भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 102
१००श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रक्षा करनेवाले, दीप्त तथा सगुणरूप शिवको नमस्कार है॥ ६८-६९ ॥
वामप्रियाय वामाय चूडामणिधराय च।<br>नमस्तोकाय तनवे गुणैरप्रमिताय च॥ ७०वामभागमें अपनी प्रिया गौरीसे विभूषित, सुन्दर, चूड़ामणि धारण करनेवाले, बालरूप विग्रहवाले तथा अप्रमेय गुणोंसे सम्पन्न शिवको नमस्कार है॥ ७०॥
नमो गुण्याय गुह्याय अगम्यगमनाय च।<br>लोकधात्री त्वियं भूमिः पादौ सज्जनसेवितौ॥ ७१<br><br>सर्वेषां सिद्धियोगानामधिष्ठानं तवोदरम्।<br>मध्येऽन्तरिक्षं विस्तीर्णं तारागणविभूषितम्॥ ७२<br><br>स्वातेः पथ इवाभाति श्रीमान् हारस्तवोरसि।<br>दिशो दशभुजास्तुभ्यं केयूराङ्गदभूषिताः॥ ७३सद्गुणोंसे युक्त, निगूढ़ तथा अगम्य गतिवाले शिवको नमस्कार है। सदाचारीजनोंद्वारा सेवित आपके दोनों चरण लोकधात्री इस पृथ्वीके तुल्य हैं। सभी सिद्धियों तथा योगोंका अधिष्ठानस्वरूप मध्यस्थित आपका उदर तारासमूहोंसे विभूषित विस्तृत अन्तरिक्षके समान है। आपके वक्षःस्थलपर शोभायमान श्रीयुक्त हार तारापुंजोंके मार्गकी भाँति प्रतीत होता है। केयूर तथा अंगदसे विभूषित आपके दस हाथ दसों दिशाओंके तुल्य हैं॥ ७१–७३॥
विस्तीर्णपरिणाहश्च नीलाञ्जनचयोपमः।<br>कण्ठस्ते शोभते श्रीमान् हेमसूत्रविभूषितः॥ ७४<br><br>दंष्ट्रा करालं दुर्धर्षमनौपम्यं मुखं तथा।<br>पद्ममालाकृतोष्णीषं शिरो द्यौः शोभतेऽधिकम्॥ ७५नीले अंजनके समूहके तुल्य विस्तृत परिधिवाला आपका श्रीयुक्त कण्ठ स्वर्णसूत्रसे सुशोभित है। विकराल दाँतोंवाला आपका मुख अत्यन्त भयावह तथा अनुपमेय है। पद्ममाला तथा पगड़ीसे शोभायमान आपका सिर आकाशकी भाँति अत्यधिक शोभाको प्राप्त हो रहा है॥ ७४-७५॥
दीप्तिः सूर्ये वपुश्चन्द्रे स्थैर्यं शैलेऽनिले बलम्।<br>औष्ण्यमग्नौ तथा शैत्यमप्सु शब्दोऽम्बरे तथा॥ ७६<br><br>अक्षरान्तरनिष्पन्दाद् गुणानेतान् विदुर्बुधाः।<br>जपो जप्यो महादेवो महायोगो महेश्वरः॥ ७७<br><br>पुरेशयो गुहावासी खेचरो रजनीचरः।<br>तपोनिधिर्गुहगुरुर्नन्दनो नन्दवर्धनः॥ ७८<br><br>हयशीर्षा पयोधाता विधाता भूतभावनः।<br>बोद्धव्यो बोधिता नेता दुर्धर्षो दुष्प्रकम्पनः॥ ७९<br><br>बृहद्रथो भीमकर्मा बृहत्कीर्तिर्धनञ्जयः।<br>घण्टाप्रियो ध्वजी छत्री पिनाकी ध्वजिनीपतिः॥ ८०सूर्यमें प्रकाश, चन्द्रमामें कान्ति, पर्वतमें स्थिरता, वायुमें शक्ति, अग्निमें उष्णता, जलमें शीतलता तथा आकाशमें शब्दरूप विद्यमान—ये गुण अविनाशी शिवके निष्पन्द अर्थात् अल्पांशसे उत्पन्न हुए हैं—ऐसा मनीषी लोग मानते हैं। जप, जप्य, महादेव, महायोग, महेश्वर, पुरेशय, गुहावासी (गुफामें निवास करनेवाले), खेचर (आकाशमें विचरणशील), रजनीचर (रात्रिमें भ्रमण करनेवाले), तपोनिधि, कार्तिकेयके गुरु, आनन्दरूप, आनन्दकी वृद्धि करनेवाले, हयशीर्ष (घोड़ेके सिरवाले विष्णुरूप), पयोधाता (जल धारण करनेवाले इन्द्ररूप), विधाता (ब्रह्मारूप), भूतभावन, बोद्धव्य (बोध करनेयोग्य), बोधिता (बोध करानेवाले), नेता, दुर्धर्ष (अपराजेय), दुष्प्रकम्पन, बृहद्रथ (विशाल रथवाले), भीमकर्मा (भयंकर कर्मवाले), बृहत्कीर्ति (महान् यशवाले), धनंजय, घण्टाप्रिय, ध्वजी (ध्वज धारण