श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १०३ ] भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा ५४९
| भृग्वाद्या मुनयः सर्वे चाक्षतैस्तिलतण्डुलैः।<br>सूर्यादयः समभ्यर्च्य तुष्टुवुर्वृषभध्वजम्॥ ६५ | समस्त भृगु आदि मुनियों तथा सूर्य आदि ग्रहोंने अक्षतों तथा तिल-तण्डुलोंसे वृषभध्वजका अर्चन करके उनकी स्तुति की॥ ६५॥ |
| शिवः समाप्य देवोक्तं वह्निमारोप्य चात्मनि।<br>तया समागतो रुद्रः सर्वलोकहिताय वै॥ ६६ | तत्पश्चात् वे रुद्र शिव ब्रह्मोक्त समस्त [वैवाहिक] कृत्य सम्पन्न करके तथा अग्निको अपनेमें आरोपित करके सभी लोकोंके हितके लिये उन पार्वतीके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए॥ ६६॥ |
| यः पठेच्छृणुयाद्वापि भवोद्वाहं शुचिस्मितः।<br>श्रावयेद्वा द्विजान् शुद्धान् वेदवेदाङ्गपारगान्॥ ६७ | जो [व्यक्ति] पवित्र होकर प्रसन्नतापूर्वक शिवके विवाह-आख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है अथवा वेद-वेदांगमें पारंगत शुद्ध द्विजोंको सुनाता है, वह गणपति-पद प्राप्त करके शिवके साथ आनन्दित होता है। जहाँ भी ब्राह्मणोंद्वारा इस विवाह-प्रसंगको कहा जाता है, वहाँपर शिवजी विराजमान रहते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। अतः हे द्विजो! विधिवत् उनकी पूजा करके इस आख्यानको अवश्य कहना चाहिये। हे उत्तम ब्राह्मणो! श्रेष्ठ द्विजों तथा क्षत्रियोंके विवाहमें इस अत्युत्तम सम्पूर्ण शिवविवाह-प्रसंगका कीर्तन करना चाहिये॥ ६७-६९^{१}/_२॥ |
| स लब्ध्वा गाणपत्यं च भवेन सह मोदते।<br>यत्रायं कीर्त्यते विप्रैस्तावदास्ते तदा भवः॥ ६८ | |
| तस्मात्सम्पूज्य विधिवत्कीर्तयेनान्यथा द्विजाः।<br>उद्वाहे च द्विजेन्द्राणां क्षत्रियाणां द्विजोत्तमाः॥ ६९ | |
| कीर्तनीयमिदं सर्वं भवोद्वाहमनुत्तमम्। | |
| कृतोद्वाहस्तदा देव्या हैमवत्या वृषभध्वजः॥ ७०<br>सगणो नन्दिना सार्धं सर्वदेवगणैर्वृतः।<br>पुरीं वाराणसीं दिव्यामाजगाम महाद्युतिः॥ ७१ | तब विवाह कर लेनेके उपरान्त महाकान्तिसम्पन्न शिवजी [अपने] गणों, नन्दी तथा देवी पार्वतीके साथ दिव्य वाराणसीपुरीमें आये॥ ७०-७१॥ |
| अविमुक्ते सुखासीनं प्रणम्य वृषभध्वजम्।<br>अपृच्छत् क्षेत्रमाहात्म्यं भवानी हर्षितानना॥ ७२ | इसके बाद हर्षयुक्त मुखमण्डलवाली भवानी अविमुक्त (वाराणसी)-में सुखपूर्वक आसीन वृषभध्वजको प्रणाम करके [उस] क्षेत्रका माहात्म्य पूछने लगीं॥ ७२॥ |
| अथाहार्धेन्दुतिलकः क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>अविमुक्तस्य माहात्म्यं विस्तराच्छक्यते नहि॥ ७३ | तब अर्धचन्द्रको तिलकरूपमें धारण करनेवाले शिवजी उत्तम क्षेत्रमाहात्म्यका वर्णन करने लगे—'हे सुरेशानि! मेरे द्वारा अविमुक्तक्षेत्रका माहात्म्य विस्तारपूर्वक नहीं कहा जा सकता है; यह क्षेत्र ऋषियोंद्वारा पूजित है। हे देवि! मैं अविमुक्तक्षेत्रमें होनेवाले पुण्यफलका वर्णन कैसे करूँ, जहाँपर मरनेवाले पापियोंकी एक ही जन्ममें मुक्ति हो जाती है। [लोगोंद्वारा] अन्यत्र किया गया पाप वाराणसीमें नष्ट हो जाता है और वाराणसीमें किया गया पाप पिशाचयोनिरूपी नरककी प्राप्ति करानेवाला होता है। हजारों पाप करके मनुष्योंके लिये पिशाचत्व श्रेष्ठ है, किंतु काशीपुरीके बिना स्वर्गमें हजार बार इन्द्रपद |
| वक्तुं मया सुरेशानि ऋषिसङ्घाभिपूजितम्।<br>किं मया वर्ण्यते देवि ह्यविमुक्तफलोदयः॥ ७४ | |
| पापिनां यत्र मुक्तिः स्यान्मृतानामेकजन्मना।<br>अन्यत्र तु कृतं पापं वाराणस्यां व्यपोहति॥ ७५ | |
| वाराणस्यां कृतं पापं पैशाच्यनरकावहम्।<br>कृत्वा पापसहस्राणि पिशाचत्वं वरं नृणाम्॥ ७६ | |
| न तु शक्रसहस्रत्वं स्वर्गे काशीपुरीं विना।<br>यत्र त्रिविष्टपो देवो यत्र विश्वेश्वरो विभुः॥ ७७ |