श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ५४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मणा मुनिभिः सार्धं देवदेवमुमापतिम्। | अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। सभी वेदोंने शरीर धारण करके ब्रह्मा तथा मुनियोंके साथ उन देवदेव उमापति महेश्वरको प्रणाम किया॥ ५१-५२ १/२ ॥ |
| देवोऽपि देवीमालोक्य सलज्जां हिमशैलजाम् ॥ ५३ <br><br> न तृप्यत्यनवद्याङ्गी सा च देवं वृषध्वजम्। <br> वरदोऽस्मीति तं प्राह हरिं सोऽप्याह शङ्करम् ॥ ५४ <br><br> त्वयि भक्तिः प्रसीदेति ब्रह्माख्यां च ददौ तु सः। <br> ततस्तु पुनरेवाह ब्रह्मा विज्ञापयन् प्रभुम् ॥ ५५ <br><br> हविर्जुहोमि वह्नौ तु उपाध्यायपदे स्थितः। <br> ददासि मम यद्याज्ञां कर्तव्यो ह्यकृतो विधिः ॥ ५६ | लज्जासे भरी हुई देवी पार्वतीको देखकर शिव तृप्त नहीं होते थे और दूषणरहित शरीरवाली वे [पार्वती] भी देवदेव वृषभध्वजको देखकर तृप्त नहीं होती थीं। तब शिवने विष्णुसे कहा—'मैं वरदाता हूँ।' इसपर उन्होंने भी शंकरसे कहा—'आपमें मेरी भक्ति बनी रहे; मुझपर प्रसन्न होइये।' तब शिवने उन्हें ब्रह्मत्व प्रदान किया। इसके बाद ब्रह्माने पुनः प्रभुसे प्रार्थना करते हुए कहा—'मैं उपाध्याय (आचार्य)-के पदपर स्थित होकर अग्निमें हवन करता हूँ और यदि आप आज्ञा दें, तो जो विधि अभीतक नहीं की गयी है, उसे सम्पन्न करूँ'॥ ५३—५६ ॥ |
| तमाह शङ्करो देवं देवदेवो जगत्पतिः। <br> यद्यदिष्टं सुरश्रेष्ठ तत्कुरुष्व यथेप्सितम् ॥ ५७ <br><br> कर्तास्मि वचनं सर्वं देवदेव पितामह। | तब जगत्के स्वामी देवदेव शंकरने उन देव ब्रह्मासे कहा—'हे सुरश्रेष्ठ! जो-जो अभीष्ट हो, उसे आप इच्छानुसार कीजिये। हे देवदेव! हे पितामह! मैं [आपके] समस्त वचनका पालन करूँगा'॥ ५७ १/२ ॥ |
| ततः प्रणम्य हृष्टात्मा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ५८ <br><br> हस्तं देवस्य देव्याश्च युयोज परमं प्रभुः। <br> ज्वलनश्च स्वयं तत्र कृताञ्जलिरुपस्थितः ॥ ५९ <br><br> श्रौतैस्तैर्महामन्त्रैमूर्तिमद्भिरुपस्थितैः । <br> यथोक्तविधिना हुत्वा लाजानपि यथाक्रमम् ॥ ६० <br><br> आनीतान् विष्णुना विप्रान् सम्पूज्य विविधैर्वरैः। <br> त्रिश्च तं ज्वलनं देवं कारयित्वा प्रदक्षिणम् ॥ ६१ <br><br> मुक्त्वा हस्तसमायोगं सहितैः सर्वदैवतैः। <br> सुरैश्च मानवैः सर्वैः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ६२ <br><br> ननाम भगवान् ब्रह्मा देवदेवमुमापतिम्। | तदनन्तर [उन्हें] प्रणाम करके प्रसन्नचित्त परम प्रभु लोकपितामह ब्रह्माने शिव तथा देवी [पार्वती]-के हाथोंको [परस्पर] मिला दिया। स्वयं अग्निदेव हाथ जोड़े हुए वहाँ उपस्थित हुए। [साक्षात्] मूर्त्तिमान् होकर उपस्थित वैवाहिक श्रौत महामन्त्रोंके द्वारा यथोक्त विधिसे हवन करनेके अनन्तर विष्णुके द्वारा लाये गये लाजा (धानका लावा)-का भी यथाक्रम हवन करके विविध गोदानोंसे विप्रोंकी पूजाकर पुनः तीन बार अग्निदेवकी प्रदक्षिणा कराकर उनके मिले हुए हाथको मुक्त कराकर भगवान् ब्रह्माने प्रसन्न मनसे सभी देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंके साथ देवदेव उमापतिको प्रणाम किया॥ ५८—६२ १/२ ॥ |
| ततः पाद्यं तयोर्दत्वा शम्भोराचमनं तथा ॥ ६३ <br><br> मधुपर्कं तथा गां च प्रणम्य च पुनः शिवम्। <br> अतिष्ठद्भगवान् ब्रह्मा देवैरिन्द्रपुरोगमैः ॥ ६४ | तत्पश्चात् उन दोनोंको पाद्य जल देकर और शम्भुको आचमन, मधुपर्क तथा गौ प्रदान करके पुनः शिवको प्रणाम करके भगवान् ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओंके साथ स्थित हो बैठ गये॥ ६३-६४॥ |
अध्याय १०३ ] भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा ५४९
| भृग्वाद्या मुनयः सर्वे चाक्षतैस्तिलतण्डुलैः।<br>सूर्यादयः समभ्यर्च्य तुष्टुवुर्वृषभध्वजम्॥ ६५ | समस्त भृगु आदि मुनियों तथा सूर्य आदि ग्रहोंने अक्षतों तथा तिल-तण्डुलोंसे वृषभध्वजका अर्चन करके उनकी स्तुति की॥ ६५॥ |
| शिवः समाप्य देवोक्तं वह्निमारोप्य चात्मनि।<br>तया समागतो रुद्रः सर्वलोकहिताय वै॥ ६६ | तत्पश्चात् वे रुद्र शिव ब्रह्मोक्त समस्त [वैवाहिक] कृत्य सम्पन्न करके तथा अग्निको अपनेमें आरोपित करके सभी लोकोंके हितके लिये उन पार्वतीके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए॥ ६६॥ |
| यः पठेच्छृणुयाद्वापि भवोद्वाहं शुचिस्मितः।<br>श्रावयेद्वा द्विजान् शुद्धान् वेदवेदाङ्गपारगान्॥ ६७ | जो [व्यक्ति] पवित्र होकर प्रसन्नतापूर्वक शिवके विवाह-आख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है अथवा वेद-वेदांगमें पारंगत शुद्ध द्विजोंको सुनाता है, वह गणपति-पद प्राप्त करके शिवके साथ आनन्दित होता है। जहाँ भी ब्राह्मणोंद्वारा इस विवाह-प्रसंगको कहा जाता है, वहाँपर शिवजी विराजमान रहते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। अतः हे द्विजो! विधिवत् उनकी पूजा करके इस आख्यानको अवश्य कहना चाहिये। हे उत्तम ब्राह्मणो! श्रेष्ठ द्विजों तथा क्षत्रियोंके विवाहमें इस अत्युत्तम सम्पूर्ण शिवविवाह-प्रसंगका कीर्तन करना चाहिये॥ ६७-६९^{१}/_२॥ |
| स लब्ध्वा गाणपत्यं च भवेन सह मोदते।<br>यत्रायं कीर्त्यते विप्रैस्तावदास्ते तदा भवः॥ ६८ | |
| तस्मात्सम्पूज्य विधिवत्कीर्तयेनान्यथा द्विजाः।<br>उद्वाहे च द्विजेन्द्राणां क्षत्रियाणां द्विजोत्तमाः॥ ६९ | |
| कीर्तनीयमिदं सर्वं भवोद्वाहमनुत्तमम्। | |
| कृतोद्वाहस्तदा देव्या हैमवत्या वृषभध्वजः॥ ७०<br>सगणो नन्दिना सार्धं सर्वदेवगणैर्वृतः।<br>पुरीं वाराणसीं दिव्यामाजगाम महाद्युतिः॥ ७१ | तब विवाह कर लेनेके उपरान्त महाकान्तिसम्पन्न शिवजी [अपने] गणों, नन्दी तथा देवी पार्वतीके साथ दिव्य वाराणसीपुरीमें आये॥ ७०-७१॥ |
| अविमुक्ते सुखासीनं प्रणम्य वृषभध्वजम्।<br>अपृच्छत् क्षेत्रमाहात्म्यं भवानी हर्षितानना॥ ७२ | इसके बाद हर्षयुक्त मुखमण्डलवाली भवानी अविमुक्त (वाराणसी)-में सुखपूर्वक आसीन वृषभध्वजको प्रणाम करके [उस] क्षेत्रका माहात्म्य पूछने लगीं॥ ७२॥ |
| अथाहार्धेन्दुतिलकः क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>अविमुक्तस्य माहात्म्यं विस्तराच्छक्यते नहि॥ ७३ | तब अर्धचन्द्रको तिलकरूपमें धारण करनेवाले शिवजी उत्तम क्षेत्रमाहात्म्यका वर्णन करने लगे—'हे सुरेशानि! मेरे द्वारा अविमुक्तक्षेत्रका माहात्म्य विस्तारपूर्वक नहीं कहा जा सकता है; यह क्षेत्र ऋषियोंद्वारा पूजित है। हे देवि! मैं अविमुक्तक्षेत्रमें होनेवाले पुण्यफलका वर्णन कैसे करूँ, जहाँपर मरनेवाले पापियोंकी एक ही जन्ममें मुक्ति हो जाती है। [लोगोंद्वारा] अन्यत्र किया गया पाप वाराणसीमें नष्ट हो जाता है और वाराणसीमें किया गया पाप पिशाचयोनिरूपी नरककी प्राप्ति करानेवाला होता है। हजारों पाप करके मनुष्योंके लिये पिशाचत्व श्रेष्ठ है, किंतु काशीपुरीके बिना स्वर्गमें हजार बार इन्द्रपद |
| वक्तुं मया सुरेशानि ऋषिसङ्घाभिपूजितम्।<br>किं मया वर्ण्यते देवि ह्यविमुक्तफलोदयः॥ ७४ | |
| पापिनां यत्र मुक्तिः स्यान्मृतानामेकजन्मना।<br>अन्यत्र तु कृतं पापं वाराणस्यां व्यपोहति॥ ७५ | |
| वाराणस्यां कृतं पापं पैशाच्यनरकावहम्।<br>कृत्वा पापसहस्राणि पिशाचत्वं वरं नृणाम्॥ ७६ | |
| न तु शक्रसहस्रत्वं स्वर्गे काशीपुरीं विना।<br>यत्र त्रिविष्टपो देवो यत्र विश्वेश्वरो विभुः॥ ७७ |
१०४- गजाननका प्राकट्य करानेके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
