भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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५६२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| ततो निशम्य वचनं मुनेः कुपितवत्प्रभुः।<br>प्राह सव्यग्रमीशानः शक्ररूपधरः स्वयम्॥ ३४<br>मां न जानासि देवर्षे देवराजानमीश्वरम्।<br>त्रैलोक्याधिपतिं शक्रं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ३५<br>मद्भक्तो भव विप्रर्षे मामेवार्चय सर्वदा।<br>ददामि सर्वं भद्रं ते त्यज रुद्रं च निर्गुणम्॥ ३६ | तब मुनिका वचन सुनकर इन्द्रका रूप धरण करनेवाले प्रभु ईशान कुपितकी भाँति व्यग्रतापूर्वक बोले—'हे देवर्षे! तीनों लोकोंके अधिपति तथा सभी देवताओंसे नमस्कार किये जानेवाले मुझ ईश्वर देवराज इन्द्रको क्या तुम नहीं जानते हो? हे विप्रर्षे! तुम मेरे भक्त हो जाओ और सर्वदा मेरी ही पूजा करो, मैं तुम्हें सब कुछ प्रदान करता हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; तुम निर्गुण शिवका त्याग कर दो'॥ ३४-३६॥ | | ततः शक्रस्य वचनं श्रुत्वा श्रोत्रविदारणम्।<br>उपमन्युरिदं प्राह जपन् पञ्चाक्षरं शुभम्॥ ३७<br>मन्ये शक्रस्य रूपेण नूनमत्रागतः स्वयम्।<br>कर्तुं दैत्याधमः कश्चिद्धर्मविघ्नं च नान्यथा॥ ३८<br>त्वयैव कथितं सर्वं भवनिन्दारतेन वै।<br>प्रसङ्गाद्देवदेवस्य निर्गुणत्वं महात्मनः॥ ३९<br>बहुनात्र किमुक्तेन मयाद्यानुमितं महत्।<br>भवान्तरकृतं पापं श्रुता निन्दा भवस्य तु॥ ४०<br>श्रुत्वा निन्दां भवस्याथ तत्क्षणादेव सन्त्यजेत्।<br>स्वदेहं तं निहत्याशु शिवलोकं स गच्छति॥ ४१<br>यो वाचोत्पाटयेज्जिह्वां शिवनिन्दारतस्य तु।<br>त्रिः सप्तकुलमुद्धृत्य शिवलोकं स गच्छति॥ ४२<br>आस्तां तावन्ममेच्छा या क्षीरं प्रति सुराधमम्।<br>निहत्य त्वां शिवास्त्रेण त्यजाम्येतत्कलेवरम्॥ ४३<br>पुरा मात्रा तु कथितं तथ्यमेव न संशयः।<br>पूर्वजन्मनि चास्माभिरपूजित इति प्रभुः॥ ४४ | तब इन्द्रका कर्णविदारक वचन सुनकर उपमन्युने पवित्र पंचाक्षरमन्त्रका जप करते हुए यह कहा—'अब मैं समझता हूँ कि निश्चय ही कोई अधम दैत्य स्वयं इन्द्रके स्वरूपमें मेरे धर्ममें विघ्न डालनेके लिये यहाँ आया है; इसमें सन्देह नहीं है। शिवनिन्दापरायण आपने ही प्रसंगवश महात्मा देवदेव [शिव]-की निर्गुणता भी बतायी है। अधिक कहनेसे क्या लाभ; मैंने आज अनुमान किया है कि पूर्वजन्ममें किया हुआ मेरा कोई महापाप अवश्य है, जिसके कारण मैंने शिवकी निन्दा सुनी है। जो शिवकी निन्दा सुनकर उसी क्षण उस [शिवनिन्दक]-को मारकर अपने शरीरको त्याग देता है, वह शिवलोकको जाता है। जो [व्यक्ति] वाणीसे शिवनिन्दा करनेवालेकी जीभ उखाड़ लेता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके शिवलोकको जाता है। दूधके लिये मेरी जो इच्छा है, वह अब दूर रहे; शिवके अस्त्रसे तुझ सुराधमका वध करके मैं [अपने] इस शरीरका भी त्याग कर दूँगा। माताने पहले जो कहा था, वह सत्य है; इसमें सन्देह नहीं है। हमलोगोंने पूर्वजन्ममें शिवकी पूजा नहीं की थी'॥ ३७-४४॥ | | एवमुक्त्वा तु तं देवमुपमन्युरभीतवत्।<br>शक्रं चक्रे मतिं हन्तुमथर्वास्त्रेण मन्त्रवित्॥ ४५<br>भस्माधारान्महातेजा भस्ममुष्टिं प्रगृह्य च।<br>अथर्वास्त्रं ततस्तस्मै ससर्ज च ननाद च॥ ४६<br>दग्धुं स्वदेहमाग्नेयीं ध्यात्वा वै धारणां तदा।<br>अतिष्ठच्च महातेजाः शुष्केन्धनमिवाव्ययः॥ ४७ | ऐसा कहकर निडरकी भाँति होकर मन्त्रवेत्ता उपमन्युने उन इन्द्रदेवको अथर्वास्त्रसे मार देनेका विचार किया। उस महातेजस्वीने भस्मके आधारसे एक मुट्ठी भस्म लेकर उसके लिये अथर्वास्त्रका सृजन किया और जोरसे ध्वनि की। तब आग्नेयी धारणाका ध्यान करके अपने देहको सूखे ईंधनकी तरह जलानेके लिये वह अव्यय तेजस्वी खड़ा हो गया॥ ४५-४७॥ | | एवं व्यवसिते विप्रे भगवान् भगनेत्रहा।<br>वारयामास सौम्येन धारणां तस्य योगिनः॥ ४८ | उस विप्रके ऐसा निश्चय करनेपर भगके नेत्रको |

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