भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २१ ] ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य १०१


कवची पट्टिशी खड्गी धनुर्हस्तः परश्वधी।<br>अघस्मरोऽनघः शूरो देवराजोऽरिमर्दनः ॥ ८१करनेवाले), छत्री (छत्र धारण करनेवाले), पिनाकी (धनुर्धर), ध्वजिनीपति (सेनापति), कवची (कवच धारण करनेवाले), पट्टिशी (एक प्रकारका तीक्ष्ण लौह-दण्डरूप शस्त्र धारण करनेवाले), खड्गी (तलवार धारण करनेवाले), धनुर्हस्त (हाथमें धनुष धारण करनेवाले), परश्वधी (परशु धारण करनेवाले), अघस्मर (सबके पापकर्मोंको स्मृतिमें रखनेवाले), निष्पाप, पराक्रमी, देवताओंके स्वामी तथा शत्रुओंका संहार करनेवाले सब कुछ आप ही हैं॥ ७६—८१॥
त्वां प्रसाद्य पुरास्माभिर्द्विषन्तो निहता युधि।<br>अग्निः सदार्णवाम्भस्त्वं पिबन्नपि न तृप्यसे ॥ ८२पूर्वकालमें आपको प्रसन्न करके हम देवताओंने अपने शत्रुओंका युद्धमें संहार किया था। अग्निरूप आप सदा महासागरका जल पीते हुए भी कभी तृप्त नहीं होते हैं॥ ८२॥
क्रोधाकारः प्रसन्नात्मा कामदः कामगः प्रियः।<br>ब्रह्मचारी चागाधश्च ब्रह्मण्यः शिष्टपूजितः॥ ८३<br><br>देवानामक़्षयः कोशस्त्वया यज्ञः प्रकल्पितः।<br>हव्यं तवेदं वहति वेदोक्तं हव्यवाहनः।<br>प्रीते त्वयि महादेव वयं प्रीता भवामहे॥ ८४आप क्रोधमय भावाकृतिवाले, प्रसन्न आत्मावाले, मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले, अपनी इच्छासे विचरण करनेवाले, प्रिय, ब्रह्मचारी, दुस्तर, ब्रह्मण्य, शिष्टजनोंद्वारा पूजित तथा देवताओंकी अक्षय निधि हैं। आपने ही यज्ञोंका विधान किया है। अग्निदेव आपके ही वेदोक्त हव्यका वहन करते हैं। हे महादेव! आपके प्रसन्न होनेपर हम देवतालोग प्रसन्न हो जाते हैं॥ ८३-८४॥
भवानीशोऽनादिमांस्त्वं च सर्व-<br>लोकानां त्वं ब्रह्मकर्तादिसर्गः।<br>सांख्याः प्रकृतेः परं त्वां विदित्वा<br>क्षीणध्यानास्त्वाममृतं विशन्ति ॥ ८५आप भवानीके ईश हैं तथा आदिसे रहित हैं। सभी लोकोंके ब्रह्मरूप कर्ता आप ही हैं। आप ही आदि सृष्टि हैं। क्षीण ध्यानवाले सांख्यशास्त्री आपको प्रकृतिसे परे जानकर अमृतरूप आपको ही प्राप्त होते हैं॥ ८५॥
योगाच्च त्वां ध्यायिनो नित्यसिद्धं<br>ज्ञात्वा योगान् सन्त्यजन्ते पुनस्तान्।<br>ये चाप्यन्ये त्वां प्रसन्ना विशुद्धाः<br>स्वकर्मभिस्ते दिव्यभोगा भवन्ति॥ ८६ध्यानपरायण योगी अपने योगबलसे नित्य-सिद्ध आपको जानकर पुनः उन योगोंका परित्याग कर देते हैं। और भी अन्य जो प्रसन्नचित्त तथा विशुद्ध मनवाले लोग हैं, वे अपने उत्तम कर्मोंके द्वारा आपको जानकर दिव्य भोगोंकी प्राप्ति करते हैं॥ ८६॥
अप्रसङ्ख्येयतत्त्वस्य यथा विद्मः स्वशक्तितः।<br>कीर्तितं तव माहात्म्यमपारस्य महात्मनः॥ ८७<br><br>शिवो नो भव सर्वत्र योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते।गणनातीत तत्त्वोंवाले तथा सीमारहित आप महात्माका जैसा माहात्म्य हम जानते हैं, वैसा अपनी सामर्थ्यके अनुसार हमने कह दिया। आप हमारे लिये सर्वत्र कल्याणकारी हों। आप जो कुछ भी हैं, आपको नमस्कार है॥ ८७ १/२॥
सूत उवाच<br>य इदं कीर्तयेद्भक्त्या ब्रह्मन्नारायणस्तवम्॥ ८८सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] जो प्राणी एकाग्र