| ५५० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| ओङ्कारेशः कृत्तिवासा मृतानां न पुनर्भवः।<br>उक्त्वा क्षेत्रस्य माहात्म्यं सङ्क्षेपाच्छशिशेखरः॥ ७८<br><br>दर्शयामास चोद्यानं परित्यज्य गणेश्वरान्।<br>तत्रैव भगवान् जातो गजवक्त्रो विनायकः॥ ७९<br><br>दैत्यानां विघ्नरूपार्थमविघ्नाय दिवौकसाम्।<br>एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमुत्तमम्॥ ८०<br><br>यथाश्रुतं मया सर्वं प्रसादाद्भोः सुशोभनम्॥ ८१ | प्राप्त करना भी श्रेष्ठ नहीं है। जहाँपर भगवान् त्रिविष्टप, विभु, विश्वेश्वर तथा कृत्तिवास ओंकारेश [सदा] विराजमान हैं, उस काशीमें मरनेवालोंका पुनर्जन्म नहीं होता'॥ ७३—७७ १/२॥<br>इस प्रकार संक्षेपमें क्षेत्रका माहात्म्य कहकर गणेश्वरोंको विदा करके चन्द्रशेखरने पार्वतीको [अपना] उद्यान दिखाया। भगवान् गजानन विनायक दैत्योंको विघ्न उत्पन्न करनेके लिये तथा देवताओंका विघ्न दूर करनेके लिये वहींपर उत्पन्न हुए थे। [हे ऋषियो!] मैंने आपलोगोंको कथाका सम्पूर्ण उत्तम तथा सुन्दर तत्त्व संक्षेपमें बता दिया, जैसा कि मैंने व्यासजीकी कृपासे सुना था॥ ७८—८१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पार्वतीविवाहवर्णनं नाम त्र्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १०३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पार्वतीविवाहवर्णन' नामक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०३॥
एक सौ चारवाँ अध्याय
गजाननका प्राकट्य करानेके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] गणोंके स्वामी गजानन विनायक कैसे उत्पन्न हुए; उनका प्रभाव कैसा है? इसे आप बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
| कथं विनायको जातो गजवक्त्रो गणेश्वरः।<br>कथं प्रभावस्तस्यैवं सूत वक्तुमिहार्हसि॥ १ | |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— हे द्विजो! इसी बीच इन्द्र तथा उपेन्द्रसहित देवतागण एकत्र होकर दैत्योंके धर्ममें विघ्न करनेके लिये प्रवृत्त हुए। हे विप्रो! [वे विचार करने लगे कि] असुर, यातुधान, क्रूर कर्मवाले राक्षस तथा पृथ्वीपर जो अन्य तमोगुणी तथा रजोगुणी लोग हैं, उन्होंने अविघ्नतापूर्वक कार्य करनेहेतु यज्ञ-दान आदिके द्वारा महेश्वर, ब्रह्मा तथा विष्णुकी सम्यक् पूजा करके अभीष्ट वर प्राप्त कर लिया है; अतः हे सुरश्रेष्ठो! सर्वदा हम लोगोंका पराभव हो रहा है। इसलिये उनके विघ्नके लिये, देवताओंके अविघ्नके लिये, स्त्रियोंको पुत्रप्राप्तिके लिये तथा पुरुषोंके कर्मकी सिद्धिके लिये आप सभीलोग विघ्नेश गणपति के सृजनहेतु शंकरकी स्तुति कीजिये॥ २—६॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समेत्य ते।<br>धर्मविघ्नं तदा कर्तुं दैत्यानामभवन् द्विजाः॥ २<br>असुरा यातुधानाश्च राक्षसाः क्रूरकर्मिणः।<br>तामसाश्च तथा चान्ये राजसाश्च तथा भुवि॥ ३<br>अविघ्नं यज्ञदानाद्यैः समभ्यर्च्य महेश्वरम्।<br>ब्रह्माणं च हरिं विप्रा लब्धेप्सितवरा यतः॥ ४<br>ततोऽस्माकं सुरश्रेष्ठाः सदाविजयसम्भवः।<br>तेषां ततस्तु विघ्नार्थमविघ्नाय दिवौकसाम्॥ ५<br>पुत्रार्थं चैव नारीणां नराणां कर्मसिद्धये।<br>विघ्नेशं शङ्करं स्रष्टुं गणपं स्तोतुमर्हथ॥ ६ | |
| इत्युक्त्वान्योन्यमनघं तुष्टुवुः शिवमिश्वरम्।<br>नमः सर्वात्मने तुभ्यं सर्वज्ञाय पिनाकिने॥ ७ | आपसमें ऐसा कहकर वे [देवता] निष्पाप ईश्वर |
अध्याय १०४] गजाननका प्राकट्य करानेके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति ५५१
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| अनघाय विरिञ्चाय देव्याः कार्यार्थदायिने।<br>अकायायार्थकायाय हरेः कायापहारिणे॥ ८<br><br>कायान्तस्थामृताधारमण्डलावस्थिताय ते।<br>कृतादिभेदकालाय कालवेगाय ते नमः॥ ९ | शिवकी स्तुति करने लगे—आप सर्वात्मा, सर्वज्ञ तथा पिनाकधारीको नमस्कार है। निष्पाप, विशेष रूपसे ब्रह्माण्डकी रचना करनेवाले, देवी [पार्वती]-को तपस्याका फल प्रदान करनेवाले, कायारहित, प्रयोजनके लिये शरीर धारण करनेवाले, विष्णुकी कायाका अपहरण करनेवाले, देहके भीतर अमृताधार-मण्डलमें विराजमान रहनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। कृत (सत्ययुग) आदि कालभेदोंको उत्पन्न करनेवाले तथा कालवेग आप [शिव]-को नमस्कार है॥ ७–९॥ |
| कालाग्निरूद्ररूपाय धर्माद्यष्टपदाय च।<br>कालीविशुद्धदेहाय कालिकाकारणाय ते॥ १० | कालाग्निके समान भयंकर रूपवाले, धर्म आदि आठ पदों (स्थानों) वाले, महाकालीको विशुद्ध (गौर) देह करनेवाले तथा कालिका (चण्डिका)-की उत्पत्ति करनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १०॥ |
| कालकण्ठाय मुख्याय वाहनाय वराय ते।<br>अम्बिकापतये तुभ्यं हिरण्यपतये नमः॥ ११ | कालकण्ठ, प्रधानस्वरूप, वाहन (कर्मफलकी प्राप्ति करानेवाले) तथा सर्वश्रेष्ठ आप [शिव]-को नमस्कार है। अम्बिकापति तथा हिरण्यपति आप [शिव]-को नमस्कार है॥ ११॥ |
| हिरण्यरेतसे चैव नमः शर्वाय शूलिने।<br>कपालदण्डपाशासिचर्माङ्कुशधराय च॥ १२<br><br>पतये हैमवत्याश्च हेमशुक्लाय ते नमः।<br>पीतशुक्लाय रक्षार्थं सुराणां कृष्णवर्त्मने॥ १३ | हिरण्यरेता, शर्व, शूली और कपाल-दण्ड-पाश-असि-चर्म-अंकुश धारण करनेवाले [शिव]-को नमस्कार है। पार्वतीपति, सुवर्णके समान शुक्ल (शुद्ध), [अर्धनारीश्वररूप होनेके कारण] पीत-शुक्ल वर्णवाले तथा देवताओंकी रक्षाके लिये अग्निरूपवाले आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १२–१३॥ |
| पञ्चमाय महापञ्चयज्ञिनां फलदाय च।<br>पञ्चास्यफणिहाराय पञ्चाक्षरमयाय ते॥ १४<br><br>पञ्चधा पञ्चकैवल्यदेवैरर्चितमूर्तये।<br>पञ्चाक्षरदृशे तुभ्यं परात्परतराय ते॥ १५ | तुरीयातीत, [देवयज्ञ आदि] पंच महायज्ञोंके कर्ताओंको फल देनेवाले, पंचमुख सर्पको हारके रूपमें धारण करनेवाले तथा पंचाक्षर [मन्त्र]-मय आप [शिव]-को नमस्कार है। पाँच प्रकारसे [रुद्र आदि] पंच कैवल्य देवोंद्वारा पूजित मूर्तिवाले, पंचाक्षर मन्त्ररूप दृष्टिवाले तथा परात्परतर आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १४–१५॥ |
| षोडशस्वरवज्राङ्गवक्त्रायाक्षयरूपिणे ।<br>कादिपञ्चकहस्ताय चादिहस्ताय ते नमः॥ १६<br><br>टादिपादाय रुद्राय तादिपादाय ते नमः।<br>पादिमेण्द्राय यद्यङ्गधातुसप्तकधारिणे॥ १७ | [अकार आदि] सोलह स्वरमय वज्रके समान [अभेद्य] अंगों तथा मुखवाले, अक्षय रूपवाले, 'क' से प्रारम्भ होनेवाले पाँच अक्षररूप हाथवाले, 'च' आदि [पाँच वर्णरूप] हाथवाले, 'ट' आदि [पाँच वर्णरूप] पादवाले, 'त' आदि [पाँच वर्णरूप] पादवाले, 'प' आदि |
| ५५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| सान्तात्मरूपिणे साक्षात्क्षदन्तक्रोधिने नमः।<br>लवरेफहळाङ्गाय निरङ्गाय च ते नमः॥ १८ | [पाँच वर्णरूप] मेढ्र (लिंग) वाले, 'य'कारमय अंगसम्बन्धी सात धातुओंको धारण करनेवाले आप रुद्रको नमस्कार है। श-ष-स वर्णमय आत्मरूपवाले तथा 'क्ष' कारमय प्रलयस्वरूप क्रोधवाले [शिवको] नमस्कार है। ल, व, रेफ, ह, ळ—पाँच वर्णरूप हृदयोंवाले तथा निरंग आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १६-१८॥ | | सर्वेषामेव भूतानां हृदि निःस्वनकारिणे।<br>भ्रुवोरन्ते सदासद्भिर्दृष्टायात्यन्तभानवे॥ १९<br><br>भानुसोमाग्निनेत्राय परमात्मस्वरूपिणे।<br>गुणत्रयोपरिस्थाय तीर्थपादाय ते नमः॥ २० | सभी प्राणियोंके हृदयमें अनाहत ध्वनि करनेवाले, भक्तोंके द्वारा भ्रुवोंके मध्य सदा दिखायी देनेवाले, अत्यन्त भानु (सर्वप्रकाशक), सूर्य-चन्द्र-अग्निरूप नेत्रवाले, परमात्म-स्वरूपी, तीनों गुणोंसे ऊपर स्थित तथा तीर्थरूप पादवाले आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १९-२०॥ | | तीर्थतत्त्वाय साराय तस्मादपि पराय ते।<br>ऋग्यजुःसामवेदाय ओङ्काराय नमो नमः॥ २१ | तीर्थरूप तत्त्ववाले, सारस्वरूप (तीर्थफलरूप) और उस तीर्थफलके भी अधिष्ठाता आप [शिव]-को नमस्कार है। ऋक्-यजुः-सामवेदस्वरूप तथा ओंकारस्वरूप [शिव]-को बार-बार नमस्कार है॥ २१॥ | | ओङ्कारे त्रिविधं रूपमास्थायोपरिवासिने।<br>पीताय कृष्णवर्णाय रक्तायात्यन्ततेजसे॥ २२<br><br>स्थानपञ्चकसंस्थाय पञ्चधाण्डबहिःक्रमात्।<br>ब्रह्मणे विष्णवे तुभ्यं कुमाराय नमो नमः॥ २३ | [ब्रह्मा, विष्णु, हर] तीन प्रकारके रूपको धारण करके प्रणवान्तनादमें तुरीयरूपसे स्थित रहनेवाले, पीत-कृष्ण-रक्त वर्णवाले, अपरिमित तेजवाले, ब्रह्माण्डके बाहर क्रमसे पाँच प्रकारसे [जल आदि] पाँच स्थानोंमें स्थित रहनेवाले और ब्रह्मा-विष्णु-कुमारस्वरूप आप [शिव]-को बार-बार नमस्कार है॥ २२-२३॥ | | अम्बायाः परमेशाय सर्वोपरिचराय ते।<br>मूलसूक्ष्मस्वरूपाय स्थूलसूक्ष्माय ते नमः॥ २४ | अम्बिकाके परमेश्वर तथा सबके ऊपर विचरण करनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। मूल सूक्ष्म स्वरूपवाले तथा स्थूल-सूक्ष्मस्वरूप आप [शिव]-को नमस्कार है॥ २४॥ | | सर्वसङ्कल्पशून्याय सर्वस्माद्रक्षिताय ते।<br>आदिमध्यान्तशून्याय चित्संस्थाय नमो नमः॥ २५ | समस्त संकल्पोंसे रहित, सबसे रक्षित (गुप्त), आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा ज्ञानमें स्थित आप [शिव]-को बार-बार नमस्कार है॥ २५॥ | | यमाग्निवायुरुद्राम्बुसोमशक्रनिशाचरैः ।<br>दिङ्मुखे दिङ्मुखे नित्यं सगणैः पूजिताय ते॥ २६<br><br>सर्वेषु सर्वदा सर्वमार्गे सम्पूजिताय ते।<br>रुद्राय रुद्रनीलाय कद्रुद्राय प्रचेतसे।<br>महेश्वराय धीराय नमः साक्षात् शिवाय ते॥ २७ | गणोंसहित यम, अग्नि, वायु, रुद्र, वरुण, सोम, इन्द्र तथा निशाचरोंके द्वारा दिशाओं-विदिशाओंमें नित्य पूजित आप [शिव]-को नमस्कार है। सभी लोकोंमें तथा सभी मार्गोंमें सर्वदा पूजित आपको नमस्कार है। रुद्र, रुद्रनील, कद्रुद्र, प्रचेता, महेश्वर, धीर साक्षात् आप शिवको नमस्कार है॥ २६-२७॥ | | अथ शृणु भगवन् स्तवच्छलेन<br>कथितमजेन्द्रमुखैः सुरासुरेशैः। | हे भगवन्! सुनिये; देवताओं तथा दैत्योंके स्वामी |
१०५- विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा
अध्याय १०५ ] विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा ५५३
| मखमदनयमाग्निदक्षयज्ञ-<br>क्षपणविचित्रविचेष्टितं क्षमस्व ॥ २८<br><br>सूत उवाच<br>यः पठेत्तु स्तवं भक्त्या शक्राग्निप्रमुखैः सुरैः।<br>कीर्तितं श्रावयेद्विद्वान् स याति परमां गतिम्॥ २९ | ब्रह्मा-इन्द्र आदिने मख, कामदेव, यम, अग्नि तथा दक्षयज्ञके विध्वंसरूपी आपके विचित्र क्रिया-कलापका वर्णन स्तुतिके बहाने किया है; आप क्षमा करें॥ २८॥<br><br>सूतजी बोले—जो विद्वान् [व्यक्ति] इन्द्र, अग्नि आदि प्रधान देवताओंके द्वारा किये गये इस स्तवको भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा [दूसरोंको] सुनाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है॥ २९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवस्तुतिर्नाम चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवस्तुति' नामक एक सौ चारवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०४॥
एक सौ पाँचवाँ अध्याय
विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा
| सूत उवाच<br>यदा स्थिताः सुरेश्वराः प्रणम्य चैवमीश्वरम्।<br>तदाम्बिकापतिर्भवः पिनाकधृङ् महेश्वरः॥ १<br><br>ददौ निरीक्षणं क्षणाद्भवः स तान् सुरोत्तमान्।<br>प्रणेमुरादराद्धरं सुरा मुदार्द्रलोचनाः॥ २ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] शिवजीको प्रणाम करके जब सुरेश्वर लोग [यथास्थान] स्थित हो गये, तब अम्बिकापति, पिनाकधारी, भव महेश्वरने उन श्रेष्ठ देवताओंको क्षणभरमें दिव्य दृष्टि प्रदान की। तब अश्रुसे भीगे नेत्रवाले देवताओंने प्रसन्नतासे युक्त होकर आदरपूर्वक शिवको प्रणाम किया॥ १-२॥ |
|---|---|
| भवः सुधामृतोपमैर्निरीक्षणैर्निरीक्षणात्।<br>तदाह भद्रमस्तु वः सुरेश्वरान् महेश्वरः॥ ३ | इसके बाद महेश्वर भवने सुधामृततुल्य दृष्टिसे देखकर सुरेश्वरोंसे कहा—'आपलोगोंका कल्याण हो'॥ ३॥ |
| वरार्थमीश वीक्ष्य ते सुरा गृहं गतास्त्विमे।<br>प्रणम्य चाह वाक्पतिः पतिं निरीक्ष्य निर्भयः॥ ४<br><br>सुरेतरादिभिः सदा ह्यविघ्नमर्थितो भवान्।<br>समस्तकर्मसिद्धये सुरापकारकारिभिः॥ ५<br><br>ततः प्रसीदताद्भवान् सुविघ्नकर्मकारणम्।<br>सुरापकारकारिणामिहैष एव नो वरः॥ ६ | तदनन्तर स्वामी शिवको देखकर निर्भय होकर बृहस्पतिने उन्हें प्रणाम करके कहा—'हे ईश! ये देवता आपका दर्शन करके वरप्राप्तिके लिये आपके घर आये हुए हैं। देवताओंका अपकार करनेवाले दैत्यों आदिके द्वारा निर्विघ्नतापूर्वक समस्त कर्मोंकी सिद्धिके लिये आप सदा प्रार्थित हैं। अतः आप देवताओंके अपकारी दैत्योंके विघ्नयुक्त कर्मका कारण बनिये और प्रसन्न होइये; यही हमलोगोंका वर है'॥ ४–६॥ |
| ततस्तदा निशम्य वै पिनाकधृक् सुरेश्वरः।<br>गणेश्वरं सुरेश्वरं वपुर्दधार सः शिवः॥ ७<br><br>गणेश्वराश्च तुष्टुवुः सुरेश्वरा महेश्वरम्।<br>समस्तलोकसम्भवं भवार्तिहारिणं शुभम्॥ ८ | तब यह सुनकर उन पिनाकधारी सुरेश्वर शिवने देवताओंके स्वामी गणेश्वरका शरीर धारण किया। तदनन्तर गणेश्वरों तथा [ब्रह्मा आदि] सुरेश्वरोंने समस्त लोकोंको उत्पन्न करनेवाले तथा संसारका कष्ट दूर करनेवाले शुभ [गजाननरूपी] महेश्वरकी स्तुति की॥ ७-८॥ |
| इभाननाश्रितं वरं त्रिशूलपाशधारिणम्।<br>समस्तलोकसम्भवं गजाननं तदाम्बिका॥ ९ | इसके बाद अम्बिका [पार्वती]-ने हाथीके समान मुख धारण किये हुए और [हाथोंमें] त्रिशूल तथा पाश |
| ५५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लिये हुए समस्त लोकोंके उत्पादक कल्याणकारी गजाननको जन्म दिया॥ ९॥ | |
| ददुः पुष्पवर्षं हि सिद्धा मुनीन्द्रा-<br>स्तथा खेचरा देवसङ्घास्तदानीम्।<br>तदा तुष्टुवुश्चैकदन्तं सुरेशाः<br>प्रणेमुर्गणेशं महेशं वितन्द्राः॥ १० | उस समय सिद्धों, मुनियों, आकाशचारियों तथा देवताओंने पुष्पवृष्टि की; तब सुरेश्वरोंने आलस्यरहित होकर एकदन्त महेश्वर गणेशको प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की॥ १०॥ |
| तदा तयोर्विनिर्गतः सुभैरवः समूर्तिमान्।<br>स्थितो ननर्त बालकः समस्तमङ्गलालयः॥ ११<br><br>विचित्रवस्त्रभूषणैरलङ्कृतो गजाननः।<br>महेश्वरस्य पुत्रकोऽभिवन्द्य तातमम्बिकाम्॥ १२ | उस समय उन शिवा-शिवसे उत्पन्न, विचित्र वस्त्र-आभूषणोंसे अलंकृत तथा सभी मंगलोंका आलय महेश्वर-पुत्र वह बालक गजानन मूर्तिमान् सुन्दर भैरवकी भाँति स्थित होकर पिता [शिव] तथा माताकी वन्दना करके नृत्य करने लगा॥ ११-१२॥ |
| जातमात्रं सुतं दृष्ट्वा चकार भगवान् भवः।<br>गजाननाय कृत्यांस्तु सर्वान् सर्वेश्वरः स्वयम्॥ १३ | उत्पन्न हुए पुत्रको देखकर भगवान् सर्वेश्वर भवने गजाननके लिये सभी [जातकर्म आदि] संस्कारोंको स्वयं किया॥ १३॥ |
| आदाय च कराभ्यां च सुसुखाभ्यां भवः स्वयम्।<br>आलिङ्ग्याघ्राय मूर्धानं महादेवो जगद्गुरुः॥ १४<br><br>तवावतारो दैत्यानां विनाशाय ममात्मज।<br>देवानामपकारार्थं द्विजानां ब्रह्मवादिनाम्॥ १५<br><br>यज्ञश्च दक्षिणाहीनः कृतो येन महीतले।<br>तस्य धर्मस्य विघ्नं च कुरु स्वर्गपथे स्थितः॥ १६ | इसके बाद जगद्गुरु महादेव भवने स्वयं [अपने] परम सुखदायक हाथोंसे उसे उठाकर, आलिंगन करके तथा उसके सिरको सूँघकर कहा—'हे मेरे पुत्र ! तुम्हारा अवतार दैत्योंके विनाशके लिये और देवताओं तथा ब्रह्मवादी द्विजोंके उपकारके लिये हुआ है। जिसने पृथ्वीतलपर दक्षिणाविहीन यज्ञ किया है, तुम स्वर्गपथमें स्थित रहते हुए उसके धर्ममें विघ्न डालो। इस पृथ्वीतलपर जो |
