भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५६८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु भूप यथान्यायं पुण्यं नारायणात्मकम्।<br>स्मरणं पूजनं चैव प्रणामो भक्तिपूर्वकम्॥ ६<br><br>प्रत्येकमश्वमेधस्य यज्ञस्य सममुच्यते।<br>य एकः पुरुषः श्रेष्ठः परमात्मा जनार्दनः॥ ७<br><br>यस्माद् ब्रह्मा ततः सर्वं समाश्रित्यैवमुच्यते।<br>धर्ममेकं प्रवक्ष्यामि यद्दृष्टं विदितं मया॥ ८ | मार्कण्डेयजी बोले— हे राजन्! सम्यक् प्रकारसे सुनिये; भक्तिपूर्वक [अनुष्ठित किये गये] भगवान् नारायणके स्मरण, पूजन और प्रणाम—इनमेंसे प्रत्येकको अश्वमेधयज्ञके समान फल प्रदान करनेवाला कहा जाता है; क्योंकि एकमात्र वे प्रभु जनार्दन ही परम पुरुष परमात्मा हैं, जिनसे आश्रय लेकर ब्रह्माजी जगत्‌के स्रष्टा कहे जाते हैं। मैंने जो देखा है तथा जाना है, उसी एकमात्र धर्मका वर्णन करूँगा॥ ६–८॥ | | पुरा त्रेतायुगे कश्चित् कौशिको नाम वै द्विजः।<br>वासुदेवपरो नित्यं सामगानरतः सदा॥ ९ | प्राचीनकालमें त्रेतायुगमें एक कौशिक नामवाले ब्राह्मण थे; वे नित्य-निरन्तर वासुदेवपरायण रहते हुए सामगानमें तल्लीन रहते थे॥ ९॥ | | भोजनासनशय्यासु सदा तद्गतमानसः।<br>उदारचरितं विष्णोर्गायमानः पुनः पुनः॥ १० | भगवान् विष्णुके उदार चरित्रका बार-बार गान करते हुए वे भोजन करने, बैठने तथा शयनमें सदा उन्हींमें अपना चित्त लगाये रहते थे॥ १०॥ | | विष्णोः स्थलं समासाद्य हरेः क्षेत्रमनुत्तमम्।<br>अगायत हरिं तत्र तालवर्णलयान्वितम्॥ ११<br><br>मूर्च्छनास्वरयोगेन श्रुतिभेदेन भेदितम्।<br>भक्तियोगं समापन्नो भिक्षामात्रं हि तत्र वै॥ १२ | परम पवित्रक्षेत्रस्थ भगवान् विष्णुके मन्दिरमें आकर वे ताल, स्वर और लयसे युक्त, मूर्च्छना और स्वरयोग, बृहद्रथन्तर आदि श्रुतिभेदसे अन्वित भगवान् श्रीहरिका गान करते थे। इस प्रकार भक्तियोगमें सदा स्थित रहकर वे वहींपर भिक्षामात्र ग्रहण करते हुए रहते थे॥ ११-१२॥ | | तत्रैनं गायमानं च दृष्ट्वा कश्चिद्द्विजस्तदा।<br>पद्माख्य इति विख्यातस्तस्मै चान्नं ददौ तदा॥ १३<br><br>सकुटुम्बो महातेजा ह्युष्णान्नं हि तत्र वै।<br>कौशिको हि तदा हृष्टो गायन्नास्ते हरिं प्रभुम्॥ १४ | उस समय उन्हें वहाँ गाते हुए देखकर 'पद्माख्य' (पद्माक्ष)—इस नामसे विख्यात किसी द्विजने उन्हें अन्न प्रदान किया। तब महातेजस्वी कौशिक अपने कुटुम्बसहित उष्ण अन्नको ग्रहण करके प्रसन्नतापूर्वक प्रभु श्रीहरिका गुणगान करते हुए वहींपर स्थित हो गये॥ १३-१४॥ | | शृण्वन्नास्ते स पद्माख्यः काले काले विनिर्गतः।<br>कालयोगेन सम्प्राप्ताः शिष्या वै कौशिकस्य च॥ १५<br><br>सप्त राजन्यवैश्यानां विप्राणां कुलसम्भवाः।<br>ज्ञानविद्याधिकाः शुद्धा वासुदेवपरायणाः॥ १६ | वह पद्माख्य भी सदा उसे सुनता रहता था और समय-समयपर वहाँसे चला भी जाता था। किसी समय कालयोगसे द्विज कौशिकके सात शिष्य वहाँ आये। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यकुलमें उत्पन्न; ज्ञान और विद्यासे परिपूर्ण; विशुद्ध मनवाले तथा भगवान् वासुदेवके अनन्य भक्त थे॥ १५-१६॥ | | तेषामपि तथानाद्यं पद्माक्षः प्रददौ स्वयम्।<br>शिष्यैश्च सहितो नित्यं कौशिको हृष्टमानसः॥ १७ | स्वयं पद्माक्षने उन्हें भी अन्नादिसहित उपयोगी पदार्थ प्रदान किये। वे कौशिक प्रसन्नचित्त होकर अपने शिष्योंके साथ वहींपर विष्णुमन्दिरमें प्रभु श्रीहरिका सम्यक् रूपसे सदा गुणगान करते रहते थे॥ १७½॥ |