श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ९८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नमस्ते सविशेषाय निर्विशेषाय वै नमः।<br>नम ईज्याय पूज्याय उपजीव्याय वै नमः॥ ४५ | विशेषतारहित शिवको नमस्कार है। ईज्य, पूज्य तथा उपजीव्यको नमस्कार है॥ ४४-४५॥ |
| नमः क्षेम्याय वृद्धाय वत्सलाय नमो नमः।<br>नमो भूताय सत्याय सत्यासत्याय वै नमः॥ ४६<br><br>नमो वै पद्मवर्णाय मृत्युघ्नाय च मृत्यवे।<br>नमो गौराय श्यामाय कद्रवे लोहिताय च॥ ४७ | क्षेम्य, वृद्ध, वत्सलको बार-बार नमस्कार है। भूत, सत्य तथा सत्य-असत्यरूप शिवको नमस्कार है। पद्मवर्ण, मृत्युके विनाशक तथा मृत्युरूप शिवको नमस्कार है। गौर, श्याम, कद्रू (भूरावर्ण) तथा लोहितवर्ण शिवको नमस्कार है॥ ४६-४७॥ |
| महासन्ध्याभ्रवर्णाय चारुदीप्ताय दीक्षिणे।<br>नमः कमलहस्ताय दिग्वासाय कपर्दिने॥ ४८<br><br>अप्रमाणाय सर्वाय अव्ययायामराय च।<br>नमो रूपाय गन्धाय शाश्वतायाक्षताय च॥ ४९ | महासन्ध्याकालीन बादलोंके समान वर्णवाले, सुन्दर दीप्तिवाले, दीक्षा प्रदान करनेवाले, हाथमें कमल धारण करनेवाले, दिग्वास (दिशाओंमें वास करनेवाले अथवा दिगम्बर) तथा जटाजूटधारी शिवको नमस्कार है। अप्रमाणरूप (इयत्तारहित), समग्ररूप, अव्यय, मरणरहित, रूप, गन्ध, नित्य तथा अविनाशी शिवको नमस्कार है॥ ४८-४९॥ |
| पुरस्ताद् बृंहते चैव विभ्रान्ताय कृताय च।<br>दुर्गमाय महेशाय क्रोधाय कपिलाय च॥ ५०<br><br>तर्क्यातर्क्यशरीराय बलिने रंहसाय च।<br>सिकत्याय प्रवाह्याय स्थिताय प्रसृताय च॥ ५१<br><br>सुमेधसे कुलालाय नमस्ते शशिखण्डिने।<br>चित्राय चित्रवेषाय चित्रवर्णाय मेधसे॥ ५२ | उपस्थित होकर पालन-पोषण करनेवाले, अस्थिर, कर्मरूप, दुर्गम, महेश, क्रोधरूप, कपिल, तर्क-अतर्कसे परे विग्रहवाले, बलवान्, वेगरूप, बालुकामोंमें विराजमान, प्रवाहरूप, स्थित, व्यापक, उत्तम मेधासम्पन्न, पृथिवीका लालन-पालन करनेवाले, चन्द्रकला धारण करनेवाले, चित्ररूप, विचित्र वेष धारण करनेवाले, विचित्र वर्णवाले तथा यज्ञरूप शिव आपको नमस्कार है॥ ५०-५२॥ |
| चेकितानाय तुष्टाय नमस्ते निहिताय च।<br>नमः क्षान्ताय दान्ताय वज्रसंहननाय च॥ ५३ | चेकितान (विशिष्ट ज्ञानवाले), संतोषरूप तथा निहित (अत्यन्त हितकारक) आपको नमस्कार है। क्षमाशील, इन्द्रियजित् तथा वज्रके समान आघात करनेवाले शिवको नमस्कार है॥ ५३॥ |
| रक्षोघ्नाय विषघ्नाय शितिकण्ठोर्ध्वमन्यवे।<br>लेलिहाय कृतान्ताय तिग्मायुधधराय च॥ ५४<br><br>प्रमोदाय सम्मोदाय यतिवेद्याय ते नमः।<br>अनामयाय सर्वाय महाकालाय वै नमः॥ ५५ | राक्षसोंका विनाश करनेवाले, विषका शमन करनेवाले, शुभ्र ग्रीवावाले, क्रुद्ध प्रतीत होते हुए भी सौम्य रूपवाले, सर्परूप, यमराजस्वरूप, तीक्ष्ण शस्त्र धारण करनेवाले, आनन्दस्वरूप, मोदसदृश, संन्यासियोंके द्वारा ज्ञेय आप शिवको नमस्कार है। रोगविकारसे रहित, सर्वरूप महाकालको नमस्कार है॥ ५४-५५॥ |
| प्रणवप्रणवेशाय भगनेत्रान्तकाय च।<br>मृगव्याधाय दक्षाय दक्षयज्ञान्तकाय च॥ ५६<br><br>सर्वभूतात्मभूताय सर्वेशातिशयाय च।<br>पुरघ्नाय सुशस्त्राय धन्विनेऽथ परश्वधे॥ ५७ | ओंकार, ओंकारेश्वर, भग नामक देवताके नेत्रका नाश करनेवाले, मृगव्याधरूप, दक्षरूप, दक्षप्रजापतिके यज्ञका विध्वंस करनेवाले, सभी प्राणियोंके आत्मस्वरूप, सर्वेश्वर, अतिशयरूप, त्रिपुरके संहर्ता, सुन्दर शस्त्र |