br>समेतावम्बुजाभाक्षावस्मिन् घोरे महापल्लवे॥ ४तत्पश्चात् उन दोनोंकी अमृतमयी वाणी सुनकर उन्हें जानते हुए भी भगवान् महादेवने क्रीड़ाके निमित्त उनसे पूछा—हे महात्माद्वय! एक-दूसरेका हित चाहनेवाले, कमलकी आभाके तुल्य नेत्रोंवाले आप दोनों लोग कौन हैं तथा इस घोर महासागरमें क्यों स्थित हैं?॥ ३-४॥
तावूचतुर्महात्मानौ सन्निरीक्ष्य परस्परम्।<br>भगवन् किं तु यत्तेऽद्य न विज्ञातं त्वया विभो॥ ५<br><br>विभो रुद्र महामाय इच्छया वां कृतौ त्वया।<br>तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा अभिनन्द्याभिमान्य च॥ ६महादेवके ऐसा पूछनेपर एक-दूसरेकी ओर देखकर महात्मा ब्रह्मा तथा विष्णु बोले—हे भगवन्! हे विभो! हे रुद्र! हे महामाय! क्या आज आपको विदित नहीं है कि आपने ही अपनी इच्छासे हम दोनोंको उत्पन्न किया है?॥ ५ १/२॥