श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 565, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 565
अध्याय १०७] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५६३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथर्वास्त्रं तदा तस्य संहृतं चन्द्रिकेण तु।<br>कालाग्निसदृशं चेदं नियोगान्नन्दिनस्तथा॥ ४९ | नष्ट करनेवाले भगवान् शिवने सोमधारणाद्योगसे उस योगी [उपमन्यु]-की [आग्नेयी] धारणाको रोक दिया। तब नन्दीके आदेशसे चन्द्रिक [नामक गण]-ने उसके कालाग्नि-सदृश अथर्वास्त्रका संहरण कर लिया॥ ४८-४९॥ |
| स्वरूपमेव भगवानास्थाय परमेश्वरः।<br>दर्शयामास विप्राय बालेन्दुकृतशेखरम्॥ ५० | इसके बाद भगवान् परमेश्वरने बालचन्द्रमासे शोभित मस्तकवाले [अपने] स्वरूपको धारण करके विप्रको दिखाया॥ ५०॥ |
| क्षीरधारासहस्त्रं च क्षीरोदार्णवमेव च।<br>दध्यादेरर्णवं चैव घृतोदार्णवमेव च॥ ५१<br><br>फलार्णवं च बालस्य भक्ष्यभोज्यार्णवं तथा।<br>अपूपगिरयश्चैव तथातिष्ठन् समन्ततः॥ ५२ | उस समय बालक [उपमन्यु]-के चारों ओर हजारों दुग्धधाराएँ, क्षीरसागर, मधुका समुद्र, दधिका सागर, घृतका सागर, फलका सागर, [अन्य] भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका सागर तथा अपूपोंके पर्वत उपस्थित हो गये॥ ५१-५२॥ |
| उपमन्युमुवाच सस्मितो<br>भगवान् बन्धुजनैः समावृतम्।<br>गिरिजामवलोक्य सस्मितां सघृणं<br>प्रेक्ष्य तु तं तदा घृणी॥ ५३<br><br>भुङ्क्ष्व भोगान् यथाकामं बान्धवैः पश्य वत्स मे।<br>उपमन्यो महाभाग तवाम्बैषा हि पार्वती॥ ५४<br><br>मया पुत्रीकृतोऽस्यद्य दत्तः क्षीरोदधिस्तथा।<br>मधुनश्चार्णवश्चैव दध्नश्चार्णव एव च॥ ५५<br><br>आज्योदनार्णवश्चैव फललेह्यार्णवस्तथा।<br>अपूपगिरयश्चैव भक्ष्यभोज्यार्णवः पुनः॥ ५६<br><br>पिता तव महादेवः पिता वै जगतां मुने।<br>माता तव महाभागा जगन्माता न संशयः॥ ५७<br><br>अमरत्वं मया दत्तं गाणपत्यं च शाश्वतम्।<br>वरान् वरय दास्यामि नात्र कार्या विचारणा॥ ५८ | तदनन्तर दयालु भगवान् [शिव]-ने मुसकानयुक्त गिरिजाको देखकर तथा बन्धुजनोंसे घिरे हुए उपमन्युकी ओर दयापूर्वक देखकर मुसकराकर उससे कहा—'हे मेरे पुत्र! तुम अपने बान्धवोंके साथ इच्छानुसार भोगोंका उपभोग करो। हे उपमन्यो! हे महाभाग! देखो, ये पार्वती तुम्हारी माता हैं। मैंने आज तुम्हें अपना पुत्र बना लिया है और तुम्हें क्षीरसागर, मधुसागर, दधिसागर, घृत तथा ओदनका सागर, फलोंका सागर, लेह्य पदार्थोंका सागर, अपूपोंके पर्वत तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका सागर प्रदान किया है। हे मुने! सभी लोकोंके पिता महादेव तुम्हारे पिता हैं और जगज्जननी महाभागा पार्वती तुम्हारी माता हैं; इसमें सन्देह नहीं है। मैंने तुम्हें अमरत्व तथा शाश्वत गाणपत्य प्रदान कर दिया, अब तुम अन्य वरोंको भी माँग लो, मैं तुम्हें दूँगा; इसमें तुम्हें सन्देह नहीं करना चाहिये'॥ ५३-५८॥ |
| एवमुक्त्वा महादेवः कराभ्यामुपगृह्य तम्।<br>आघ्राय मूर्धनि विभुर्ददौ देव्यास्तदा भवः॥ ५९ | ऐसा कहकर महादेव विभु शिवने उसे दोनों हाथोंसे उठाकर उसका सिर सूँघकर पुनः उसे देवी [पार्वती]-को दे दिया॥ ५९॥ |
| देवी तनयमालोक्य ददौ तस्मै गिरीन्द्रजा।<br>योगैश्वर्यं तदा तुष्टा ब्रह्मविद्यां द्विजोत्तमाः॥ ६० | हे श्रेष्ठ द्विजो! तब [अपने] पुत्रको देखकर गिरिराजपुत्री देवी [पार्वती]-ने प्रसन्न होकर उसे योगैश्वर्य तथा ब्रह्मविद्या प्रदान की॥ ६०॥ |
| सोऽपि लब्ध्वा वरं तस्याः कुमारत्वं च सर्वदा।<br>तुष्टाव च महादेवं हर्षगद्गदया गिरा॥ ६१ | उसने भी उन पार्वतीसे वर तथा शाश्वत कुमारत्व प्राप्त करके हर्षके कारण गद्गद वाणीसे महादेवकी |