श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 550, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 550
| ५४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मणा मुनिभिः सार्धं देवदेवमुमापतिम्। | अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। सभी वेदोंने शरीर धारण करके ब्रह्मा तथा मुनियोंके साथ उन देवदेव उमापति महेश्वरको प्रणाम किया॥ ५१-५२ १/२ ॥ |
| देवोऽपि देवीमालोक्य सलज्जां हिमशैलजाम् ॥ ५३ <br><br> न तृप्यत्यनवद्याङ्गी सा च देवं वृषध्वजम्। <br> वरदोऽस्मीति तं प्राह हरिं सोऽप्याह शङ्करम् ॥ ५४ <br><br> त्वयि भक्तिः प्रसीदेति ब्रह्माख्यां च ददौ तु सः। <br> ततस्तु पुनरेवाह ब्रह्मा विज्ञापयन् प्रभुम् ॥ ५५ <br><br> हविर्जुहोमि वह्नौ तु उपाध्यायपदे स्थितः। <br> ददासि मम यद्याज्ञां कर्तव्यो ह्यकृतो विधिः ॥ ५६ | लज्जासे भरी हुई देवी पार्वतीको देखकर शिव तृप्त नहीं होते थे और दूषणरहित शरीरवाली वे [पार्वती] भी देवदेव वृषभध्वजको देखकर तृप्त नहीं होती थीं। तब शिवने विष्णुसे कहा—'मैं वरदाता हूँ।' इसपर उन्होंने भी शंकरसे कहा—'आपमें मेरी भक्ति बनी रहे; मुझपर प्रसन्न होइये।' तब शिवने उन्हें ब्रह्मत्व प्रदान किया। इसके बाद ब्रह्माने पुनः प्रभुसे प्रार्थना करते हुए कहा—'मैं उपाध्याय (आचार्य)-के पदपर स्थित होकर अग्निमें हवन करता हूँ और यदि आप आज्ञा दें, तो जो विधि अभीतक नहीं की गयी है, उसे सम्पन्न करूँ'॥ ५३—५६ ॥ |
| तमाह शङ्करो देवं देवदेवो जगत्पतिः। <br> यद्यदिष्टं सुरश्रेष्ठ तत्कुरुष्व यथेप्सितम् ॥ ५७ <br><br> कर्तास्मि वचनं सर्वं देवदेव पितामह। | तब जगत्के स्वामी देवदेव शंकरने उन देव ब्रह्मासे कहा—'हे सुरश्रेष्ठ! जो-जो अभीष्ट हो, उसे आप इच्छानुसार कीजिये। हे देवदेव! हे पितामह! मैं [आपके] समस्त वचनका पालन करूँगा'॥ ५७ १/२ ॥ |
| ततः प्रणम्य हृष्टात्मा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ५८ <br><br> हस्तं देवस्य देव्याश्च युयोज परमं प्रभुः। <br> ज्वलनश्च स्वयं तत्र कृताञ्जलिरुपस्थितः ॥ ५९ <br><br> श्रौतैस्तैर्महामन्त्रैमूर्तिमद्भिरुपस्थितैः । <br> यथोक्तविधिना हुत्वा लाजानपि यथाक्रमम् ॥ ६० <br><br> आनीतान् विष्णुना विप्रान् सम्पूज्य विविधैर्वरैः। <br> त्रिश्च तं ज्वलनं देवं कारयित्वा प्रदक्षिणम् ॥ ६१ <br><br> मुक्त्वा हस्तसमायोगं सहितैः सर्वदैवतैः। <br> सुरैश्च मानवैः सर्वैः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ६२ <br><br> ननाम भगवान् ब्रह्मा देवदेवमुमापतिम्। | तदनन्तर [उन्हें] प्रणाम करके प्रसन्नचित्त परम प्रभु लोकपितामह ब्रह्माने शिव तथा देवी [पार्वती]-के हाथोंको [परस्पर] मिला दिया। स्वयं अग्निदेव हाथ जोड़े हुए वहाँ उपस्थित हुए। [साक्षात्] मूर्त्तिमान् होकर उपस्थित वैवाहिक श्रौत महामन्त्रोंके द्वारा यथोक्त विधिसे हवन करनेके अनन्तर विष्णुके द्वारा लाये गये लाजा (धानका लावा)-का भी यथाक्रम हवन करके विविध गोदानोंसे विप्रोंकी पूजाकर पुनः तीन बार अग्निदेवकी प्रदक्षिणा कराकर उनके मिले हुए हाथको मुक्त कराकर भगवान् ब्रह्माने प्रसन्न मनसे सभी देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंके साथ देवदेव उमापतिको प्रणाम किया॥ ५८—६२ १/२ ॥ |
| ततः पाद्यं तयोर्दत्वा शम्भोराचमनं तथा ॥ ६३ <br><br> मधुपर्कं तथा गां च प्रणम्य च पुनः शिवम्। <br> अतिष्ठद्भगवान् ब्रह्मा देवैरिन्द्रपुरोगमैः ॥ ६४ | तत्पश्चात् उन दोनोंको पाद्य जल देकर और शम्भुको आचमन, मधुपर्क तथा गौ प्रदान करके पुनः शिवको प्रणाम करके भगवान् ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओंके साथ स्थित हो बैठ गये॥ ६३-६४॥ |