भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय २१ ] ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य ९९


श्लोकअर्थ
पूषदन्तविनाशाय भग्ननेत्रान्तकाय च।<br>कामदाय वरिष्ठाय कामाङ्गदहनाय च॥ ५८<br><br>रङ्गे करालवक्त्राय नागेन्द्रवदनाय च।<br>दैत्यानामन्तकेशाय दैत्याक्रन्दकराय च॥ ५९<br><br>हिमघ्नाय च तीक्ष्णाय आर्द्रचर्मधराय च।<br>श्मशानरतिनित्याय नमोऽस्तूल्यूकधारिणे॥ ६०धारण करनेवाले, धनुर्धर, कुठार धारण करनेवाले, दक्षके यज्ञमें पूषानामक देवताका दाँत तोड़नेवाले तथा भग नामक देवताको नेत्रविहीन करनेवाले, मनोरथ पूर्ण करनेवाले, वरिष्ठ, कामदेवका शरीर दग्ध करनेवाले, रणभूमिमें विकराल वक्त्रवाले, गजाननरूप, दैत्योंके संहारक हम ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंके भी स्वामी, दैत्योंको क्रन्दित करनेवाले, शीतका निवारण करनेवाले, तीक्ष्ण रूपवाले, मृदुचर्म धारण करनेवाले, नित्य श्मशानसे अनुराग रखनेवाले तथा हाथमें प्रज्वलित काष्ठ धारण करनेवाले भगवान् शिवको नमस्कार है॥ ५६—६०॥
नमस्ते प्राणपालाय मुण्डमालाधराय च।<br>प्रहीणशोकैर्विविधैर्भूतैः परिवृताय च॥ ६१<br><br>नरनारीशरीराय देव्याः प्रियकराय च।<br>जटिने मुण्डिने चैव व्यालयज्ञोपवीतिने॥ ६२<br><br>नमोऽस्तु नृत्यशीलाय उपनृत्यप्रियाय च।<br>मन्यवे गीतशीलाय मुनिभिर्गीयते नमः॥ ६३प्रिय भक्तोंका पालन करनेवाले, मुण्डकी माला धारण करनेवाले, शोकरहित, अनेकविध भूतोंसे घिरे रहनेवाले शिवको नमस्कार है। नर-नारीका विग्रह धारण करनेवाले (अर्धनारीश्वर), देवी पार्वतीका सदा प्रिय करनेवाले, जटाधारी, मुण्डी, सर्पोंका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले, नृत्यमें अभिरुचि रखनेवाले, नृत्यशालाके प्रति प्रीति रखनेवाले, क्रोधरूप, गीतप्रिय तथा मुनियोंके द्वारा स्तुत्य शिवको नमस्कार है॥ ६१—६३॥
कटङ्कटाय तिग्माय अप्रियाय प्रियाय च।<br>विभीषणाय भीष्माय भगप्रमथनाय च॥ ६४<br><br>सिद्धसङ्घानुगीताय महाभागाय वै नमः।<br>नमो मुक्ताट्टहासाय क्ष्वेडितास्फोटिताय च॥ ६५हाथीका मस्तक काटनेवाले अर्थात् सिंहरूप, तीक्ष्ण, अप्रिय, प्रिय, अति भयानक, प्रचण्ड, भगका प्रमथन करनेवाले, सिद्धसमुदायद्वारा नित्य अनुगीत महाभागको नमस्कार है। मुक्तरूपसे अट्टहास करनेवाले, क्रोधावस्थामें सिंहगर्जना करके प्रकम्पित शरीरवाले शिवको नमस्कार है॥ ६४-६५॥
नर्दते कूर्दते चैव नमः प्रमुदितात्मने।<br>नमो मृडाय श्वसते धावतेऽधिष्ठिते नमः॥ ६६<br><br>ध्यायते जृम्भते चैव रुदते द्रवते नमः।<br>वल्गते क्रीडते चैव लम्बोदरशरीरिणे॥ ६७तीव्र नाद करनेवाले, कूदने-फाँदनेवाले तथा प्रमुदित आत्मावाले शिवको नमस्कार है। श्वास लेनेवाले, दौड़नेवाले, अधिष्ठाता तथा आनन्दरूप शिवको नमस्कार है। ध्यान करनेवाले, जम्भाई लेनेवाले, रुदन करनेवाले तथा द्रवित होनेवाले शिवको नमस्कार है। छलाँग लगानेवाले, क्रीड़ा करनेवाले तथा लम्बे उदरयुक्त शरीरवाले शिवको नमस्कार है॥ ६६-६७॥
नमोऽकृत्याय कृत्याय मुण्डाय विकटाय च।<br>नम उन्मत्तदेहाय किङ्किणीकाय वै नमः॥ ६८<br><br>नमो विकृतवेषाय क्रूरायामर्शणाय च।<br>अप्रमेयाय गोप्त्रे च दीप्तायानिर्गुणाय च॥ ६९विधि-निषेधरूप (कृत्य-अकृत्य), मुण्ड, विकटरूप शिवको नमस्कार है। उन्मत्त देहवाले तथा किंकिणीसे शोभायमान शरीरवाले शिवको नमस्कार है। विकृत वेष धारण करनेवाले, क्रूर, कोपाविष्ट, अप्रमेय,
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