श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १ ] भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा ५७३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| सभी ओरसे फटकारते हुए तथा वहाँसे हटाते हुए प्रसन्नचित्त होकर वहाँ स्थित हो गये। तत्पश्चात् ब्रह्मा तथा अन्य देवताओंके साथ हमसब वहाँसे निकल गये॥ ६७–७१ १/२ ॥ | |
| सर्वे वयं हि निर्याताः सार्धं वै ब्रह्मणा सुरैः।<br>तस्मिन् क्षणे समाहूतस्तुम्बरुर्मु निसत्तमः॥ ७२<br>प्रविवेश समीपं वै देव्या देवस्य चैव हि।<br>तत्रासीनो यथायोगं नानामूर्च्छासमन्वितम् ॥ ७३<br>जगौ कलपदं हृष्टो विपञ्चीं चाभ्यवादयत्।<br>नानारत्नसमायुक्तैर्दिव्यैराभरणोत्तमैः ॥ ७४<br>दिव्यमाल्यैस्तथा शुभ्रैः पूजितो मुनिसत्तमः।<br>निर्गतस्तुम्बरुर्हृष्टो अन्ये च ऋषयः सुराः॥ ७५ | उसी समय मुनिश्रेष्ठ तुम्बुरु बुलाये गये और उन्होंने भगवान् विष्णु तथा देवी लक्ष्मीके समीप प्रवेश किया। वहाँ आसीन होकर वे प्रसन्नतापूर्वक नानाविध मूर्च्छनाओंसे युक्त मधुर पदोंका सम्यक् प्रकारसे गान करने लगे तथा वीणा बजाने लगे। तत्पश्चात् अनेक प्रकारके रत्नजटित दिव्य तथा श्रेष्ठ आभूषणों एवं दिव्य तथा मनोहर हारोंसे पूजित होकर मुनिश्रेष्ठ तुम्बुरु प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे निकल आये। हे शत्रुदमन! उन्हें यथोचित रूपसे पूजित होते हुए देखकर अन्य ऋषि एवं देवतागण उनकी प्रशंसा करने लगे॥ ७२–७५ १/२ ॥ |
| दृष्ट्वा सम्पूजितं यान्तं यथायोगमरिन्दम।<br>नारदोऽथ मुनिर्दृष्ट्वा तुम्बरोः सत्क्रियां हरेः ॥ ७६<br>शोकाविष्टेन मनसा सन्तप्तहृदयेक्षणः।<br>चिन्तामापेदिवांस्तत्र शोकमूर्च्छाकुलात्मकः ॥ ७७<br>केनाहं हि हरेर्यास्ये योगं देवीसमीपतः।<br>अहो तुम्बरुणा प्राप्तं धिङ्मां मूढं विचेतसम् ॥ ७८<br>योऽहं हरेः संनिकाशं भूतैर्निर्यातितः कथम्।<br>जीवन् यास्यामि कुत्राहमहो तुम्बरुणा कृतम् ॥ ७९ | तब भगवान् श्रीहरिके द्वारा गन्धर्व तुम्बुरुके प्रति किये गये सत्कारको देखकर सन्तप्त हृदय तथा नेत्रोंवाले एवं शोक तथा मूर्छासे व्याकुल चित्तवाले नारदमुनि चिन्तित हो उठे। वे शोकाविष्ट मनसे सोचने लगे कि मैं किस प्रकारसे श्रीहरिका सान्निध्य तथा देवी लक्ष्मीका सामीप्य प्राप्त करूँगा; अहो, तुम्बुरुने इसे प्राप्त कर लिया है। मुझ मूर्ख तथा विवेकहीनको धिक्कार है! मैं गणाधिपोंके द्वारा श्रीहरिके पाससे क्यों निकाल दिया गया; अब मैं जीवन धारण करते हुए कहाँ जाऊँगा ? अहो, तुम्बुरुने ही ऐसा कर डाला है ! ॥ ७६–७९ ॥ |
| इति सञ्चिन्तयन् विप्रस्तप आस्थितवान् मुनिः।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु निरुच्छ्वाससमन्वितः ॥ ८०<br>ध्यायन् विष्णुमथाध्यास्ते तुम्बरोः सत्क्रियां स्मरन्।<br>रोदमानो मुहुर्विद्वान् धिङ्मामिति च चिन्तयन् ॥ ८१ | ऐसा सोचते हुए विप्र नारद तपमें स्थित हो गये। विद्वान् मुनि नारद भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए, तुम्बुरुके सत्कारका स्मरण करते हुए, बार-बार विलाप करते हुए और 'मुझे धिक्कार है'—ऐसा सोचते हुए [प्राणायामके द्वारा] श्वास रोककर एक हजार दिव्य वर्षोंतक [तपस्यामें] बैठे रहे ॥ ८०–८१ ॥ |
| तत्र यत्कृतवान् विष्णुस्तच्छृणुष्व नराधिप ॥ ८२ | हे राजन् ! इसके बाद भगवान् विष्णुने जो किया, उसे आप सुनें ॥ ८२ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे कौशिकवृत्तकथनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'कौशिकवृत्तकथन' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