भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 569

॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥

श्रीलिङ्गमहापुराण

[ उत्तरभाग ]

पहला अध्याय

भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा

ऋषय ऊचुः <br> कृष्णास्तुष्यति केनेह सर्वदेवेश्वरेश्वरः। <br> वक्तुमर्हसि चास्माकं सूत सर्वार्थविद्वरान्॥ १**ऋषि बोले—**हे सूतजी! समस्त देवताओं और ईश्वरोंके ईश्वर भगवान् कृष्ण इस लोकमें किससे सन्तुष्ट होते हैं? आप हम लोगोंको बतायें; आप सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता हैं॥ १॥
सूत उवाच <br> पुरा पृष्टो महातेजा मार्कण्डेयो महामुनिः। <br> अम्बरीषेण विप्रेन्द्रास्तद्वदामि यथातथम्॥ २**सूतजी बोले—**हे विप्रवरो! पूर्वकालमें अम्बरीषने भी महातेजस्वी महामुनि मार्कण्डेयसे [इस विषयमें] पूछा था; मैं उसे यथार्थरूपसे बता रहा हूँ॥ २॥
अम्बरीष उवाच <br> मुने समस्तधर्माणां पारगस्त्वं महामते। <br> मार्कण्डेय पुराणोऽसि पुराणार्थविशारदः॥ ३**अम्बरीष बोले—**हे मुने! हे महामते! हे मार्कण्डेयजी! आप समस्त धर्मोंके पूर्ण ज्ञाता, अत्यन्त पुरातन तथा पुराणतत्त्वोंके विद्वान् हैं॥ ३॥
नारायणानां दिव्यानां धर्माणां श्रेष्ठमुत्तमम्। <br> तत्किं ब्रूहि महाप्राज्ञ भक्तानामिह सुव्रत॥ ४हे महाप्राज्ञ! नारायणके द्वारा निर्मित दिव्य धर्मोंमें कौन-सा धर्म श्रेष्ठ तथा उत्तम है? हे सुव्रत! उसे आप यहाँपर भक्तोंके कल्याणार्थ बतायें॥ ४॥
सूत उवाच <br> तस्य तद्वचनं श्रुत्वा समुत्थाय कृताञ्जलिः। <br> स्मरन्नारायणं देवं कृष्णमच्युतमव्ययम्॥ ५**सूतजी बोले—**उनका यह वचन सुनकर [मार्कण्डेयजी] उठ करके दोनों हाथ जोड़कर अविनाशी तथा अच्युत भगवान् नारायण कृष्णका स्मरण करते हुए कहने लगे॥ ५॥