अध्याय १०५ ] विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा [ ५५५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अध्यापनं चाध्ययनं व्याख्यानं कर्म एव च।<br>योऽन्यायतः करोत्यस्मिंस्तस्य प्राणान् सदा हर॥ १७<br><br>वर्णाच्च्युतानां नारीणां नराणां नरपुङ्गव।<br>स्वधर्मरहितानां च प्राणानपहर प्रभो॥ १८<br><br>याः स्त्रियस्त्वां सदा कालं पुरुषाश्च विनायक।<br>यजन्ति तासां तेषां च त्वत्साम्यं दातुमर्हसि॥ १९<br><br>त्वं भक्तान् सर्वयत्नेन रक्ष बालगणेश्वर।<br>यौवनस्थांश्च वृद्धांश्च इहामुत्र च पूजितः॥ २०<br><br>जगतत्रयेऽत्र सर्वत्र त्वं हि विघ्नगणेश्वरः।<br>सम्पूज्यो वन्दनीयश्च भविष्यसि न संशयः॥ २१<br><br>मां च नारायणं वापि ब्रह्माणमपि पुत्रक।<br>यजन्ति यज्ञैर्वा विप्रैरग्रे पूज्यो भविष्यसि॥ २२<br><br>त्वामनभ्यर्च्य कल्याणं श्रौतं स्मार्तं च लौकिकम्।<br>कुरुते तस्य कल्याणमकल्याणं भविष्यति॥ २३<br><br>ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्चैव गजानन।<br>सम्पूज्य सर्वसिद्धयर्थं भक्ष्यभोज्यादिभिः शुभैः॥ २४<br><br>त्वां गन्धपुष्पधूपाद्यैरनभ्यर्च्य जगत्त्रये।<br>देवैरपि तथाऽन्यैश्च लब्धव्यं नास्ति कुत्रचित्॥ २५<br><br>अभ्यर्चयन्ति ये लोका मानवास्तु विनायकम्।<br>ते चार्चनीयाः शक्राद्यैर्भविष्यन्ति न संशयः॥ २६<br><br>अजं हरिं च मां वापि शक्रमन्यान् सुरानपि।<br>विघ्नैर्बाधयसि त्वां चेन्नार्चयन्ति फलार्थिनः॥ २७ | अन्यायपूर्वक अध्ययन, अध्यापन, व्याख्यान तथा [अन्य] कर्म करता हो; उसके प्राणोंको तुम सदा हरते रहो। हे नरश्रेष्ठ! हे प्रभो! वर्णसे च्युत तथा अपने धर्मसे रहित पुरुषों एवं स्त्रियोंके प्राणोंको हर लो। हे विनायक! जो स्त्रियाँ तथा पुरुष सदा कालरूप तुम्हारी पूजा करें, तुम उन्हें अपना साम्य प्रदान करो। हे बालगणेश्वर! तुम इस लोक तथा परलोकमें पूजित होकर युवा और वृद्ध भक्तोंकी रक्षा सम्पूर्ण प्रयत्नसे करो। तुम तीनों लोकोंमें सर्वत्र विघ्नगणेश्वरके रूपमें पूजनीय तथा वन्दनीय होओगे; इसमें संशय नहीं है। हे पुत्र! जो [विप्र] मेरी, विष्णुकी तथा ब्रह्माकी पूजा करते हैं अथवा [अग्निष्टोम आदि] यज्ञोंके द्वारा यजन करते हैं, उन ब्राह्मणोंके द्वारा भी सबसे पहले तुम पूज्य होओगे। तुम्हारी पूजा न करके जो कल्याणके लिये श्रौत-स्मार्त-लौकिक कर्म करेगा, उसका मंगल अमंगलके रूपमें परिवर्तित हो जायेगा। हे गजानन! तुम समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रोंके द्वारा शुभ भक्ष्य-भोज्य आदिसे भली-भाँति पूजाके योग्य होओगे। गन्ध, पुष्प, धूप आदिसे तुम्हारी पूजा किये बिना तीनों लोकोंमें कहीं भी देवताओं तथा अन्य लोगोंसे भी कुछ नहीं प्राप्त हो सकता है। जो मानव विनायककी पूजा करेंगे, वे इन्द्र आदिके द्वारा भी पूजनीय होंगे; इसमें सन्देह नहीं है। यदि फलकी इच्छा रखनेवाले तुम्हारी पूजा नहीं करते हों, तो वे चाहे ब्रह्मा, विष्णु, स्वयं मैं, इन्द्र अथवा अन्य देवता ही क्यों न हों, उन्हें तुम विघ्नोंसे बाधित करो'॥ १४-२७॥ |
| ससर्ज च तदा विघ्नगणं गणपतिः प्रभुः।<br>गणैः सार्धं नमस्कृत्याप्यतिष्ठत्तस्य चाग्रतः॥ २८ | तब प्रभु गणपतिने विघ्नगणोंको उत्पन्न किया और वे गणोंके साथ शिवजीको नमस्कार करके उनके आगे खड़े हो गये॥ २८॥ |
| तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन् पूजयन्ति गणेश्वरम्।<br>दैत्यानां धर्मविघ्नं च चकारासौ गणेश्वरः॥ २९<br><br>एतद्वः कथितं सर्वं स्कन्दाग्रजसमुद्भवम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा सुखी भवेत्॥ ३० | उसी समयसे लोग इस लोकमें गणपतिकी पूजा करने लगे और वे गणेश्वर दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालने लगे। [हे ऋषियो!] मैंने आप लोगोंको स्कन्द (कार्तिकेय)-के अग्रजकी उत्पत्तिका सम्पूर्ण आख्यान बता दिया। जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा सुनाता है, वह सुखी हो जाता है॥ २९-३०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विनायकोत्पत्तिर्नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विनायकोत्पत्ति' नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०५॥
१०६- दारुकासुरके विनाशके लिये भगवान् शिवद्वारा अपने शरीरसे काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना एवं शिवताण्डवनृत्यकी कथा
| ५५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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एक सौ छठा अध्याय
दारुकासुरके विनाशके लिये भगवान् शिवद्वारा अपने शरीरसे काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना एवं शिवताण्डवनृत्यकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ऋषय ऊचुः<br>नृत्यारम्भः कथं शम्भोः किमर्थं वा यथातथम्।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं श्रुतः स्कन्दाग्रजोद्भवः॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] हमलोगों ने स्कन्दके अग्रजका प्रादुर्भाव तो सुन लिया; अब आप हमलोगोंको यथार्थरूपसे यह बतायें कि शम्भुके नृत्यका आरम्भ कैसे तथा किसलिये हुआ?॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>दारुकोऽसुरसम्भूतस्तपसा लब्धविक्रमः।<br>सूदयामास कालाग्निरिव देवान् द्विजोत्तमान्॥ २ | **सूतजी बोले—**दारुक नामक एक दैत्य असुरोंमें उत्पन्न हुआ। तपस्यासे पराक्रम प्राप्त करके कालाग्निके समान वह [असुर] देवताओं तथा उत्तम द्विजोंको पीड़ित करने लगा॥ २॥ |
| दारुकेण तदा देवास्ताडिताः पीडिता भृशम्।<br>ब्रह्माणं च तथेशानं कुमारं विष्णुमेव च॥ ३<br>यममिन्द्रमनुप्राप्य स्त्रीवध्य इति चासुरः।<br>स्त्रीरूपधारिभिः स्तुत्यैर्ब्रह्माद्यैर्युधि संस्थितैः॥ ४ | उस समय वह दारुक ब्रह्मा, ईशान, कुमार, विष्णु, यम, इन्द्र आदिके पास पहुँचकर उन देवताओंको सताने लगा, इससे वे देवता बहुत पीड़ित हुए। 'यह असुर स्त्रीवध्य है'—ऐसा सोचकर स्त्रीरूपधारी तथा युद्धके लिये स्थित उन स्तुत्य ब्रह्मा आदिके साथ वह असुर युद्ध करने लगा॥ ३-४॥ |
| बाधितास्तेन ते सर्वे ब्रह्माणं प्राप्य वै द्विजाः।<br>विज्ञाप्य तस्मै तत्सर्वं तेन सार्धमुमापतिम्॥ ५<br>सम्प्राप्य तुष्टुवुः सर्वे पितामहपुरोगमाः।<br>ब्रह्मा प्राप्य च देवेशं प्रणम्य बहुधा नतः॥ ६<br>दारुणो भगवान् दारुः पूर्वं तेन विनिर्जिताः।<br>निहत्य दारुकं दैत्यं स्त्रीवध्यं त्रातुमर्हसि॥ ७ | हे द्विजो! तब उसके द्वारा बाधित किये गये वे सभी [देवतागण] ब्रह्माके पास पहुँचकर उनसे सब कुछ निवेदन करके पुनः उन [ब्रह्माके] साथ उमापतिके यहाँ जाकर पितामहको आगे करके [शिवकी] स्तुति करने लगे। इसके बाद देवेशके निकट जाकर अत्यन्त विनम्र होकर प्रणाम करके ब्रह्मा ने कहा—'हे भगवन्! दारुक महाभयंकर है; हमलोग उससे पहले ही पराजित हो चुके हैं। स्त्रीके द्वारा वध्य उस दैत्य दारुकका संहार करके आप हमलोगोंकी रक्षा कीजिये'॥ ५-७॥ |
| विज्ञप्तिं ब्रह्मणः श्रुत्वा भगवान् भगनेत्रहा।<br>देवीमुवाच देवेशो गिरिजां प्रहसन्निव॥ ८<br>भवतीं प्रार्थयाम्यद्य हिताय जगतां शुभे।<br>वधार्थं दारुकस्यास्य स्त्रीवध्यस्य वरानने॥ ९ | ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर भगके नेत्रोंको नष्ट करनेवाले भगवान् देवेशने देवी गिरिजासे हँसते हुए कहा—'हे शुभे! हे वरानने! मैं सभी लोकोंके हितके लिये इस स्त्रीवध्य दारुकके वधहेतु आज आपसे प्रार्थना करता हूँ'॥ ८-९॥ |
| अथ सा तस्य वचनं निशम्य जगतोऽरणिः।<br>विवेश देहे देवस्य देवेशी जन्मतत्परा॥ १०<br>एकेनांशेन देवेशं प्रविष्टा देवसत्तमम्।<br>न विवेद तदा ब्रह्मा देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः॥ ११ | तब उनका वचन सुनकर संसारको उत्पन्न करनेवाली उन देवेश्वरीने जन्मके लिये तत्पर होकर शिवके शरीरमें प्रवेश किया। वे [पार्वती] देवताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वरमें |
अध्याय १०६] भगवान् शिवद्वारा काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना [५५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गिरिजां पूर्ववच्छम्भोर्दृष्ट्वा पार्श्वस्थितां शुभाम्।<br>मायया मोहितस्तस्याः सर्वज्ञोऽपि चतुर्मुखः॥ १२ | अपने सोलहवें अंशसे प्रविष्ट हुईं; उस समय ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रधान देवता भी इसे नहीं जान पाये। मंगलमयी पार्वतीको पूर्ववत् शम्भुके समीप स्थित देखकर सब कुछ जाननेवाले ब्रह्मा भी उनकी मायासे मोहित हो गये थे॥ १०-१२॥ |
