श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १०७] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सहैव चारुह्य तदा द्विपं तं<br>प्रगृह्य बालव्यजनं विवस्वान्।<br>वामेन शच्या सहितं सुरेन्द्रं<br>करेण चान्येन सितातपत्रम्॥ २६ | उनके साथ ही उस हाथीपर चढ़कर सूर्यदेव [अपने] बाएँ हाथमें बालव्यजन तथा दाएँ हाथमें श्वेत छत्र लेकर शचीसहित सुरेन्द्रकी सेवा कर रहे थे॥ २६॥ |
| रराज भगवान् सोमः शक्ररूपी सदाशिवः।<br>सितातपत्रेण यथा चन्द्रबिम्बेन मन्दरः॥ २७ | उस समय उमासहित शक्ररूपी भगवान् सदाशिव श्वेत छत्रसे उसी तरह सुशोभित हो रहे थे, जैसे चन्द्रबिम्बसे मन्दर [पर्वत] सुशोभित होता है॥ २७॥ |
| आस्थायैवं हि शक्रस्य स्वरूपं परमेश्वरः।<br>जगामानुग्रहं कर्तुमुपमन्योस्तदाश्रमम्॥ २८ | इस प्रकार इन्द्रका स्वरूप धारण करके परमेश्वर [उस] उपमन्युपर अनुग्रह करनेके लिये उसके आश्रममें गये॥ २८॥ |
| तं दृष्ट्वा परमेशानं शक्ररूपधरं शिवम्।<br>प्रणम्य शिरसा प्राह मुनिर्मुनिवराः स्वयम्॥ २९<br><br>पावितश्चाश्रमश्चायं मम देवेश्वरः स्वयम्।<br>प्राप्तः शक्रो जगन्नाथो भगवान् भानुना प्रभुः॥ ३० | हे मुनिवरो! इन्द्ररूपधारी उन परमेशान शिवको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम करके मुनि [उपमन्यु]-ने स्वयं कहा—'मेरा यह आश्रम पवित्र हो गया; क्योंकि देवताओंके स्वामी, जगत्पति, भगवान् प्रभु इन्द्र सूर्यके साथ [यहाँ] स्वयं आये हुए हैं'॥ २९-३०॥ |
| एवमुक्त्वा स्थितं वीक्ष्य कृताञ्जलिपुटं द्विजम्।<br>प्राह गम्भीरया वाचा शक्ररूपधरो हरः॥ ३१<br><br>तुष्टोऽस्मि ते वरं ब्रूहि तपसानेन सुव्रत।<br>ददामि चेप्सितान् सर्वान् धौम्याग्रज महामते॥ ३२ | ऐसा कहकर हाथ जोड़कर खड़े हुए द्विजको देखकर इन्द्ररूपधारी शिव गम्भीर वाणीमें बोले—'हे सुव्रत! मैं तुम्हारे इस तपसे प्रसन्न हो गया हूँ; वर माँगो। हे [ऋषि] धौम्यके अग्रज! हे महामते! मैं [तुम्हें] समस्त अभीष्ट प्रदान करता हूँ'॥ ३१-३२॥ |
| एवमुक्तस्तदा तेन शक्रेण मुनिसत्तमः।<br>वरयामि शिवे भक्तिमित्युवाच कृताञ्जलिः॥ ३३ | तब शक्ररूपी शिवके द्वारा ऐसा कहे जानेपर मुनिश्रेष्ठने हाथ जोड़कर कहा—'मैं शिवमें भक्तिका वर माँगता हूँ'॥ ३३॥ |