श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय २१ ] ब्रह्मा तथा विष्णुद्वारा की गयी भगवान् महेश्वरकी स्तुति एवं उसका माहात्म्य ९७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नमोऽस्त्विष्टाय पूर्ताय अग्निष्टोमद्विजाय च।<br>सदस्याय नमश्चैव दक्षिणावभृथाय च॥ ३२<br><br>अहिंसायाप्रलोभाय पशुमन्त्रौषधाय च।<br>नमः पुष्टिप्रदानाय सुशीलाय सुशीलिने॥ ३३ | इष्ट (यज्ञकर्म आदि), पूर्त (कूप-तड़ागादि-निर्माण), अग्निष्टोमद्विजरूप शिवको नमस्कार है। सदस्यरूप, दक्षिणारूप तथा अवभृथ (यज्ञकी समाप्तिके अनन्तर शुद्धिके लिये किये जानेवाले स्नान)-रूप शिवको नमस्कार है। अहिंसा-अप्रलोभ-पशुमन्त्रौषधरूप, पुष्टिप्रदायक, सुशील तथा सदाचारीको नमस्कार है॥ ३२-३३॥ |
| अतीताय भविष्याय वर्तमानाय ते नमः।<br>सुवर्चसे च वीर्याय शूराय ह्यजिताय च॥ ३४<br><br>वरदाय वरेण्याय पुरुषाय महात्मने।<br>नमो भूताय भव्याय महते चाभयाय च॥ ३५ | अतीत, भविष्य तथा वर्तमानकालरूप अर्थात् सर्वकालव्यापी शिवको नमस्कार है। सुवर्चा (महान् शक्तिमान्), वीर्य, शूर, अजित, वरद, वरेण्य, पुरुष, महात्मा, भूत, भव्य, महत् तथा अभयरूप शिवको नमस्कार है॥ ३४-३५॥ |
| जरासिद्ध नमस्तुभ्यमयसे वरदाय च।<br>अधरे महते चैव नमः सस्तुपताय च॥ ३६ | जरासिद्ध (नित्य तरुणरूप), सुवर्णरूप तथा वरदानी शिव आपको नमस्कार है। अधोरूप, महानीरूप तथा निद्रितोंके पतिको नमस्कार है॥ ३६॥ |
| नमश्चेन्द्रियपत्राणां लेलिहानाय स्रग्विणे।<br>विश्वाय विश्वरूपाय विश्वतः शिरसे नमः॥ ३७<br><br>सर्वतः पाणिपादाय रुद्रायप्रतिमाय च।<br>नमो हव्याय कव्याय हव्यवाहाय वै नमः॥ ३८ | इन्द्रियरूप वाहनवाले, आस्वादनरूप, हार धारण करनेवाले, विश्व, विश्वरूप तथा सभी ओरसे सिरवाले शिवको नमस्कार है। सभी दिशाओंमें हाथों तथा पैरोंवाले, अप्रतिम, हव्य, कव्य तथा हव्यवाहरूप रुद्रको नमस्कार है॥ ३७-३८॥ |
| नमः सिद्धाय मेध्याय इष्टायेज्ज्यापराय च।<br>सुवीराय सुघोराय अक्षोभ्यक्षोभणाय च॥ ३९<br><br>सुप्रजाय सुमेधाय दीप्ताय भास्कराय च।<br>नमो बुद्धाय शुद्धाय विस्तृताय मताय च॥ ४० | सिद्ध, पवित्रात्मा, यज्ञरूप, यज्ञपरायण, सुवीर, सुघोर, अक्षोभ्यका भी क्षोभण करनेवाले, सुन्दर प्रजाओंवाले, तीव्र मेधावाले, दीप्त, भास्कर, बुद्ध, शुद्ध, प्रतिष्ठित तथा विस्तृत शिवको नमस्कार है॥ ३९-४०॥ |
| नमः स्थूलाय सूक्ष्माय दृश्यादृश्याय सर्वशः।<br>वर्षते ज्वलते चैव वायवे शिशिराय च॥ ४१<br><br>नमस्ते वक्रकेशाय ऊरुवक्षःशिखाय च।<br>नमो नमः सुवर्णाय तपनीयनिभाय च॥ ४२ | स्थूल, सूक्ष्म, दृश्य, अदृश्य, वृष्टि, ताप, वायु तथा शिशिर (ठंड)-रूप शिवको नमस्कार है। वक्रकेश (टेढ़े बालोंवाले) तथा उन्नत ऊरुप्रदेश एवं वक्षःस्थलवाले शिवको नमस्कार है। सुन्दर वर्णवाले तथा तप्त स्वर्णके तुल्य आभावाले शिवको बार-बार नमस्कार है॥ ४१-४२॥ |
| विरूपाक्षाय लिङ्गाय पिङ्गलाय महौजसे।<br>वृष्टिघ्नाय नमश्चैव नमः सौम्येक्षणाय च॥ ४३ | विरूपाक्ष, लिङ्गरूप, पिंगल, महान् ओजसे सम्पन्न, वृष्टिका अवरोध करनेवाले तथा सौम्य दृष्टिवाले शिवको नमस्कार है, नमस्कार है॥ ४३॥ |
| नमो धूम्राय श्वेताय कृष्णाय लोहिताय च।<br>पिशिताय पिशाङ्गाय पीताय च निष्डिङ्गिणे॥ ४४ | धूम्र, श्वेत, कृष्ण, लोहित, पिशित, पिशंग तथा पीतरूप धनुर्धर शिवको नमस्कार है। विशेषतायुक्त तथा |