श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १] भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा [५७१
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ज्ञानयोगेश्वरैः सिद्धैर्विष्णुभक्तैः समाहितैः।<br>नारायणसमैर्दिव्यैश्चतुर्बाहुधरैः शुभैः॥ ४४<br>विष्णुचिह्नसमापन्नैर्दीप्यमानैरकल्मषैः ।<br>अष्टाशीतिसहस्रैश्च सेव्यमानो महाजनैः॥ ४५<br>अस्माभिनारदाद्यैश्च सनकाद्यैरकल्मषैः।<br>भूतैर्नानाविधैश्चैव दिव्यस्त्रीभिः समन्ततः॥ ४६<br>सेव्यमानोऽथ मध्ये वै सहस्रद्वारसंवृते।<br>सहस्रयोजनायामे दिव्ये मणिमये शुभे॥ ४७<br>विमाने विमले चित्रे भद्रपीठासने हरिः।<br>लोककार्ये प्रसक्तानां दत्तदृष्टिश्च माधवः॥ ४८ | वहाँ भगवान् नारायण श्वेतद्वीपमें निवास करनेवाले ज्ञानयोगेश्वर, विष्णुभक्त, एकनिष्ठ, सिद्ध, नारायणके समान विग्रहवाले, दिव्य, चार भुजाएँ धारण करनेवाले, मनोहर, श्रीविष्णुके चिह्नोंसे युक्त, दीप्तिमान् तथा निर्विकार अट्ठासी हजार महापुरुषोंके द्वारा एवं हम लोगों, नारद-सनक आदि मुनियों, अनेकविध निष्पाप प्राणियों तथा दिव्य स्त्रियोंके द्वारा सभी ओरसे सेवित हो रहे थे। वे माधव श्रीहरि मध्य भागमें स्थित हजार द्वारोंवाले, हजार योजन विस्तारवाले, अलौकिक, मणिनिर्मित तथा मनोहर विमानमें स्वच्छ एवं अद्भुत सिंहासनपर विराजमान होकर लोककार्यमें तत्पर लोगोंपर दृष्टि दिये हुए सुशोभित हो रहे थे॥४३–४८॥ |
| तस्मिन् कालेऽथ भगवान् कौशिकाद्यैश्च संवृतः।<br>आगम्य प्रणिपत्याग्रे तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ४९ | उसी समय कौशिक आदि मुनियोंसहित भगवान् ब्रह्मा गरुड़ध्वज श्रीहरिके सम्मुख आकर प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे॥४९॥ |
| ततो विलोक्य भगवान् हरिनारायणः प्रभुः।<br>कौशिकेत्याह सम्प्रीत्या तान् सर्वांश्च यथाक्रमम्॥ ५०<br>जयघोषो महानासीन्महाश्चर्यं समागते।<br>ब्रह्माणमाह विश्वात्मा शृणु ब्रह्मन् मयोदितम्॥ ५१ | तत्पश्चात् ऐश्वर्यसम्पन्न नारायण भगवान् श्रीहरिने उन सबको देखकर अत्यन्त प्रेमके साथ उन्हें क्रमसे कौशिक आदि [नाम लेकर] पुकारा। इस महान् आश्चर्यके घटित होनेपर वहाँ जयकारकी तीव्र ध्वनि होने लगी॥ ५० ½॥ |
| कौशिकस्य इमे विप्राः साध्यसाधनतत्पराः।<br>हिताय सम्प्रवृत्ता वै कुशस्थलनिवासिनः॥ ५२<br>मत्कीर्तिश्रवणे युक्ता ज्ञानतत्त्वार्थकोविदाः।<br>अनन्यदेवताभक्ताः साध्या देवा भवन्त्विमे॥ ५३<br>मत्समीपे तथान्यत्र प्रवेशं देहि सर्वदा। | विश्वात्मा विष्णुने ब्रह्मासे कहा—हे ब्रह्मन्! मेरा कथन सुनिये, साध्य-साधनमें तत्पर रहनेवाले ये कुशस्थल-निवासी विप्र कौशिकका हित करनेके लिये प्रवृत्त हैं। ये ज्ञानके तत्त्वार्थके पण्डित, मेरी कीर्तिके श्रवणमें तत्पर रहनेवाले तथा देवताओंके अनन्य भक्त हैं; ये साध्यदेव हों। इन्हें मेरे समीप तथा अन्यत्र भी सर्वदा प्रवेश दीजिये॥ ५१–५३ ½॥ |
| एवमुक्त्वा पुनर्देवः कौशिकं प्राह माधवः॥ ५४<br>स्वशिष्यैस्त्वं महाप्राज्ञ दिग्बन्धो भव मे सदा।<br>गणाधिपत्यमापन्नो यत्राहं त्वं समास्व वै॥ ५५ | ऐसा कहकर प्रभु माधवने कौशिकसे कहा—हे महाप्राज्ञ! आप अपने शिष्योंके साथ सदा मेरे समीप विराजमान रहें। मेरे गणाधिप बनकर अब आप वहीं स्थित रहें, जहाँ मैं रहूँ॥ ५४–५५॥ |
| मालवं मालवीं चैवं प्राह दामोदरो हरिः।<br>मम लोके यथाकामं भार्यया सह मालव॥ ५६<br>दिव्यरूपधरः श्रीमान् शृण्वन् गानमिहाधिपः।<br>आस्व नित्यं यथाकामं यावल्लोका भवन्ति वै॥ ५७ | इसी प्रकार दामोदर श्रीहरिने मालव तथा मालवीसे कहा—‘हे मालव! आप मेरे लोकमें अपनी भार्याके साथ दिव्य रूप धारण करके ऐश्वर्यसम्पन्न होकर मेरा यशोगान सुनते हुए राजाके रूपमें प्रतिष्ठित होकर |