| सा प्रविष्टा तनुं तस्य देवदेवस्य पार्वती।<br>कण्ठस्थेन विषेणास्य तनुं चक्रे तदात्मनः॥ १३ | उन देवदेवके शरीरमें प्रविष्ट हुईं उन पार्वतीने उनके कण्ठमें स्थित विषसे अपने शरीरको बनाया॥ १३॥ |
| तां च ज्ञात्वा तथाभूतां तृतीयेनेक्षणेन वै।<br>ससर्ज कालीं कामारिः कालकण्ठीं कपर्दिनीम्॥ १४ | इसके बाद उन पार्वतीको विषभूता जानकर कामशत्रु [शिव]-ने अपने तीसरे नेत्रसे कालकण्ठी (कृष्णवर्णके कण्ठवाली) कपर्दिनी कालीको उत्पन्न किया॥ १४॥ |
| जाता यदा कालिमकालकण्ठी<br>जाता तदानीं विपुला जयश्रीः।<br>देवेतराणामजयस्त्वसिद्ध्या<br>तुष्टिर्भवान्याः परमेश्वरस्य॥ १५ | जब विषके कारण कृष्णवर्णके कण्ठवाली काली प्रादुर्भूत हुईं, उस समय विपुल विजयश्री भी उत्पन्न हुई। अब असिद्धिके कारण दैत्योंकी पराजय निश्चित है, इससे भवानी तथा परमेश्वर [शिव]-को प्रसन्नता हुई॥ १५॥ |
| जातां तदानीं सुरसिद्धसङ्घा<br>दृष्ट्वा भयाद्दुद्रुवुरग्निकल्पाम्।<br>कालीं गरालङ्कृतकालकण्ठी-<br>मुपेन्द्रपद्मोद्भवशक्रमुख्याः॥ १६ | विषसे अलंकृत कृष्णवर्णके कण्ठवाली तथा अग्निके सदृश स्वरूपवाली उस प्रादुर्भूत कालीको देखकर सभी देवता, सिद्धगण और विष्णु-ब्रह्मा-इन्द्र आदि प्रधान देवता भी उस समय भयके कारण भागने लगे॥ १६॥ |
| तथैव जातं नयनं ललाटे<br>सितांशुलेखा च शिरस्युदग्रा।<br>कण्ठे करालं निशितं त्रिशूलं<br>करे करालं च विभूषणानि॥ १७ | उनके ललाटमें शिवकी भाँति [तीसरा] नेत्र था, मस्तकपर अति तीव्र चन्द्ररेखा थी, कण्ठमें [कालकूट] विष था, हाथमें विकराल तीक्ष्ण त्रिशूल था और वे [सर्पोंके हार-कुण्डल आदि] आभूषण धारण किये हुए थीं॥ १७॥ |
| सार्धं दिव्याम्बरा देव्यः सर्वाभरणभूषिताः।<br>सिद्धेन्द्रसिद्धाश्च तथा पिशाचा जज्ञिरे पुनः॥ १८ | कालीके साथ दिव्य वस्त्र धारण किये हुईं तथा सभी आभूषणोंसे विभूषित देवियाँ, सिद्धोंके स्वामी, सिद्धगण तथा पिशाच भी उत्पन्न हुए॥ १८॥ |
| आज्ञया दारुकं तस्याः पार्वत्याः परमेश्वरी।<br>दानवं सूदयामास सूदयन्तं सुराधिपान्॥ १९ | तब उन पार्वतीकी आज्ञासे परमेश्वरी [काली]-ने सुराधिपोंको मारनेवाले असुर दारुकका वध कर दिया॥ १९॥ |
| संरम्भातिप्रसङ्गाद्वै तस्याः सर्वमिदं जगत्।<br>क्रोधाग्निना च विप्रेन्द्राः सम्बभूव तदातुरम्॥ २० | हे श्रेष्ठ विप्रो! उनके अतिशय वेग तथा क्रोधकी अग्निसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याकुल हो उठा। तब |
| भवोऽपि बालरूपेण श्मशाने प्रेतसङ्कुले।<br>रुरोद मायया तस्याः क्रोधाग्निं पातुमीश्वरः॥ २१ | ईश्वर भव भी मायासे बालरूप धारणकर उन कालीकी क्रोधाग्निको पीनेके लिये [काशीमें] श्मशानमें [जाकर] |
१०७- शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना
| ५५८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| रोने लगे॥ २०-२१॥ | |
|---|---|
| तं दृष्ट्वा बालमीशानं मायया तस्य मोहिता।<br>उत्थाप्याघ्राय वक्षोजं स्तनं सा प्रददौ द्विजाः॥ २२ | हे द्विजो! उन बालरूप ईशानको देखकर उनकी मायासे मोहित उन कालीने उन्हें उठाकर मस्तक सूंघकर अपना वक्षस्थित स्तन ग्रहण कराया॥ २२॥ |
| स्तनजेन तदा सार्धं कोपमस्याः पपौ पुनः।<br>क्रोधेनानेन वै बालः क्षेत्राणां रक्षकोऽभवत्॥ २३<br><br>मूर्तयोऽष्टौ च तस्यापि क्षेत्रपालस्य धीमतः।<br>एवं वै तेन बालेन कृता सा क्रोधमूर्च्छिता॥ २४ | तब वे बालरूप शिव दूधके साथ उनका क्रोध भी पी गये और इस प्रकार वे इस क्रोधसे क्षेत्रोंकी रक्षा करनेवाले हो गये। उन बुद्धिमान् क्षेत्रपाल [भैरव]-की भी आठ मूर्तियाँ हो गयीं। इस प्रकार वे काली उस बालकके द्वारा क्रोधमूर्च्छित (नष्ट संज्ञावाली) कर दी गयीं॥ २३-२४॥ |
| कृतमस्याः प्रसादार्थं देवदेवेन ताण्डवम्।<br>सन्ध्यायां सर्वभूतैन्द्रैः प्रेतैः प्रीतेन शूलिना॥ २५ | इसके बाद प्रीतियुक्त देवदेव शिवने इन [काली]-की प्रसन्नताके लिये सन्ध्याकालमें श्रेष्ठ भूतों तथा प्रेतोंके साथ ताण्डव [नृत्य] किया॥ २५॥ |
| पीत्वा नृत्तामृतं शम्भोराकण्ठं परमेश्वरी।<br>ननर्त सा च योगिन्यः प्रेतस्थाने यथासुखम्॥ २६ | शम्भुके नृत्यामृतका कण्ठपर्यन्त पान करके वे परमेश्वरी [उस] श्मशानमें सुखपूर्वक नाचने लगीं और योगिनियाँ भी उनके साथ नाचने लगीं॥ २६॥ |
| तत्र सब्रह्मका देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समन्ततः।<br>प्रणेमुस्तुष्टुवुः कालीं पुनर्देवीं च पार्वतीम्॥ २७ | वहाँपर ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्रसहित सभी देवताओंने सभी ओरसे कालीको तथा पुनः देवी पार्वतीको प्रणाम किया और उनकी स्तुति की॥ २७॥ |
| एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं ताण्डवं शूलिनः प्रभोः।<br>योगानन्देन च विभोः ताण्डवं चेति चापरे॥ २८ | [हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें शूलधारी प्रभुके ताण्डवनृत्यका वर्णन कर दिया; 'योगके आनन्दके कारण विभु [शिव]-का ताण्डव होता है'—ऐसा अन्य लोग कहते हैं॥ २८॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवताण्डवकथनं नाम षडधिकशततमोऽध्यायः॥ १०६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवताण्डवकथन' नामक एक सौ छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०६॥
एक सौ सातवाँ अध्याय
शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| पुरोपमन्युना सूत गाणपत्यं महेश्वरात्।<br>क्षीरार्णवः कथं लब्धो वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १ | हे सूतजी! पूर्वकालमें उपमन्युने महेश्वरसे गणाधिप पद प्राप्त करके पुनः क्षीरसागरको कैसे प्राप्त किया; आप इस समय बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| एवं कालीमुपालभ्य गते देवे त्र्यम्बके।<br>उपमन्युः समभ्यर्च्य तपसा लब्धवान् फलम्॥ २ | [हे ऋषियो!] इस प्रकार कालीको उत्पन्न करके त्रिनेत्र शिवके चले जानेपर उपमन्युने तपस्याके द्वारा उनकी पूजा करके फल प्राप्त किया था॥ २॥ |
अध्याय १०७ ] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५५१
| उपमन्युरिति ख्यातो मुनिश्च द्विजसत्तमाः।<br>कुमार इव तेजस्वी क्रीडमानो यदृच्छया॥ ३<br><br>कदाचित्क्षीरमल्पं च पीतवान् मातुलाश्रमे।<br>ईर्ष्यया मातुलसुतो ह्यपिबत् क्षीरमुत्तमम्॥ ४ | हे श्रेष्ठ द्विजो! 'उपमन्यु'—इस नामसे प्रसिद्ध एक मुनि थे; कुमारके समान तेजस्वी उन्होंने किसी समय स्वेच्छानुसार खेलते हुए [अपने] मामाके आश्रममें थोड़ा-सा दूध पी लिया, तब ईर्ष्याके कारण उनके मामाके पुत्रने उत्तम दुग्धका पान किया॥ ३-४॥ |
|---|---|
| पीत्वा स्थितं यथाकामं दृष्ट्वा प्रोवाच मातरम्।<br>मातर्मातर्महाभागे मम देहि तपस्विनि॥ ५<br><br>गव्यं क्षीरमतिस्वादु नाल्पमुष्णं नमाम्यहम्। | तब इच्छानुसार दुग्ध पीकर उसे पासमें खड़ा देखकर उपमन्युने अपनी मातासे कहा—हे मातः! हे महाभागे! हे तपस्विनि! आप मुझको गायका दुग्ध दीजिये, जो अत्यन्त स्वादिष्ट हो, गर्म हो तथा अल्प न हो; मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ५ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>उपलालितैवं पुत्रेण पुत्रमालिङ्ग्य सादरम्॥ ६<br><br>दुःखिता विललापार्ता स्मृत्वा नैर्धन्यमात्मनः।<br>स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः क्षीरमुपमन्युरपि द्विजाः।<br>देहि देहीति तामाह रोदमानो महाद्युतिः॥ ७ | सूतजी बोले—इस प्रकार पुत्रके द्वारा स्नेह-पूर्वक कही गयी वह बात सुनकर माता आदरके साथ पुत्रका आलिंगन करके दुःखित हो गयी और अपनी निर्धनताका स्मरणकर व्याकुल होकर विलाप करने लगी। हे द्विजो! बार-बार दूधका स्मरण करके महातेजस्वी उपमन्यु भी मातासे रोते हुए यही कहते थे—'मुझे दो, मुझे दो'॥ ६-७॥ |
| उञ्छवृत्त्यार्जितान् बीजान् स्वयं पिष्ट्वा च सा तदा।<br>बीजपिष्टं तदालोड्य तोयेन कलभाषिणी॥ ८<br><br>एह्येहि मम पुत्रेति सामपूर्वं ततः सुतम्।<br>आलिङ्ग्यादाय दुःखार्ता प्रददौ कृत्रिमं पयः॥ ९ | तत्पश्चात् उंछवृत्ति (फसल कट जानेके बाद खेतमें पड़े दानोंको बटोरना)-से अर्जित बीजोंको स्वयं पीसकर पुनः बीजके उस आटेको जलके साथ मिलाकर मधुरभाषिणी वह माता बोली, 'हे मेरे पुत्र! आओ, आओ।' इसके बाद सान्त्वनापूर्वक पुत्रको पकड़कर आलिंगन करके दुःखसे व्याकुल माताने उसे कृत्रिम दुग्ध दे दिया॥ ८-९॥ |
