श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ५५० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| ओङ्कारेशः कृत्तिवासा मृतानां न पुनर्भवः।<br>उक्त्वा क्षेत्रस्य माहात्म्यं सङ्क्षेपाच्छशिशेखरः॥ ७८<br><br>दर्शयामास चोद्यानं परित्यज्य गणेश्वरान्।<br>तत्रैव भगवान् जातो गजवक्त्रो विनायकः॥ ७९<br><br>दैत्यानां विघ्नरूपार्थमविघ्नाय दिवौकसाम्।<br>एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमुत्तमम्॥ ८०<br><br>यथाश्रुतं मया सर्वं प्रसादाद्भोः सुशोभनम्॥ ८१ | प्राप्त करना भी श्रेष्ठ नहीं है। जहाँपर भगवान् त्रिविष्टप, विभु, विश्वेश्वर तथा कृत्तिवास ओंकारेश [सदा] विराजमान हैं, उस काशीमें मरनेवालोंका पुनर्जन्म नहीं होता'॥ ७३—७७ १/२॥<br>इस प्रकार संक्षेपमें क्षेत्रका माहात्म्य कहकर गणेश्वरोंको विदा करके चन्द्रशेखरने पार्वतीको [अपना] उद्यान दिखाया। भगवान् गजानन विनायक दैत्योंको विघ्न उत्पन्न करनेके लिये तथा देवताओंका विघ्न दूर करनेके लिये वहींपर उत्पन्न हुए थे। [हे ऋषियो!] मैंने आपलोगोंको कथाका सम्पूर्ण उत्तम तथा सुन्दर तत्त्व संक्षेपमें बता दिया, जैसा कि मैंने व्यासजीकी कृपासे सुना था॥ ७८—८१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पार्वतीविवाहवर्णनं नाम त्र्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १०३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पार्वतीविवाहवर्णन' नामक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०३॥
एक सौ चारवाँ अध्याय
गजाननका प्राकट्य करानेके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] गणोंके स्वामी गजानन विनायक कैसे उत्पन्न हुए; उनका प्रभाव कैसा है? इसे आप बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
| कथं विनायको जातो गजवक्त्रो गणेश्वरः।<br>कथं प्रभावस्तस्यैवं सूत वक्तुमिहार्हसि॥ १ | |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— हे द्विजो! इसी बीच इन्द्र तथा उपेन्द्रसहित देवतागण एकत्र होकर दैत्योंके धर्ममें विघ्न करनेके लिये प्रवृत्त हुए। हे विप्रो! [वे विचार करने लगे कि] असुर, यातुधान, क्रूर कर्मवाले राक्षस तथा पृथ्वीपर जो अन्य तमोगुणी तथा रजोगुणी लोग हैं, उन्होंने अविघ्नतापूर्वक कार्य करनेहेतु यज्ञ-दान आदिके द्वारा महेश्वर, ब्रह्मा तथा विष्णुकी सम्यक् पूजा करके अभीष्ट वर प्राप्त कर लिया है; अतः हे सुरश्रेष्ठो! सर्वदा हम लोगोंका पराभव हो रहा है। इसलिये उनके विघ्नके लिये, देवताओंके अविघ्नके लिये, स्त्रियोंको पुत्रप्राप्तिके लिये तथा पुरुषोंके कर्मकी सिद्धिके लिये आप सभीलोग विघ्नेश गणपति के सृजनहेतु शंकरकी स्तुति कीजिये॥ २—६॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समेत्य ते।<br>धर्मविघ्नं तदा कर्तुं दैत्यानामभवन् द्विजाः॥ २<br>असुरा यातुधानाश्च राक्षसाः क्रूरकर्मिणः।<br>तामसाश्च तथा चान्ये राजसाश्च तथा भुवि॥ ३<br>अविघ्नं यज्ञदानाद्यैः समभ्यर्च्य महेश्वरम्।<br>ब्रह्माणं च हरिं विप्रा लब्धेप्सितवरा यतः॥ ४<br>ततोऽस्माकं सुरश्रेष्ठाः सदाविजयसम्भवः।<br>तेषां ततस्तु विघ्नार्थमविघ्नाय दिवौकसाम्॥ ५<br>पुत्रार्थं चैव नारीणां नराणां कर्मसिद्धये।<br>विघ्नेशं शङ्करं स्रष्टुं गणपं स्तोतुमर्हथ॥ ६ | |
| इत्युक्त्वान्योन्यमनघं तुष्टुवुः शिवमिश्वरम्।<br>नमः सर्वात्मने तुभ्यं सर्वज्ञाय पिनाकिने॥ ७ | आपसमें ऐसा कहकर वे [देवता] निष्पाप ईश्वर |