भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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५७२श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पद्माक्षमाह भगवान् धनदो भव माधवः।<br>धनानामीश्वरो भूत्वा यथाकालं हि मां पुनः ॥ ५८<br><br>आगम्य दृष्ट्वा मां नित्यं कुरु राज्यं यथासुखम्।<br>एवमुक्त्वा हरिर्विष्णुर्ब्रह्माणमिदमब्रवीत् ॥ ५९<br><br>कौशिकस्यास्य गानेन योगनिद्रा च मे गता।<br>विष्णुस्थले च मां स्तौति शिष्यैरेष समन्ततः ॥ ६०<br><br>राज्ञा निरस्तः क्रूरेण कलिङ्गेन महीयसा।<br>स जिह्वाच्छेदनं कृत्वा हरेरन्यं कथञ्चन ॥ ६१<br><br>न स्तोष्यामीति नियतः प्राप्तोऽसौ मम लोकताम्।<br>एते च विप्रा नियता मम भक्ता यशस्विनः ॥ ६२<br><br>श्रोत्रच्छिद्रमथाहत्य शङ्कुभिर्वै परस्परम्।<br>श्रोण्यामो नैव चान्यद्वै हरेः कीर्तिमिति स्म ह॥ ६३<br><br>एते विप्राश्च देवत्वं मम सान्निध्यमेव च।<br>मालवो भार्यया सार्धं मत्क्षेत्रं परिमृज्य वै ॥ ६४<br><br>दीपमालादिभिर्नित्यमभ्यर्च्य सततं हि माम्।<br>गानं शृणोति नियतो मत्कीर्तिचरितान्वितम् ॥ ६५<br><br>तेनासौ प्राप्तवाँल्लोकं मम ब्रह्म सनातनम्।<br>पद्माक्षोऽसौ ददौ भोज्यं कौशिकस्य महात्मनः ॥ ६६<br><br>धनेशत्वमवाप्तोऽसौ मम सान्निध्यमेव च।<br>एवमुक्त्वा हरिस्तत्र समाजे लोकपूजितः ॥ ६७<br><br>तस्मिन् क्षणे समापन्ना मधुराक्षरपेशलैः।<br>विपञ्चीगुणतत्त्वज्ञैर्वाद्यविद्याविशारदैः ॥ ६८<br><br>मन्दं मन्दस्मितादेवी विचित्राभरणान्विता।<br>गायमाना समायाता लक्ष्मीर्विष्णुपरिग्रहा॥ ६९<br><br>वृता सहस्रकोटीभिरङ्गनाभिः समन्ततः।<br>ततो गणाधिपा दृष्ट्वा भुशुण्डीपरिघायुधाः ॥ ७०<br><br>ब्रह्मादींस्तर्जयन्तस्ते मुनीन् देवान् समन्ततः।<br>उत्सारयन्तः संहृष्टाधिष्ठिताः पर्वतोपमाः ॥ ७१यथेच्छया निवास कीजिये; जबतक लोक स्थित रहें, तबतक आप यहाँ यथेच्छ रहें'॥ ५६-५७॥<br><br>तदनन्तर भगवान् माधवने पद्माक्षसे कहा—आप 'धनद' हो जाइये; धनोंके स्वामी बनकर आप पुनः यथासमय मेरे पास आकर मेरा दर्शन करके सुखपूर्वक सदा राज्य कीजिये॥ ५८१/२ ॥<br><br>ऐसा कहकर श्रीहरि विष्णुने ब्रह्मासे यह कहा— इन कौशिकके गानसे मेरी योगनिद्रा समाप्त हो गयी है। ये अपने शिष्योंके साथ विष्णुस्थलमें सम्यक् रूपसे मेरी स्तुति कर रहे थे। क्रूर तथा अत्यधिक शक्तिशाली राजा कलिङ्गने इन्हें [देशसे] निकाल दिया है। इन्होंने अपनी जिह्वा काटकर 'श्रीहरिके अतिरिक्त किसी अन्यकी स्तुति मैं किसी भी प्रकारसे नहीं करूँगा'—ऐसा निश्चय कर लिया था, अतः ये मेरे लोकको प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार इन संयमी, मेरे भक्त तथा यशस्वी विप्रोंने काष्ठकी खूँटियाँ एक-दूसरेके कानोंमें ठोंककर यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि हमलोग श्रीहरिकी कीर्तिको छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं सुनेंगे। अतएव इन 'विप्रों' ने भी देवत्व तथा मेरा सान्निध्य प्राप्त किया है, ये मालव भी अपनी भार्याके साथमें मेरे मन्दिरको भलीभाँति स्वच्छ करके दीप, माला आदि [उपचारों]-से नित्य मेरी अर्चना करके सावधान होकर मेरी कीर्ति तथा चरितसे युक्त गानका निरन्तर श्रवण किया करते थे; इसीलिये हे ब्रह्मन्! इन्होंने मेरा सनातन लोक प्राप्त किया है। इन पद्माक्षने महात्मा कौशिकको भोजन प्रदान किया था, इसीलिये इन्हें धनेशत्व तथा मेरे सान्निध्यकी प्राप्ति हुई है॥ ५९-६६१/२ ॥<br><br>ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि वहाँ समाजमें लोकपूजित हुए। उसी क्षण मधुर स्वरोंके विशेषज्ञ, वीणाके गुणतत्त्वोंके ज्ञाता तथा वाद्यविद्याके विशारद मनीषियोंके साथ विचित्र आभूषणोंसे मण्डित विष्णुभार्या लक्ष्मीजी मन्द-मन्द मुसकान करती तथा गाती हुई वहाँ आयीं; वे हजारों, करोड़ों अंगनाओंसे घिरी हुई थीं। तब उन्हें देखकर भुशुण्डी तथा परिघ नामक आयुध धारण किये सभी गणाधिप मुनियों, ब्रह्मा आदि देवताओंको