| पीत्वा च कृत्रिमं क्षीरं मात्रा दत्तं द्विजोत्तमः।<br>नैतत्क्षीरमिति प्राह मातरं चातिविह्वलः॥ १० | तब माताके द्वारा दिये गये उस कृत्रिम दुग्धको पीकर द्विजश्रेष्ठ [उपमन्यु]-ने अति विह्वल होकर मातासे कहा—'यह दूध नहीं है'॥ १०॥ |
| दुःखिता सा तदा प्राह सम्प्रेक्ष्याघ्राय मूर्धनि।<br>सम्मार्ज्य नेत्रे पुत्रस्य कराभ्यां कमलायते॥ ११ | तब दुःखसे भरी हुई उस माताने बालककी ओर देखकर उसका मस्तक सूँघकर अपने हाथोंसे पुत्रके कमलसदृश विशाल नेत्रोंको पोंछकर कहा— |
| तटिनी रत्नपूर्णास्ते स्वर्गपातालगोचराः।<br>भाग्यहीना न पश्यन्ति भक्तिहीनाश्च ये शिवे॥ १२ | '[हे पुत्र!] जो शिवके प्रति भक्तिरहित हैं, वे भाग्यहीन लोग रत्नोंसे परिपूर्ण तथा स्वर्ग-पातालमें गोचर होनेवाली नदियोंको नहीं देख पाते हैं। |
| राज्यं स्वर्गं च मोक्षं च भोजनं क्षीरसम्भवम्।<br>न लभन्ते प्रियाण्येषां नो तुष्यति सदा भवः॥ १३ | शिवजी जिनके ऊपर सदा प्रसन्न नहीं रहते हैं, वे लोग राज्य, स्वर्ग, मोक्ष और दुग्धसे बने हुए भोजन तथा अन्य प्रिय वस्तुओंको नहीं प्राप्त कर सकते |
| ५६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| भवप्रसादजं सर्वं नान्यदेवप्रसादजम्।<br>अन्यदेवेषु निरता दुःखार्ता विभ्रमन्ति च॥ १४<br><br>क्षीरं तत्र कुतोऽस्माकं महादेवो न पूजितः।<br>पूर्वजन्मनि यद्दत्तं शिवमुद्दिश्य वै सुत॥ १५<br><br>तदेव लभ्यं नान्यत्तु विष्णुमुद्दिश्य वा प्रभुम्।<br>निशम्य वचनं मातुरुपमन्युर्महाद्युतिः॥ १६<br><br>बालोऽपि मातरं प्राह प्रणिपत्य तपस्विनीम्।<br>त्यज शोकं महाभागे महादेवोऽस्ति चेत्क्वचित्॥ १७<br><br>चिराद्वा ह्यचिराद्वापि क्षीरोदं साधयाम्यहम्। | हैं। शिवकी कृपासे ही सबकुछ प्राप्त होता है, अन्य देवताओंकी कृपासे नहीं; अन्य देवताओंमें परायण रहनेवाले दुःखसे व्यथित होकर [संसारचक्रमें] भ्रमण करते रहते हैं। हमलोगोंको दूध कैसे मिल सकता है; क्योंकि हमलोगोंने महादेवकी पूजा नहीं की है। हे पुत्र! शिवको उद्देश्य करके पूर्वजन्ममें जो कुछ समर्पित किया जाता है, वही प्राप्त होता है; विष्णु अथवा अन्य देवताको उद्देश्य करके देनेपर कुछ नहीं प्राप्त होता है'॥ ११-१५½॥<br><br>तब माताका वचन सुनकर महातेजस्वी बालक उपमन्यु भी तपस्विनी माताको प्रणाम करके बोला—'हे महाभागे! शोकका त्याग करो; महादेवजी चाहे कहीं भी हों, मैं शीघ्र अथवा विलम्बसे क्षीरसमुद्रको प्राप्त कर लूँगा'॥ १६-१७½॥ |
| सूत उवाच<br>तां प्रणम्यैवमुक्त्वा स तपः कर्तुं प्रचक्रमे॥ १८<br><br>तमाह माता सुशुभं कुर्विति सुतरां सुतम्।<br>अनुज्ञातस्तया तत्र तपस्तेपे सुदुस्तरम्॥ १९ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] उसे प्रणामकर वे [उपमन्यु] तप करनेके लिये प्रवृत्त हुए। तब माताने पुत्रसे कहा—'पूर्णरूपसे अत्यन्त शुभ तपस्या करो।' |
| हिमवत्पर्वतं प्राप्य वायुभक्षः समाहितः।<br>तपसा तस्य विप्रस्य विधूपितमभूज्जगत्॥ २० | उससे आज्ञा प्राप्त करके हिमवान् पर्वतपर जाकर वायुका आहार करते हुए एकाग्रचित्त होकर वे अति कठोर तप करने लगे॥ १८-१९½॥ |
| प्रणम्याहुस्तु तत्सर्वं हरये देवसत्तमाः।<br>श्रुत्वा तेषां तदा वाक्यं भगवान् पुरुषोत्तमः॥ २१<br><br>किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य ज्ञात्वा तत्कारणं च सः।<br>जगाम मन्दरं तूर्णं महेश्वरदिदृक्षया॥ २२ | उस विप्रकी तपस्यासे [सम्पूर्ण] जगत् तप्त हो उठा। तब सभी श्रेष्ठ देवताओंने विष्णुको प्रणाम करके वह बात बतायी। इसके बाद उनका वचन सुनकर वे भगवान् पुरुषोत्तम 'यह क्या है'—ऐसा सोचकर पुनः उसका कारण जानकर महेश्वरके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक मन्दर पर्वतपर गये॥ २०-२२॥ |
| दृष्ट्वा देवं प्रणम्यैवं प्रोवाचेदं कृताञ्जलिः।<br>भगवन् ब्राह्मणः कश्चिदुपमन्युरिति श्रुतः॥ २३<br><br>क्षीरार्थमदहत्सर्वं तपसा तं निवारय। | शिवको देखकर उन्हें प्रणाम करके विष्णुने हाथ जोड़कर यह कहा—'हे भगवन्! उपमन्यु नामसे प्रसिद्ध किसी ब्राह्मणने दुग्धके लिये [अपनी] तपस्यासे सबको जला डाला; आप उसे रोकिये'॥ २३½॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे देवः पिनाकी परमेश्वरः।<br>शक्ररूपं समास्थाय गन्तुं चक्रे मतिं तदा॥ २४<br><br>अथ जगाम मुनेस्तु तपोवनं<br>गजवरेण सितेन सदाशिवः।<br>सह सुरासुरसिद्धमहोरगै-<br>रमरराजतनुं स्वयमास्थितः॥ २५ | इसके अनन्तर पिनाकधारी देव परमेश्वरने इन्द्रका रूप धारणकर वहाँ जानेका विचार किया। तत्पश्चात् वे सदाशिव देवराज [इन्द्र]-का रूप धारणकर श्वेत गजराजपर आरूढ़ होकर सुरों, असुरों, सिद्धों तथा महान् नागोंके साथ मुनिके तपोवनमें गये॥ २४-२५॥ |
अध्याय १०७] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सहैव चारुह्य तदा द्विपं तं<br>प्रगृह्य बालव्यजनं विवस्वान्।<br>वामेन शच्या सहितं सुरेन्द्रं<br>करेण चान्येन सितातपत्रम्॥ २६ | उनके साथ ही उस हाथीपर चढ़कर सूर्यदेव [अपने] बाएँ हाथमें बालव्यजन तथा दाएँ हाथमें श्वेत छत्र लेकर शचीसहित सुरेन्द्रकी सेवा कर रहे थे॥ २६॥ |
| रराज भगवान् सोमः शक्ररूपी सदाशिवः।<br>सितातपत्रेण यथा चन्द्रबिम्बेन मन्दरः॥ २७ | उस समय उमासहित शक्ररूपी भगवान् सदाशिव श्वेत छत्रसे उसी तरह सुशोभित हो रहे थे, जैसे चन्द्रबिम्बसे मन्दर [पर्वत] सुशोभित होता है॥ २७॥ |
| आस्थायैवं हि शक्रस्य स्वरूपं परमेश्वरः।<br>जगामानुग्रहं कर्तुमुपमन्योस्तदाश्रमम्॥ २८ | इस प्रकार इन्द्रका स्वरूप धारण करके परमेश्वर [उस] उपमन्युपर अनुग्रह करनेके लिये उसके आश्रममें गये॥ २८॥ |
| तं दृष्ट्वा परमेशानं शक्ररूपधरं शिवम्।<br>प्रणम्य शिरसा प्राह मुनिर्मुनिवराः स्वयम्॥ २९<br><br>पावितश्चाश्रमश्चायं मम देवेश्वरः स्वयम्।<br>प्राप्तः शक्रो जगन्नाथो भगवान् भानुना प्रभुः॥ ३० | हे मुनिवरो! इन्द्ररूपधारी उन परमेशान शिवको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम करके मुनि [उपमन्यु]-ने स्वयं कहा—'मेरा यह आश्रम पवित्र हो गया; क्योंकि देवताओंके स्वामी, जगत्पति, भगवान् प्रभु इन्द्र सूर्यके साथ [यहाँ] स्वयं आये हुए हैं'॥ २९-३०॥ |
| एवमुक्त्वा स्थितं वीक्ष्य कृताञ्जलिपुटं द्विजम्।<br>प्राह गम्भीरया वाचा शक्ररूपधरो हरः॥ ३१<br><br>तुष्टोऽस्मि ते वरं ब्रूहि तपसानेन सुव्रत।<br>ददामि चेप्सितान् सर्वान् धौम्याग्रज महामते॥ ३२ | ऐसा कहकर हाथ जोड़कर खड़े हुए द्विजको देखकर इन्द्ररूपधारी शिव गम्भीर वाणीमें बोले—'हे सुव्रत! मैं तुम्हारे इस तपसे प्रसन्न हो गया हूँ; वर माँगो। हे [ऋषि] धौम्यके अग्रज! हे महामते! मैं [तुम्हें] समस्त अभीष्ट प्रदान करता हूँ'॥ ३१-३२॥ |
| एवमुक्तस्तदा तेन शक्रेण मुनिसत्तमः।<br>वरयामि शिवे भक्तिमित्युवाच कृताञ्जलिः॥ ३३ | तब शक्ररूपी शिवके द्वारा ऐसा कहे जानेपर मुनिश्रेष्ठने हाथ जोड़कर कहा—'मैं शिवमें भक्तिका वर माँगता हूँ'॥ ३३॥ |
| ५६२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| ततो निशम्य वचनं मुनेः कुपितवत्प्रभुः।<br>प्राह सव्यग्रमीशानः शक्ररूपधरः स्वयम्॥ ३४<br>मां न जानासि देवर्षे देवराजानमीश्वरम्।<br>त्रैलोक्याधिपतिं शक्रं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ३५<br>मद्भक्तो भव विप्रर्षे मामेवार्चय सर्वदा।<br>ददामि सर्वं भद्रं ते त्यज रुद्रं च निर्गुणम्॥ ३६ | तब मुनिका वचन सुनकर इन्द्रका रूप धरण करनेवाले प्रभु ईशान कुपितकी भाँति व्यग्रतापूर्वक बोले—'हे देवर्षे! तीनों लोकोंके अधिपति तथा सभी देवताओंसे नमस्कार किये जानेवाले मुझ ईश्वर देवराज इन्द्रको क्या तुम नहीं जानते हो? हे विप्रर्षे! तुम मेरे भक्त हो जाओ और सर्वदा मेरी ही पूजा करो, मैं तुम्हें सब कुछ प्रदान करता हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; तुम निर्गुण शिवका त्याग कर दो'॥ ३४-३६॥ | | ततः शक्रस्य वचनं श्रुत्वा श्रोत्रविदारणम्।<br>उपमन्युरिदं प्राह जपन् पञ्चाक्षरं शुभम्॥ ३७<br>मन्ये शक्रस्य रूपेण नूनमत्रागतः स्वयम्।<br>कर्तुं दैत्याधमः कश्चिद्धर्मविघ्नं च नान्यथा॥ ३८<br>त्वयैव कथितं सर्वं भवनिन्दारतेन वै।<br>प्रसङ्गाद्देवदेवस्य निर्गुणत्वं महात्मनः॥ ३९<br>बहुनात्र किमुक्तेन मयाद्यानुमितं महत्।<br>भवान्तरकृतं पापं श्रुता निन्दा भवस्य तु॥ ४०<br>श्रुत्वा निन्दां भवस्याथ तत्क्षणादेव सन्त्यजेत्।<br>स्वदेहं तं निहत्याशु शिवलोकं स गच्छति॥ ४१<br>यो वाचोत्पाटयेज्जिह्वां शिवनिन्दारतस्य तु।<br>त्रिः सप्तकुलमुद्धृत्य शिवलोकं स गच्छति॥ ४२<br>आस्तां तावन्ममेच्छा या क्षीरं प्रति सुराधमम्।<br>निहत्य त्वां शिवास्त्रेण त्यजाम्येतत्कलेवरम्॥ ४३<br>पुरा मात्रा तु कथितं तथ्यमेव न संशयः।<br>पूर्वजन्मनि चास्माभिरपूजित इति प्रभुः॥ ४४ | तब इन्द्रका कर्णविदारक वचन सुनकर उपमन्युने पवित्र पंचाक्षरमन्त्रका जप करते हुए यह कहा—'अब मैं समझता हूँ कि निश्चय ही कोई अधम दैत्य स्वयं इन्द्रके स्वरूपमें मेरे धर्ममें विघ्न डालनेके लिये यहाँ आया है; इसमें सन्देह नहीं है। शिवनिन्दापरायण आपने ही प्रसंगवश महात्मा देवदेव [शिव]-की निर्गुणता भी बतायी है। अधिक कहनेसे क्या लाभ; मैंने आज अनुमान किया है कि पूर्वजन्ममें किया हुआ मेरा कोई महापाप अवश्य है, जिसके कारण मैंने शिवकी निन्दा सुनी है। जो शिवकी निन्दा सुनकर उसी क्षण उस [शिवनिन्दक]-को मारकर अपने शरीरको त्याग देता है, वह शिवलोकको जाता है। जो [व्यक्ति] वाणीसे शिवनिन्दा करनेवालेकी जीभ उखाड़ लेता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके शिवलोकको जाता है। दूधके लिये मेरी जो इच्छा है, वह अब दूर रहे; शिवके अस्त्रसे तुझ सुराधमका वध करके मैं [अपने] इस शरीरका भी त्याग कर दूँगा। माताने पहले जो कहा था, वह सत्य है; इसमें सन्देह नहीं है। हमलोगोंने पूर्वजन्ममें शिवकी पूजा नहीं की थी'॥ ३७-४४॥ | | एवमुक्त्वा तु तं देवमुपमन्युरभीतवत्।<br>शक्रं चक्रे मतिं हन्तुमथर्वास्त्रेण मन्त्रवित्॥ ४५<br>भस्माधारान्महातेजा भस्ममुष्टिं प्रगृह्य च।<br>अथर्वास्त्रं ततस्तस्मै ससर्ज च ननाद च॥ ४६<br>दग्धुं स्वदेहमाग्नेयीं ध्यात्वा वै धारणां तदा।<br>अतिष्ठच्च महातेजाः शुष्केन्धनमिवाव्ययः॥ ४७ | ऐसा कहकर निडरकी भाँति होकर मन्त्रवेत्ता उपमन्युने उन इन्द्रदेवको अथर्वास्त्रसे मार देनेका विचार किया। उस महातेजस्वीने भस्मके आधारसे एक मुट्ठी भस्म लेकर उसके लिये अथर्वास्त्रका सृजन किया और जोरसे ध्वनि की। तब आग्नेयी धारणाका ध्यान करके अपने देहको सूखे ईंधनकी तरह जलानेके लिये वह अव्यय तेजस्वी खड़ा हो गया॥ ४५-४७॥ | | एवं व्यवसिते विप्रे भगवान् भगनेत्रहा।<br>वारयामास सौम्येन धारणां तस्य योगिनः॥ ४८ | उस विप्रके ऐसा निश्चय करनेपर भगके नेत्रको |
अध्याय १०७] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५६३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथर्वास्त्रं तदा तस्य संहृतं चन्द्रिकेण तु।<br>कालाग्निसदृशं चेदं नियोगान्नन्दिनस्तथा॥ ४९ | नष्ट करनेवाले भगवान् शिवने सोमधारणाद्योगसे उस योगी [उपमन्यु]-की [आग्नेयी] धारणाको रोक दिया। तब नन्दीके आदेशसे चन्द्रिक [नामक गण]-ने उसके कालाग्नि-सदृश अथर्वास्त्रका संहरण कर लिया॥ ४८-४९॥ |
| स्वरूपमेव भगवानास्थाय परमेश्वरः।<br>दर्शयामास विप्राय बालेन्दुकृतशेखरम्॥ ५० | इसके बाद भगवान् परमेश्वरने बालचन्द्रमासे शोभित मस्तकवाले [अपने] स्वरूपको धारण करके विप्रको दिखाया॥ ५०॥ |
| क्षीरधारासहस्त्रं च क्षीरोदार्णवमेव च।<br>दध्यादेरर्णवं चैव घृतोदार्णवमेव च॥ ५१<br><br>फलार्णवं च बालस्य भक्ष्यभोज्यार्णवं तथा।<br>अपूपगिरयश्चैव तथातिष्ठन् समन्ततः॥ ५२ | उस समय बालक [उपमन्यु]-के चारों ओर हजारों दुग्धधाराएँ, क्षीरसागर, मधुका समुद्र, दधिका सागर, घृतका सागर, फलका सागर, [अन्य] भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका सागर तथा अपूपोंके पर्वत उपस्थित हो गये॥ ५१-५२॥ |
| उपमन्युमुवाच सस्मितो<br>भगवान् बन्धुजनैः समावृतम्।<br>गिरिजामवलोक्य सस्मितां सघृणं<br>प्रेक्ष्य तु तं तदा घृणी॥ ५३<br><br>भुङ्क्ष्व भोगान् यथाकामं बान्धवैः पश्य वत्स मे।<br>उपमन्यो महाभाग तवाम्बैषा हि पार्वती॥ ५४<br><br>मया पुत्रीकृतोऽस्यद्य दत्तः क्षीरोदधिस्तथा।<br>मधुनश्चार्णवश्चैव दध्नश्चार्णव एव च॥ ५५<br><br>आज्योदनार्णवश्चैव फललेह्यार्णवस्तथा।<br>अपूपगिरयश्चैव भक्ष्यभोज्यार्णवः पुनः॥ ५६<br><br>पिता तव महादेवः पिता वै जगतां मुने।<br>माता तव महाभागा जगन्माता न संशयः॥ ५७<br><br>अमरत्वं मया दत्तं गाणपत्यं च शाश्वतम्।<br>वरान् वरय दास्यामि नात्र कार्या विचारणा॥ ५८ | तदनन्तर दयालु भगवान् [शिव]-ने मुसकानयुक्त गिरिजाको देखकर तथा बन्धुजनोंसे घिरे हुए उपमन्युकी ओर दयापूर्वक देखकर मुसकराकर उससे कहा—'हे मेरे पुत्र! तुम अपने बान्धवोंके साथ इच्छानुसार भोगोंका उपभोग करो। हे उपमन्यो! हे महाभाग! देखो, ये पार्वती तुम्हारी माता हैं। मैंने आज तुम्हें अपना पुत्र बना लिया है और तुम्हें क्षीरसागर, मधुसागर, दधिसागर, घृत तथा ओदनका सागर, फलोंका सागर, लेह्य पदार्थोंका सागर, अपूपोंके पर्वत तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका सागर प्रदान किया है। हे मुने! सभी लोकोंके पिता महादेव तुम्हारे पिता हैं और जगज्जननी महाभागा पार्वती तुम्हारी माता हैं; इसमें सन्देह नहीं है। मैंने तुम्हें अमरत्व तथा शाश्वत गाणपत्य प्रदान कर दिया, अब तुम अन्य वरोंको भी माँग लो, मैं तुम्हें दूँगा; इसमें तुम्हें सन्देह नहीं करना चाहिये'॥ ५३-५८॥ |
| एवमुक्त्वा महादेवः कराभ्यामुपगृह्य तम्।<br>आघ्राय मूर्धनि विभुर्ददौ देव्यास्तदा भवः॥ ५९ | ऐसा कहकर महादेव विभु शिवने उसे दोनों हाथोंसे उठाकर उसका सिर सूँघकर पुनः उसे देवी [पार्वती]-को दे दिया॥ ५९॥ |
| देवी तनयमालोक्य ददौ तस्मै गिरीन्द्रजा।<br>योगैश्वर्यं तदा तुष्टा ब्रह्मविद्यां द्विजोत्तमाः॥ ६० | हे श्रेष्ठ द्विजो! तब [अपने] पुत्रको देखकर गिरिराजपुत्री देवी [पार्वती]-ने प्रसन्न होकर उसे योगैश्वर्य तथा ब्रह्मविद्या प्रदान की॥ ६०॥ |
| सोऽपि लब्ध्वा वरं तस्याः कुमारत्वं च सर्वदा।<br>तुष्टाव च महादेवं हर्षगद्गदया गिरा॥ ६१ | उसने भी उन पार्वतीसे वर तथा शाश्वत कुमारत्व प्राप्त करके हर्षके कारण गद्गद वाणीसे महादेवकी |
१०८- भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रतका माहात्म्य
| ५६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| वरयामास च तदा वरेण्यं विरजेक्षणम्।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणिपत्य पुनः पुनः॥ ६२<br><br>प्रसीद देवदेवेश त्वयि चाव्यभिचारिणी।<br>श्रद्धा चैव महादेव सान्निध्यं चैव सर्वदा॥ ६३ | स्तुति की और इसके बाद हाथ जोड़कर विरजेक्षण (सात्त्विकजनोंपर दृष्टि डालनेवाले) वरेण्य शिवको बार-बार प्रणाम करके वर माँगा—'हे देवदेवेश! प्रसन्न होइए। हे महादेव! आपमें मेरी अव्यभिचारिणी श्रद्धा रहे तथा सर्वदा आपका सान्निध्य प्राप्त हो'॥ ६१–६३॥ | | एवमुक्तस्तदा तेन प्रहसन्निव शङ्करः।<br>दत्त्वेप्सितं हि विप्राय तत्रैवान्तरधीयत॥ ६४। | तब उसके ऐसा कहनेपर शंकरजी हँसते हुए उस विप्रको वांछित वर प्रदान करके वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ ६४॥ |
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उपमन्युचरितं नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः॥ १०७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उपमन्युचरित' नामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०७॥
एक सौ आठवाँ अध्याय
भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रतका माहात्म्य
| ऋषय ऊचुः | **ऋषिगण बोले—**अक्लिष्ट कर्मवाले वासुदेव श्रीकृष्णने धौम्यके ज्येष्ठ भ्राता [उपमन्यु]-का दर्शन किया था और उनसे दिव्य पाशुपतव्रत ग्रहण किया था। हे सूतजी! बुद्धिमान् श्रीकृष्णने उनसे यह ज्ञान कैसे प्राप्त किया; उस पापनाशिनी कथाको बतानेकी कृपा |
|---|---|
| दृष्टोऽसौ वासुदेवेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>धौम्याग्रजस्ततो लब्धं दिव्यं पाशुपतं व्रतम्॥ १<br>कथं लब्धं तदा ज्ञानं तस्मात्कृष्णेन धीमता।<br>वक्तुमर्हसि तां सूत कथां पातकनाशिनीम्॥ २ |
अध्याय १०८] भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना... पाशुपतव्रतका माहात्म्य ५६५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कीजिये ॥ १-२ ॥ | |
| सूत उवाच<br>स्वेच्छया ह्यवतीर्णोऽपि वासुदेवः सनातनः ।<br>निन्दन्नेव मानुष्यं देहशुद्धिं चकार सः ॥ ३ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] सनातन वासुदेव अपनी इच्छासे अवतीर्ण हुए थे, फिर भी उन्होंने मानवरूपकी निन्दा करते हुए देहशुद्धि की थी ॥ ३ ॥ |
| पुत्रार्थं भगवांस्तत्र तपस्तप्तुं जगाम च ।<br>आश्रमं चोपमन्योर्वै दृष्टवांस्तत्र तं मुनिम् ॥ ४<br><br>नमश्चकार तं दृष्ट्वा धौम्याग्रजमहो द्विजाः ।<br>बहुमानेन वै कृष्णस्त्रिः कृत्वा वै प्रदक्षिणम् ॥ ५ | भगवान् [श्रीकृष्ण] पुत्रप्राप्तिहेतु तप करनेके लिये उपमन्युके आश्रममें गये और उन्होंने वहाँ उन मुनिका दर्शन किया। हे द्विजो! उन धौम्याग्रजको देखकर अत्यन्त सम्मानके साथ उनकी तीन बार प्रदक्षिणा करके श्रीकृष्णने उन्हें नमस्कार किया ॥ ४-५ ॥ |
| तस्यावलोकनादेव मुनेः कृष्णस्य धीमतः ।<br>नष्टमेव मलं सर्वं कायजं कर्मजं तथा ॥ ६ | उन मुनिके अवलोकनमात्रसे बुद्धिमान् श्रीकृष्णका सम्पूर्ण देहजनित तथा कर्मजनित मल नष्ट हो गया ॥ ६ ॥ |
| भस्मनोद्धूलनं कृत्वा उपमन्युर्महाद्युतिः ।<br>तमग्निरिति विप्रेन्द्रा वायुरित्यादिभिः क्रमात् ॥ ७<br><br>दिव्यं पाशुपतं ज्ञानं प्रददौ प्रीतमानसः । | हे विप्रेन्द्रो! महातेजस्वी उपमन्युने भस्मोद्धूलन करके प्रसन्नचित्त होकर क्रमसे अग्नि, वायु आदि मन्त्रोंके द्वारा उन्हें दिव्य पाशुपत ज्ञान प्रदान किया ॥ ७१/२ ॥ |
| मुनेः प्रसादान्मान्योऽसौ कृष्णः पाशुपते द्विजाः ॥ ८<br><br>तपसा त्वेकवर्षान्ते दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् ।<br>साम्बं सगणमव्यग्रं लब्धवान् पुत्रमात्मनः ॥ ९<br><br>तदाप्रभृति तं कृष्णं मुनयः संशितव्रताः ।<br>दिव्याः पाशुपताः सर्वे तस्थुः संवृत्य सर्वदा ॥ १० | हे द्विजो! मुनिकी कृपासे वे श्रीकृष्ण पाशुपतव्रतमें मान्य हो गये। [अपनी] तपस्यासे एक वर्षके अन्तमें पार्वती तथा गणोंसहित अव्यग्र देव महेश्वरका दर्शन करके उन्होंने अपना पुत्र प्राप्त किया। उसी समयसे प्रशस्त व्रतवाले दिव्य मुनिगण तथा पशुपतिके सभी भक्त सदा उन कृष्णको घेरकर स्थित रहने लगे ॥ ८-१० ॥ |
५६६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| अन्यं च कथयिष्यामि मुक्त्यर्थं प्राणिनां सदा।<br>सौवर्णीं मेखलां कृत्वा आधारं दण्डधारणम्॥ ११<br><br>सौवर्णं पिण्डिकं चापि व्यजनं दण्डमेव च।<br>नरैः स्त्रियाथ वा कार्यं मषीभाजनलेखनीम्॥ १२<br><br>क्षुराकर्त्तरिका चापि अथ पात्रमथापि वा।<br>पाशुपताय दातव्यं भस्मोद्धूलितविग्रहैः॥ १३<br><br>सौवर्णं रजतं वापि ताम्रं वाथ निवेदयेत्।<br>आत्मवित्तानुसारेण योगिनं पूजयेद् बुधः॥ १४ | [हे ऋषियो!] सदा सभी प्राणियोंकी मुक्तिके लिये मैं अन्य व्रतको भी बताऊँगा। सुवर्णमयी मेखला (परिनालिका) बनाकर उसके आधार, दण्डधारण (जलनिवारक बाहरी भाग), पिण्डक (लिङ्ग), व्यजन, दीक्षादण्ड—यह सब सोनेका बनाना चाहिये; साथ ही मषीपात्रयुक्त लेखनी, छुरी सहित कैंची तथा जलपात्र भी स्वर्णमय बनाकर इन सभी सामग्रियोंको भस्मसे उद्धूलित शरीरवाले पुरुषोंके द्वारा या स्त्रीके द्वारा किसी पशुपति-भक्तको दे दिया जाना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि अपने धन-सामर्थ्यके अनुसार सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी ही सामग्री समर्पित करे और उस योगीकी पूजा करे॥ ११-१४॥ | | ते सर्वे पापनिर्मुक्ताः समस्तकुलसंयुताः।<br>यान्ति रुद्रपदं दिव्यं नात्र कार्या विचारणा॥ १५<br><br>तस्मादनेन दानेन गृहस्थो मुच्यते भवात्।<br>योगिनां सम्प्रदानेन शिवः क्षिप्रं प्रसीदति॥ १६<br><br>राज्यं पुत्रं धनं भव्यमश्वं यानमथापि वा।<br>सर्वस्वं वापि दातव्यं यदीच्छेन्मोक्षमुत्तमम्॥ १७<br><br>अध्रुवेण शरीरेण ध्रुवं साध्यं प्रयत्नतः।<br>भव्यं पाशुपतं नित्यं संसारार्णवतारकम्॥ १८ | [ऐसा दान करनेवाले] वे सभीलोग सम्पूर्ण कुलसहित पापमुक्त होकर दिव्य रुद्रपदको जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। अतः गृहस्थ इस दानके द्वारा संसार [चक्र]-से छूट जाता है। योगियोंके लिये यह दान करनेसे शिव शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं। यदि कोई उत्तम मोक्ष चाहता हो, तो उसे भव्य राज्य, पुत्र, धन, अश्व, यान—यहाँतक कि सर्वस्वका दान कर देना चाहिये। [इस] अनित्य शरीरसे भव्य, नित्य (शाश्वत) तथा संसार-सागरसे पार करनेवाले पाशुपतव्रतको प्रयत्नपूर्वक अवश्य सिद्ध करना चाहिये॥ १५-१८॥ | | एतद्वः कथितं सर्वं सङ्क्षेपान्न च संशयः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि विष्णुलोकं स गच्छति॥ १९ | [हे ऋषियो!] मैंने संक्षेपमें आपलोगोंको यह सब बता दिया। जो इसे पढ़ता है अथवा सुनता है, वह विष्णुलोकको जाता है; इसमें संशय नहीं है॥ १९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टोत्तरशततमोऽध्यायः॥ १०८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णन' नामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०८ ॥
॥ समाप्तश्चायं पूर्वभागः॥
॥ श्रीलिङ्गमहापुराणका पूर्वभाग पूर्ण हुआ॥
१- भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
श्रीलिङ्गमहापुराण
[ उत्तरभाग ]
पहला अध्याय
भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा
| ऋषय ऊचुः <br> कृष्णास्तुष्यति केनेह सर्वदेवेश्वरेश्वरः। <br> वक्तुमर्हसि चास्माकं सूत सर्वार्थविद्वरान्॥ १ | **ऋषि बोले—**हे सूतजी! समस्त देवताओं और ईश्वरोंके ईश्वर भगवान् कृष्ण इस लोकमें किससे सन्तुष्ट होते हैं? आप हम लोगोंको बतायें; आप सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता हैं॥ १॥ |
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| सूत उवाच <br> पुरा पृष्टो महातेजा मार्कण्डेयो महामुनिः। <br> अम्बरीषेण विप्रेन्द्रास्तद्वदामि यथातथम्॥ २ | **सूतजी बोले—**हे विप्रवरो! पूर्वकालमें अम्बरीषने भी महातेजस्वी महामुनि मार्कण्डेयसे [इस विषयमें] पूछा था; मैं उसे यथार्थरूपसे बता रहा हूँ॥ २॥ |
| अम्बरीष उवाच <br> मुने समस्तधर्माणां पारगस्त्वं महामते। <br> मार्कण्डेय पुराणोऽसि पुराणार्थविशारदः॥ ३ | **अम्बरीष बोले—**हे मुने! हे महामते! हे मार्कण्डेयजी! आप समस्त धर्मोंके पूर्ण ज्ञाता, अत्यन्त पुरातन तथा पुराणतत्त्वोंके विद्वान् हैं॥ ३॥ |
| नारायणानां दिव्यानां धर्माणां श्रेष्ठमुत्तमम्। <br> तत्किं ब्रूहि महाप्राज्ञ भक्तानामिह सुव्रत॥ ४ | हे महाप्राज्ञ! नारायणके द्वारा निर्मित दिव्य धर्मोंमें कौन-सा धर्म श्रेष्ठ तथा उत्तम है? हे सुव्रत! उसे आप यहाँपर भक्तोंके कल्याणार्थ बतायें॥ ४॥ |
| सूत उवाच <br> तस्य तद्वचनं श्रुत्वा समुत्थाय कृताञ्जलिः। <br> स्मरन्नारायणं देवं कृष्णमच्युतमव्ययम्॥ ५ | **सूतजी बोले—**उनका यह वचन सुनकर [मार्कण्डेयजी] उठ करके दोनों हाथ जोड़कर अविनाशी तथा अच्युत भगवान् नारायण कृष्णका स्मरण करते हुए कहने लगे॥ ५॥ |